#santoshtiwariडॉ. संतोष कुमार तिवारी।
गीता प्रेस और उसके द्वारा प्रकाशित हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ ने सनातन धर्म की जड़ें मजबूत करने में जितना योगदान किया है, उतना अन्य किसी प्रकाशन संस्था या पत्रिका ने नहीं किया। 
अप्रैल 1923 में गीता प्रेस के रूप में गोरखपुर में जो आध्यात्मिक ज्योति प्रज्वलित हुई थी, आज उसका प्रकाश पूरी मानवता का मार्गदर्शन कर रहा है। गीता प्रेस के मूल संस्थापक थे श्रीमद्भगवद्गीता के महान प्रचारक श्री जयदयाल गोयन्दकाजी (1885-1965)। उन्होंने अपना सर्वस्व इस संस्था को स्थापित करने में लगा दिया। गीता प्रेस की हिन्दी मासिक पत्रिका ‘कल्याण’ का पहला अंक अगस्त 1926 में प्रकाशित हुआ था।
प्रारम्भ के एक वर्ष तक यह पत्रिका वेंकटेश्वर प्रेस, मुम्बई में छपी और बाद में गीता प्रेस गोरखपुर से छपने लगी। ‘कल्याण’ के प्रथम सम्पादक थे श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी (1892-1971)। वह भाईजी के नाम से प्रख्यात थे। वह 1926 से अपने परलोकगमन 1971 तक अर्थात 45 वर्ष तक इसके सम्पादक रहे। आज 100 वर्ष अधिक हो गए हैं और ‘कल्याण’ नियमित प्रकाशित हो रही है। यह गीता प्रेस और समस्त हिन्दी भाषियों के लिए गौरव की बात है।
इस बीच टाइम्स ऑफ इण्डिया और हिन्दुस्तान टाइम्स जैसे बड़े प्रकाशन समूहों ने अनेक पत्रिकाएँ निकालीं और उनमें से अधिकांश बन्द हो गईं। जब इस लेख के लेखक ने वरिष्ठ पत्रकार और माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय, भोपाल के पूर्व कुलपति श्री अच्युतानन्द मिश्रजी से ‘कल्याण’ की इस सफलता का रहस्य पूछा, तो उन्होंने बताया कि ‘कल्याण’ को एक के बाद एक परम ज्ञानी, निस्पृह और सन्त परम्परा के सम्पादक मिलते गए। इनमें कुछ प्रमुख नाम हैं: भाईजी, पण्डित चिम्मनलाल गोस्वामीजी (1900–1974), स्वामी रामसुखदासजी (1904-2005), श्री राधेश्याम खेमकाजी (1935-2021)। खेमकाजी 1983 से अपने परलोकगमन 2021 तक, अर्थात कोई 38 वर्ष तक ‘कल्याण’ के सम्पादक रहे। चिम्मनलाल गोस्वामीजी को छोड़ कर ये सभी सम्पादक अवैतनिक थे। गोस्वामीजी भी मात्र उतना ही वेतन लेते थे जिसमें उनके जीवन की न्यूनतम आवश्यकताएं पूरी हो जाएं। गोस्वामीजी अपना सब कुछ बीकानेर में छोड़ कर गीता प्रेस की सेवा करने के लिए गोरखपुर आए थे। वे मार्च 1971 से अपने परलोकगमन मई 1974 तक ‘कल्याण’ के सम्पादक रहे। वह गीता प्रेस की अंग्रेजी मासिक पत्रिका ‘कल्याण-कल्पतरु’ के भी सम्पादक रहे। कल्याण में काफी समय से उनका नाम भाईजी के साथ बतौर सम्पादक छपता रहा था। गोस्वामीजी ने वाल्मिकी रामायण का अंग्रेजी में अनुवाद का बीड़ा उठाया। जब वह युद्धकाण्ड का अनुवाद कर चुके और उत्तरकाण्ड का अनुवाद कर आहे थे तभी रोग ने उनको आ घेरा और उनका शरीर शांत हो गया।
सबसे विशेष बात यह है कि स्वामी रामसुखदासजी को छोड़ कर अन्य सभी उपर्युक्त नाम जो गिनाए गए वे गृहस्त सन्त थे। चूंकि ये सब सन्त परम्परा के व्यक्ति थे, तो उसी प्रकार के लोग गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के साथ जुड़ते गए। ऐसे नामों की बड़ी लम्बी सूची है, परन्तु उनमें से कुछ इस प्रकार हैं: शान्तुन बिहारी द्विवेदी, मुनिलाल गुप्त, राधाबाबा, गम्भीरचन्द दुजारी, जानकीनाथ शर्मा, सुदर्शन सिंह ‘चक्र’, पाण्डेय रामनारायण दत्त शास्त्री, आदि। इनमें से शास्त्रीजी ने ‘कल्याण’ पत्रिका का काम तो किया ही, साथ में सम्पूर्ण महाभारत का हिन्दी अनुवाद भी किया जोकि गीता प्रेस ने छह खण्डों में प्रकाशित किया है। इससे पहले सम्पूर्ण महाभारत का हिन्दी अनुवाद कहीं उपलब्ध नहीं था। शान्तुन बिहारी द्विवेदी और मुनिलाल गुप्त ने बाद में संन्यास ले लिया था और वे आगे स्वामी अखण्डानन्दजी और स्वामी सनातनदेवजी कहलाए।

