सबसे समावेशी हिंदू धर्म को हिंसक बताने पर चुप्पी आखिर कब टूटेगी।
हिंदू धर्म हमेशा से समावेशी रहा है। उसके बारे में अगर कोई कहता है कि ये दूसरे धर्मों से द्वेष या ईर्ष्या रखता है तो इससे बड़ा झूठ हो ही नहीं सकता। जब भी यह विषय आता है तो मुझे गुरुदेव रविंद्र नाथ ठाकुर की बात याद आती है। उन्होंने लिखा था कि इस पृथ्वी पर दो मजहब इस्लाम और क्रिश्चियनिटी ऐसे हैं जिनके मन में दूसरे धर्मों के प्रति सिर्फ और सिर्फ दुश्मनी का भाव है। ये लोग इस बात से संतुष्ट नहीं होते कि उन्हें उनके मजहब का पालन शांतिपूर्ण ढंग से करने दिया जाए। ये दूसरे धर्मों को नष्ट करना चाहते हैं। इनके साथ भाईचारे का मतलब है कि आप इनके मजहब को अपना लीजिए। दरअसल मैं भारतीय राजनीति में जो एक तीसरा जेंडर है,उस विषय को उठा रहा हूं। लेकिन उससे पहले आप समझिए कि सनातन धर्म ने कभी किसी मजहब का विरोध नहीं किया। यही वजह है कि दुनिया में भारत एकमात्र देश है, जहां सबसे ज्यादा धर्म और मजहब के लोग हैं और सभी शांतिपूर्ण ढंग से अपने—अपने मजहब का पालन कर रहे हैं। लेकिन फिर भी इस समय दुनिया में सबसे ज्यादा आलोचना सनातन धर्म की हो रही है और उसे खत्म करने की बात कही जा रही है। और ऐसा इसलिए है क्योंकि सनातनी सहिष्णु होते हैं। अपने धर्म की आलोचना और निंदा को चुपचाप सुन लेते हैं। कोई जवाब नहीं देते।
जब मैं थर्ड जेंडर की बात कर रहा हूं तो वह है धर्मनिरपेक्षता या सेकुलरिज्म। सेकुलरिज्म का भारत से कोई संबंध नहीं है। यह विदेशी अवधारणा है। इसकी शुरुआत तब हुई जब चर्च और स्टेट के बीच अधिकारों के बंटवारे का झगड़ा शुरू हुआ। सुलह ये हुई कि चर्च शासन में और शासन मजहब में कोई दखल नहीं देगा। इसको सेकुलरिज्म कहा गया। तो भारत में, जहां सनातन धर्म को मानने वालों की बहुलता है, इस कांसेप्ट का कोई मतलब नहीं है। संविधान सभा ने भी संविधान की प्रस्तावना में इस शब्द को नहीं रखा था। लेकिन 1976 में इमरजेंसी में जब सारे विपक्षी सांसद जेल में थे तब इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान संशोधन से प्रस्तावना में दो शब्द जोड़े धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद। सनातन कोई पंथ नहीं है। यह धर्म है। यहां अध्यात्म है। किसी और मजहब में आपको अध्यात्म की बात नहीं मिलेगी। यह धर्म ऐसा नहीं है, जो एक किताब से चलता हो। यह निरंतर है। जैसे नदी का पानी निरंतर बहता रहता है। तभी वह शुद्ध रहता है। बाकी जो मजहब हैं खासतौर से इस्लाम और क्रिश्चियनिटी की बात करें तो वहां वहां सब कुछ ठहर चुका है। जो एक किताब में लिखा है और जो एक व्यक्ति ने कहा, वही अंतिम सत्य है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं हो सकता। और जो उसको नहीं मानता वह उस मजहब का नहीं है। जबकि सनातन धर्म में ऐसा कुछ नहीं है। आप किसी को नहीं मानते तब भी आप हिंदू हैं। हिंदू होने के लिए सिर्फ एक गुण की जरूरत होती है और वह है जिज्ञासा। आप में जानने की इच्छा हो। किसी दूसरे मजहब में प्रश्न करने की इजाजत नहीं है। सनातन धर्म के बारे में आप 1000 सवाल कर सकते हैं। और फिर भी सनातनी रह सकते हैं। यहां आलोचना करने वाले के खिलाफ सिर तन से जुदा का नारा नहीं लगता। लेकिन फिर भी मैंने हाल ही में एक वीडियो देखा। एक प्रोफेसर हैं निवेदिता मेनन। वह क्लास में अपने छात्रों से कह रही हैं कि दुनिया में सबसे हिंसक कोई धर्म है तो वह हिंदू धर्म है। अब आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा, लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं हुआ क्योंकि ये पक्की बात है कि वह कम्युनिस्ट होंगी और कम्युनिस्टों के लिए ऐसा बोलना बहुत सामान्य सी बात है। मुझे आश्चर्य इस बात पर हुआ कि उस कक्षा में बैठे किसी छात्र ने खड़े होकर नहीं कहा कि मैम आप झूठ बोल रही हैं और झूठ पढ़ा रही हैं। ये चुप्पी ही सबसे ज्यादा घातक है। यह निवेदिता मेनन जैसे लोग घातक नहीं हैं। सनातन धर्म के मानने वाले जब चुप हो जाते हैं तब असली संकट शुरू होता है। इस देश में कुछ लोग राम मंदिर की बात करने को तो सांप्रदायिकता मानते हैं लेकिन उन्हें आतंकवादियों और आतंक का समर्थन करने में कोई हिचक नहीं होती। कांग्रेस पार्टी के शासन में जाकिर नायक जैसों का सम्मान होता है। कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह की नजर में दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी ओसामा बिन लादेन ओसामा जी है और जय श्रीराम का नारा सांप्रदायिक है। सेकुलरिज्म के नाम पर यह सब हिंदुओं का ही एक बड़ा वर्ग करता है। इसीलिए कह रहा हूं यह थर्ड जेंडर है। अपने ही धर्म और संस्कृति का विरोध करना सबसे खतरनाक है।
