सपा का सबसे बड़ा समर्थक वर्ग पूछ रहा, वोट हमारा राज तुम्हारा क्यों ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में अभी चार—पांच महीने हैं, लेकिन उससे पहले ही अखिलेश यादव के सामने एक नई चुनौती आ गई है। मुस्लिम और यादव उनका कोर वोट है। इसमें यादव तो अभी भी पूरी तरह उनके साथ है,लेकिन मुस्लिम वोट को लेकर हर तरफ से हर कोई उनको डरा रहा है। इसी डर के कारण उन्होंने कांग्रेस से समझौता कर लिया। 2024 के लोकसभा चुनाव में इसका उन्हें फायदा भी हुआ। अब इसमें असदुद्दीन ओवैसी भी भाजी मार रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में इन दिनों ओवैसी बहुत ज्यादा सक्रिय हैं और वह जहां चोट कर रहे हैं, उसका जवाब देना अखिलेश यादव के लिए मुश्किल हो रहा है। ओवैसी कह रहे हैं कि मुसलमानों का 90% वोट तुम्हें मिलता है,लेकिन तुम मुसलमानों को देते क्या हो? मुस्लिम बहुल सीटों पर अपने परिवार के लोगों और गैर मुसलमानों को उम्मीदवार बनाते हो। उन्होंने कहा कि फिरोजाबाद की मुस्लिम बहुल सीट से रामगोपाल यादव के बेटे सांसद हैं। मुसलमान क्या सिर्फ दरी बिछाने के लिए है? जब देने की बात आती है तो अपने परिवार को प्राथमिकता देते हो। परिवार से जो कुछ बचता है उसके बाद किसी और के बारे में सोचते हो। इस समय अखिलेश यादव के परिवार के पांच सदस्य लोकसभा और एक सदस्य राज्यसभा में है। हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव में सपा के दो सदस्य जीते हैं। सपा को दो ही सीटें मिल सकती थीं तो एक पर उन्होंने अपने चाचा को लड़ा दिया और दूसरी रिलायंस समूह के एक अधिकारी को दे दी। वह अधिकारी सपा के सिंबल पर जीतने के बाद प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा में एक्स पर पोस्ट करता है। उसके पिता एनडीए के समर्थन से झारखंड से राज्यसभा चुनाव जीते हैं। तो अखिलेश यादव की राजनीति आखिर है क्या? परिवार के बाहर उनके लिए कोई मैटर करता है कि नहीं? अगर उनका कोर वोट मुसलमान है तो उसके लिए वह कर क्या रहे हैं,सिवाय इसके कि आप राम मंदिर नहीं जाते और हिंदुओं के खिलाफ बोलते हैं। आप चाहते हैं कि सिर्फ इन्हीं बातों से मुसलमान खुश हो जाए। मुसलमान कह रहा है कि हमारी मस्जिद और मजार गिराई जा रही है,लेकिन आप चुप क्यों रहते हैं? अखिलेश की सबसे बड़ी समस्या यही है कि सवाल बीजेपी नहीं पूछ रही है, उनका सबसे बड़ा समर्थक वर्ग पूछ रहा है। इस समर्थक वर्ग को आवाज देने का काम असदुद्दीन ओवैसी कर रहे हैं। चुनाव से ठीक पहले अगर इस तरह का नैरेटिव बनता है, जहां मुसलमानों के मन में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव को लेकर शंका पैदा होती है तो यह उनके लिए बेहद चिंताजनक है।
अब एक और संभावना जताई जा रही है कि शायद असदुद्दीन ओवैसी का चंद्रशेखर रावण की पार्टी के साथ अलायंस हो जाए। चंद्रशेखर रावण जाटव समाज से आते हैं। अगर जाटव और मुस्लिम का अलायंस हो जाता है तो निश्चित रूप से अखिलेश यादव और कांग्रेस के लिए बड़ी समस्या होगी। कांग्रेस पार्टी भी उत्तर प्रदेश में बहुत कुछ मुस्लिम वोट पर निर्भर है। अगर ओवैसी दो—चार प्रतिशत भी मुसलमानों का वोट तोड़ने में कामयाब हो जाते हैं तो इन दलों को बड़ा झटका लगेगा। पश्चिम बंगाल और असम चुनाव के बाद वैसे भी ओवैसी के लिए परिस्थितियां आसान हो गई हैं। इन दोनों राज्यों में मुसलमानों को दिख गया है कि किसी एक पार्टी के साथ पूरी तरह से जाने पर भी हम भाजपा को हरा नहीं पा रहे हैं। उनके मन में यह सवाल जरूर उठना