मामा को किनारे लगाने के लिए भांजा मैदान में ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
नेहरू—गांधी परिवार नाम की कंपनी से एक नया प्रोडक्ट लॉन्च हुआ है। कहा जा रहा है कि लांचिंग सॉफ्ट हुई है। चूंकि प्रोडक्ट परिवार से लॉन्च हुआ है तो उसकी चर्चा होनी ही थी और हो भी रही है।
प्रियंका वाड्रा के बेटे ने बीकानेर हाउस में एक फोटो प्रदर्शनी लगाई। वहां का नियम है कि प्रदर्शनी में लगाए गए फोटो राजनीतिक मुद्दों पर नहीं हो सकते, लेकिन उनके सारे फोटोग्राफ हाल ही में जो तथाकथित आंदोलन हो रहे थे, चाहे सीजेपी का प्रदर्शन हो या कांग्रेस का, उसी से संबंधित थे। प्रियंका वाड्रा के बेटे का नाम सुनकर भी बहुत से लोगों को आश्चर्य होगा क्योंकि अमूमन इस तरह से नाम रखे नहीं जाते। उनका नाम है रिहान राजीव वाड्रा। अब नाना का नाम अपने नाम के साथ कौन लगाता है? भारत में ऐसी कौन सी परंपरा है? किस समाज में है? यह खोजना मुश्किल है। लेकिन नेहरू—गांधी परिवार के लिए कुछ भी अचंभे की बात नहीं है। भारतीय परंपराओं से वैसे भी उनका कोई लेना—देना नहीं है। उनको सिर्फ अपना राजनीतिक फायदा दिखता है। रिहान वाड्रा नाम होता तो लोग समझते कि मुरादाबाद का कोई पीतल व्यापारी है। कोई नही पूछता। राजीव नाम लगने से एक पहचान बन गई वरना तो बताना पड़ता कि प्रियंका वाड्रा का बेटा है। अब कांग्रेस आजकल जो कुछ कर रही है वह बिना सोचे समझे कर रही है। जैसे रामलीला मैदान में उसकी रैली 1 नवंबर को होने जा रही है। 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी और उसके अगले दिन 1 नवंबर से बड़े पैमाने पर सिखों का नरसंहार शुरू हो गया था। सिखों को दिल्ली में गले में टायर डालकर जिंदा जला दिया गया। राजीव गांधी उस समय देश के प्रधानमंत्री बन चुके थे, लेकिन इतनी हिंसा हो जाने पर भी उनके ऊपर कोई असर नहीं पड़ा। उसे रोकने की कोई ठोस कोशिश नहीं हुई। हद तो तब हो गई जब कुछ दिन बाद
बोट क्लब की रैली में राजीव गांधी ने कहा कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है। तो कांग्रेस इस तरह से धरती हिलाती है।
तो मैं बात रिहान राजीव वाड्रा की कर रहा था। उनके नाम में राजीव जुड़ने से एक और चीज जुड़ गई है। राजीव गांधी का जब नाम आता है तो बोफोर्स घोटाला भी याद आ जाता है। लेकिन इसके बारे में शायद ज्यादा नहीं सोचा होगा। उनके साथ मुश्किल ये भी थी कि गांधी सरनेम लगा नहीं सकते थे। वैसे इस परिवार में नाम के साथ इस तरह का काम करने की बड़ी आदत है। सोनिया गांधी का असली नाम सोनिया नहीं है। शादी से पहले उनका नाम कुछ और था। सबको यह भी मालूम है कि इस परिवार के साथ ये गांधी सरनेम भी नकली है। गांधी जी उस समय देश और दुनिया के बड़े नेता बन चुके थे। गुजरात का पारसी समुदाय घंडी सरनेम लिखता है। जो हिंदू हैं वे ही गांधी लिखते हैं। राहुल गांधी के दादा फिरोज भी घंडी थे। गांधी जी के कारण या और किसी वजह से उन्होंने घंडी को गांधी कर लिया। उससे इंदिरा गांधी बन गईं। फिर राजीव और संजय को भी वही सरनेम मिला, लेकिन इन दोनों में से किसी ने अपने पिता का असली सरनेम नहीं लगाया। अब प्रियंका वाड्रा का बेटा अपने नाना का नाम अपने नाम के साथ लगा रहा है तो आप समझ जाइये कि राजनीति के बारे में ये कितनी दूर तक और कितना नीचे तक सोचते हैं। इनको बस राजनीतिक फायदा चाहिए, बाकी चीजें तो भाड़ में जाएं। आपको याद होगा कि रिहान की मां प्रियंका वाड्रा भी पेंटर रही हैं। मां की पेंटिंग तो दो करोड़ रुपये में यस बैंक के चेयरमैन ने खरीदी थी। यह अलग बात है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद प्रियंका वाड्रा ने कोई पेंटिंग नहीं बनाई और बनाई भी हो तो उसको दो करोड़ तो छोड़िए, दो रुपये में भी खरीदने वाला कोई नहीं आया। इनकी पेंटिंग उसी समय बिकती है जब इनकी सत्ता होती है। तो लोग उसे क्यों खरीदते हैं यह आप समझ सकते हैं।