महात्मा गांधी का आशीर्वाद

भाईजी ने सन् 1926 में जब ‘कल्याण’ का प्रकाशन प्रारम्भ करना चाहा, तो वे महात्मा गांधीजी से आशीर्वाद लेने गए। गांधीजी ने उनसे कहा कि आपको एक ही शर्त पर आशीर्वाद मिलेगा कि आप ‘कल्याण’ में कभी भी कोई विज्ञापन और पुस्तक समीक्षा नहीं छापेंगे। इस कारण पिछले 100 वर्ष से आज तक ‘कल्याण’ में कोई भी विज्ञापन और पुस्तक समीक्षा नहीं छपती। साथ ही गीता प्रेस के मूल संस्थापक श्रीजयदयाल गोयन्दकाजी का नियम था कि किसी से कोई दान न लिया जाए। सच तो यह है कि विज्ञापन और दान अखबारों और पत्रिकाओं में प्रकशित सामग्री के विषय वस्तु को प्रभावित करते हैं। और पुस्तक समीक्षाओं में अधिकतर उन पुस्तकों की वाह-वाही ही की जाती है।
भाईजी यह भी पता लगाते थे कि लेखक का चरित्र कैसा है। दुष्चरित्र व्यक्ति का लेख चाहे कितना भी अच्छा हो, वह ‘कल्याण’ में नहीं छप सकता। सन् 1926 में ‘कल्याण’ का जब पहला अंक छपा, तो उसमें गांधीजी का भी एक लेख छपा था – ‘स्वाभाविक किसे कहेंगे’। उसमें रवीन्द्र नाथ टैगोर का भी एक अनुवादित लेख छपा था – ‘कामना का कुफल’। ‘कल्याण’ में ईश्वर के नाम-महात्म्य पर सदैव से ही जोर रहा है। और प्रत्येक अंक किसी न किसी ईश्वर भक्त के बारे में कोई लेख अवश्य रहता रहा है।
हिन्दी मासिक ‘कल्याण’ के पहले वर्ष के बारहवें अंक में भाईजी ने एक लेख लिखा – ‘भीख की झोली’। इसमें उन्होंने चरित्र निर्माण के बारे में अनेक सुझाव दिए। जैसे कि सप्ताह में कम से कम लगातार चौबीस घण्टे कुछ भी असत्य न बोलें और किसी प्रकार का क्रोध न करें। ऐसा करने से धीरे-धीरे सदैव ही सत्य बोलने और क्रोध त्यागने का अभ्यास हो जाएगा। अपने लेख में भाई जी ने खादी पहनने, नशा न करने की भी अपील की। उन्होंने प्रतिदिन कम से कम (हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।) मन्त्र की पांच माला (108 मनके वाली) अवश्य जपने का भी सुझाव दिया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिदिन किसी गरीब को कुछ न कुछ दान अवश्य करें। सबेरे उठते ही, स्नान के समय और भोजन के समय ईश्वर के नाम का स्मरण अवश्य करें। श्रीमद्भगवद्गीता का कम से कम एक अध्याय या उसके अर्थ का पाठ रोजाना अवश्य करें।
आज के इंटरनेट युग में ये सब बातें बहुतों को हास्यास्पद लग सकती हैं। परन्तु चरित्र निर्माण का इससे अच्छा और कौन सा मार्ग हो सकता है?