शुरू हो गया है कि भाजपा का विरोध हम कब और कहां तक करेंगे और उससे हमको क्या मिलेगा? दूसरा ऑप्शन जो ओवैसी दे रहे हैं, वह उनके लिए और ज्यादा लुभावना है कि अपने लोगों को ज्यादा से ज्यादा विधायक और सांसद बनाओ। वे तुम्हारी आवाज उठाएंगे। अखिलेश यादव तो भाजपा के डर से मुसलमानों के मुद्दों की ज्यादा बात भी नहीं करते हैं। उनको पता है कि अगर वह इस समय मुसलमानों के लिए कोई घोषणा या कुछ करने की कोशिश करेंगे तो काउंटर पोलराइजेशन होगा। उससे भाजपा को फायदा हो जाएगा। चुनाव के इतने नजदीक अखिलेश ऐसा कुछ करने वाले नहीं हैं और ओवैसी का हमला रुकने वाला नहीं है। अखिलेश यादव की दुविधा यह है कि वह न इधर खड़े हो पा रहे हैं और न उधर। वह खुलकर मुसलमानों का साथ देने को तैयार नहीं हैं।
अखिलेश यादव अभी पिछले दिनों जेल में आजम खान से मिलने गए थे। सवाल हुआ कि इतने महीने बाद क्यों आजम खान की याद आई? आजम खान अब मुस्लिम राजनीति में अप्रासंगिक हो चुके हैं, लेकिन अखिलेश यादव को दिखाना था कि उनको मुसलमानों की बड़ी चिंता है। सवाल ये भी है कि अखिलेश ने उनको जेल से छुड़ाने के लिए क्या किया? सपा ने कोई आंदोलन किया, संसद में इस मामले को उठाया, क्या गृह मंत्री और प्रधानमंत्री से मिलकर इस मुद्दे पर चर्चा की? ऐसा कुछ तो किया नहीं। अखिलेश से पहले उनके चाचा भी जेल में आजम से मिलने गए थे। उन्होंने कहा कि हमारी सरकार बनी तो आजम खान को गृह मंत्री बना देंगे। तो लोगों को मुजफ्फरनगर का दंगा याद आ गया कि तब तो गृह मंत्री भी नहीं थे। अगर गृह मंत्री बन जाएंगे तो क्या करेंगे? तो इस समय समाजवादी पार्टी के पक्ष में कोई बात नहीं जा रही है। केवल सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देने से राजनीति नहीं चलने वाली है। सवाल यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन पर अखिलेश यादव कहां खड़े हैं और उनके पैरों के नीचे कितनी जमीन बची हुई है इसका उन्हें अहसास भी है? अखिलेश यादव की मुश्किल यह भी है कि राहुल गांधी का साथ दें या उनसे अलग हो जाएं। अब वह कांग्रेस पार्टी से अलग होने का जोखिम मोल नहीं ले सकते। अखिलेश पिछले ढाई साल से एक गलतफहमी में जी रहे हैं। उनको लग रहा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जो हुआ वही आगामी विधानसभा चुनाव में भी होने जा रहा है। अगर वह राजनीति के प्रति गंभीर होते तो देखते कि 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जिन राज्यों में भी विधानसभा चुनाव हुआ, उनमें कैसे नतीजे आए हैं। ज्यादातर राज्यों में भाजपा की प्रचंड जीत हुई है। तब से अब तक राजनीति बहुत बदल चुकी है। भाजपा तो और ज्यादा बदल चुकी है। भाजपा जिस तरह से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है उसकी तुलना में देखें तो अखिलेश यादव की कोई तैयारी ही नहीं है।
अखिलेश को गलतफहमी है कि लोग भाजपा से नाराज हैं और वे हमको वोट दे देंगे। क्यों वोट दे देंगे? जैसे ही उन्हें समाजवादी पार्टी को वोट देने का ख्याल आएगा तो उसका शासन भी याद आएगा। उस छवि को बदलने के लिए अखिलेश यादव ने पिछले 10 साल में कुछ नहीं किया है। उन्होंने अपनी पार्टी का सामाजिक आधार भी नहीं बढ़ाया, न सरकार को घेरने के लिए कोई ढंग का मुद्दा खोज पाए। अखिलेश यादव के सामने अभी तक केवल भाजपा चुनौती थी, अब असदुद्दीन ओवैसी भी चुनौती बन गए हैं। खतरा उनके घर तक आ गया है। पता नहीं उनको समझ में आ रहा है कि नहीं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)