अब बेटे ने प्रदर्शनी लगाई है तो लोग पूछ रहे हैं कि भैया, फोटो किससे खरीदी? क्योंकि इस पूरे प्रदर्शन के दौरान रिहान राजीव वाड्रा कहीं फोटो खींच रहे हों, ऐसा कोई दृश्य तो देखने में आया नहीं। वह कोई अनजान आदमी नहीं हैं कि फोटो खींचने पहुंचेंगे और कोई नोटिस नहीं करेगा। और अगर ऐसा हुआ है तो यह परिवार के लिए और भी ज्यादा चिंता की बात है। तो किसी कंपनी का नया प्रोडक्ट कब लांच होता है? जब लगता है कि पुराने प्रोडक्ट की मांग घट रही है। कंपनी के दो प्रोडक्ट राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा पहले से बाजार में हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी के अंदर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या प्रियंका को लग रहा है कि राहुल से अब काम नहीं चलेगा? इसीलिए अपने बेटे को लांच किया। अब बेटा 25—26 साल का हो गया है। अगर वह 2029 में लोकसभा का चुनाव लड़े तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। इसीलिए इस फोटो प्रदर्शनी को भी कंट्रोवर्शियल बनाया गया। प्रदर्शनी में जिस तरह के फोटोग्राफ्स को लगाने की अनुमति नहीं थी, उन्हें ही लगाया गया। मालूम था कि हटाया जाएगा तो कंट्रोवर्सी होगी। फिर कहा जाएगा कि सरकार अत्याचार कर रही है। अब सवाल है कि नया प्रोडक्ट लांच हो गया है तो पुराने का क्या होगा? वह तो रिजीम चेंज का फार्मूला लाने के लिए वियतनाम गया हुआ है। तो क्या राहुल गांधी को यह संदेश दिया जा रहा है कि भाई अब तुम चल नहीं पाओगे। छोटी बहन ने बड़े भाई से कहा है कि भैया अब तुम थोड़ा किनारे हटो। तुम तो जेन जी भी नहीं हो। हमारा बेटा तो जेन जी में भी आता है। तुम 56 साल के हो गए हो। चार साल में सीनियर सिटीजन हो जाओगे। पिछले 22 साल से लगे हुए हो, कुछ नहीं कर पाए। अब दूसरे को मौका दो। इस नए प्रोडक्ट के लांच को आप सामान्य बात मत समझिए। प्रियंका वाड्रा का ऐसा कोई इरादा नहीं है कि उनका बेटा एक फोटोग्राफर के रूप में लांच हो।
अभी भारतीय राजनीति में एक बड़ी सुनामी आने वाली है। वह सुनामी ऐसा नहीं है कि किसी पार्टी या संगठन में कोई बड़ी तोड़फोड़ होने वाली है। संसद के जरिए कुछ ऐसे काम होने वाले हैं, जिससे इस देश की पार्लियामेंट्री पॉलिटिक्स की डेमोग्राफी और जियोग्राफी दोनों बदलने वाली है। तो ये तूफान से पहले की शांति है। मेरे हिसाब यह तूफान इसी साल आएगा। तो उससे पहले कांग्रेस पार्टी और नेहरू—गांधी परिवार को लगा कि एक नया प्रोडक्ट बाजार में उतार दो। पुराने पिट जाएंगे तो कहेंगे कि अब तो हम नया प्रोडक्ट लेकर आ गए हैं। इसको आजमाकर देखें। भाई आजमाए बिना कैसे रिजेक्ट कर देंगे आप? तो अब आजमाइश का समय भी आ रहा है, लेकिन आजमाइश तो सॉफ्ट लांचिंग से नहीं होगी। राजनीति में लांच हमेशा बड़ा हार्ड होता है। बड़ी कठोर जमीन पर उतरना पड़ता है। उसके बिना आप मीडिया में खबर तो बन सकते हैं। चर्चा में भी आ सकते हैं, लेकिन जनता पर उस सबका असर नहीं पड़ता। जनता तो आपके काम से आपको परखती है। अब मामा ने तो दिखा दिया कि उसके बस का नहीं है। मम्मी जी ने भी बहुत प्रयास किया, लेकिन सफलता मिल नहीं रही है। लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा देकर भी उतरीं, तब भी कोई फायदा नहीं हुआ। तो अब नए प्रोडक्ट पर उम्मीद लगा रखी है। आने वाले दिनों में पता चलेगा कि इस नए प्रोडक्ट में कितना दम है। लोग आजमा कर रिजेक्ट करते हैं या बिना आजमाए रिजेक्ट करते हैं क्योंकि अब इस परिवार का कोई प्रोडक्ट लोग स्वीकार करेंगे, ऐसी मानसिकता दिखाई नहीं दे रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)