ये सेकुलर लोग इस्लाम और क्रिश्चियनिटी को मानने वालों को सेकुलरिज्म का पाठ नहीं पढ़ा सकते क्योंकि वे अपने मजहब के ऊपर किसी चीज को मानते ही नहीं। अगर कोई मुसलमान कह दे कि वह सेकुलर है तो उसका कलमा बेकार हो जाएगा। इसलिए कोई मुसलमान या कोई क्रिश्चियन अपने को सेकुलर नहीं कहेगा। यह सिर्फ हिंदुओं का एक वर्ग है और इस्लाम एवं क्रिश्चियनिटी के लोग हिंदुओं के इसी वर्ग का फायदा उठाते हैं। सनातन और भारतीय संस्कृति पर हमला करने के लिए ये इन्हीं हिंदुओं का इस्तेमाल करते हैं और ये खुशी—खुशी इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं। उनको मालूम नहीं है कि वे कसाई के दरवाजे पर जो खूंटा गड़ा है, उससे बंधे हुए हैं। उनका नंबर भी आएगा। उनको लगता है कि वे जो कर रहे हैं, वह मानवता के भले के लिए कर रहे हैं। तमाम तरह की फर्जी अवधारणाएं पेश की जाती हैं,जैसे सर्वधर्म सद्भाव। अरे धर्म तो एक ही है। सनातन के अलावा बाकी सब मजहब हैं। दरअसल ये सेकुलर लोग ही सनातन के सबसे बड़े दुश्मन है। ये कम्युनिस्ट कहते हैं कि हम किसी धर्म या मजहब को नहीं मानते,लेकिन दुनिया में जहां—जहां जिहादी और आतंकवादी हैं, उनको कवर फायर देने वाले आपको यही कम्युनिस्ट मिलेंगे। ये बुरहान वानी को गरीब हेड मास्टर का बेटा बताते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि उसने जितने लोगों की हत्या की, वे कौन थे? ये पत्थरबाजों, सीमा पार से आए आतंकवादियों और कश्मीर घाटी में एथेनिक क्लींजिंग का समर्थन करते हैं, लेकिन एक घटना मॉब लिंचिंग की हो जाए तो ऐसा वातावरण बनाया जाता है कि देश में हर मुसलमान की मॉब लिंचिंग हो रही है। मुसलमान अगर किसी देश में सबसे ज्यादा फल फूल रहे तो वह भारत है। आप देखिए कि 1947 में बंटवारे के बाद भारत में मुसलमानों की आबादी कितनी थी और अब क्या है? जिस समाज की मॉब लिंचिंग हो रही हो उस समाज की आबादी ऐसे बढ़ती है क्या? उनकी आर्थिक स्थिति उस समय क्या थी और आज क्या है? आप कोई भी पैमाना उठाकर देख लीजिए। फिर भी एक फर्जी नैरेटिव बनाने की कोशिश की जाती है। भारत में शरिया और इस्लाम के मुताबिक जो भी कानून बने हैं,वे सब कांग्रेस के राज में बने हैं। 1991 में प्लेसेज आफ
वर्शिप एक्ट क्यों बना? हिंदुओं को अपने ही देश में अपने ही धर्मस्थलों की लड़ाई लड़ने का कानूनी अधिकार क्यों नहीं है? कांग्रेस पार्टी का राज अगर अभी तक चल रहा होता तो भारत अब तक इस्लामी राष्ट्र हो चुका होता। आजादी के बाद से इस देश में ऐसा माहौल बनाया गया कि अगर हिंदुत्व और सनातन धर्म को मानते हैं तो आप पुरातन पंथी हैं और अगर सनातन का विरोध करते हैं तो आप प्रोग्रेसिव हैं। हिंदू संस्कृति का विरोध और आतंकवादियों व जिहादियों का समर्थन, ये है सेकुलरिज्म की परिभाषा और उस सेकुलरिज्म को ऐसे पेश किया जाता है कि देश का सबसे प्रभावी सिद्धांत है। यही देश को एक रख सकता है। सेकुलरिज्म से बड़ा धोखा पिछले 80 साल में और कुछ नहीं है। इसके जरिए हिंदुओं को अपनी ही नजर में गिराने की कोशिश लगातार चल रही है। आप जरा कल्पना कीजिए कि अगर किसी और प्रोफेसर ने क्लास में यही बात इस्लाम या क्रिश्चियनिटी के बारे में कही होती तो अब तक पूरे देश में हंगामा मच गया होता। उनको निकालने और उनके खिलाफ कार्रवाई की बात होती,लेकिन निवेदिता मेनन ने जो किया उसके विरोध में आपको एक भी शब्द सुनने को नहीं मिला होगा। आजादी के 80 साल बाद भी देश की यह हालत है। उस दौर में यह स्थिति है जब केंद्र में हिंदुत्ववादियों की सरकार मानी जाती है। तो इससे आप अंदाजा लगाइए कि खतरा कितना गंभीर है। राजनीति का ये थर्ड जेंडर सेकुलरिज्म आतंकवाद से भी ज्यादा घातक है क्योंकि आतंकवादी हथियार लेकर आता है। उससे निपटने के लिए हमारे सुरक्षा बल हैं,लेकिन ये सेकुलर हमारे—आपके बीच में ही रहते हैं। बहुत से तो हमारे आपके परिवार में रहते हैं और लगातार हमारी जड़ों में मट्ठा डालने का काम करते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