भाईजी ने भारत रत्न स्वीकार करने से मना किया

‘कल्याण’ के सम्पादक श्री राधेश्याम खेमकाजी को मरणोपरान्त भारत सरकार ने पदम् विभूषण से सम्मानित किया था। वैसे ‘कल्याण’ में कोई सम्मान प्राप्त करने की परम्परा नहीं है। जब गोविन्द बल्लभ पंत भारत के गृह मंत्री थे, तो वह श्री हनुमान प्रसाद पोद्दारजी को भारत रत्न देने का केन्द्र सरकार का प्रस्ताव लेकर उनसे मिलने गोरखपुर गए थे। इस प्रस्ताव को पोद्दारजी ने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था।

‘कल्याण’ के सम्पादक से बातचीत

इस लेख के लेखक को दो बार खेमकाजी (1935-2021) से लम्बी बातचीत करने का सौभग्य मिला था। पहले दौर की बातचीत सन् 2019 में एक बार वाराणसी में खेमकाजी (1935-2021) के निवास स्थान पर हुई थी। तब यह पता चला कि खेमकाजी सिर्फ गंगाजल ही पीते थे। अन्य कोई जल वह ग्रहण नहीं करते हैं। खेमकाजी हर एकादशी और प्रदोष को व्रत रखते हैं। हर रविवार नमकरहित भोजन करते हैं। रात्रि में गंगाजी के तट पर केदार घाट में रहते हैं। जाड़े में माघ मास में प्रयाग में कल्पवास करते हैं। इस दौरान जमीन पर सोते हैं। वह प्रात: तीन से चार बजे के बीच उठते हैं। फिर योगासन करते हैं। केवल दो प्रहर अन्न लेते हैं। बाकी दूधफल लेते हैं। नियमपूर्वक स्वाध्याय और सत्संग करते हैं। खेमकाजी से यह बातचीत ‘पाञ्चजन्य’, नई दिल्ली के 28-04-2019 के अंक में प्रकाशित हुई थी। खेमकाजी से दूसरे दौर की बातचीत करोना काल में इन्टरनेट के माध्यम से हुई थी। उसके कुछ प्रमुख अंश इस प्रकार हैं:
प्रश्न 1:  आजके दौर में गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के सामने कौन-कौन सी प्रमुख चुनौतियाँ हैं?
खेमकाजी: आजके दौर में गीता प्रेस और ‘कल्याण’ के सामने पहली चुनौती तो यह है कि आज की युवा पीढ़ी की अध्यात्म में रुचि नहीं के बराबर है। वे पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति से प्रभावित हो रहे हैं, इसका कारण है कि लोग अपने बच्चों को कानवेन्ट स्कूलों में पढ़ाते हैं और उन्हें ऐसी ही शिक्षा प्राप्त होती है। भारतीय धर्म और संस्कृति की शिक्षा देने की प्राय: कोई सुदृढ़ व्यवस्था नहीं है। इस कारण गीता प्रेस की पुस्तकों एवं कल्याण आदि के पढ़ने में उनकी रुचि बहुत कम रहती है। दूसरी बात आज के युवावर्ग को अपनी हिन्दी आदि मातृभाषाओं को पढ़ने में कठिनाई होने लगी है, वे अंग्रेजी का आधुनिक साहित्य पढ़ना अधिक पसन्द करते हैं।
अपनी सांस्कृतिक परम्पराओं को जानने वाले लेखक भी कम होते जा रहे हैं। पुराने लेखक जो चले जा रहे हैं, उनकी स्थानपूर्ति नहीं हो पा रही है।
प्रश्न 2:  आजके टेलीविज़न युग में पढ़ने की रुचि कम होती जा रही है, क्या इससे गीता प्रेस के साहित्य और कल्याण पर भी असर पड़ा है?
खेमकाजी : आजके टेलीविज़न युग में पढ़ने की रुचि कम होती जा रही है – यह बात सही है। और इसका गीता प्रेस के साहित्य और ‘कल्याण’ के प्रसार पर भी असर होना स्वाभाविक है। मुख्यरूप से टेलीविज़न की अपेक्षा मोबाइल (स्मार्ट फोन) और इन्टरनेट ने इस पीढ़ी को अत्यधिक प्रभावित किया है। फिर भी अभी तक हम इससे विशेष प्रभावित नहीं हैं।
प्रश्न 3:  धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में गीता प्रेस और कल्याण से लोगों की बहुत अपेक्षाएँ हैं। आप उनको किस प्रकार पूरी करने का प्रयास कर रहे हैं? 
खेमकाजी: मनुष्य-जीवन का एकमात्र उद्देश्य है – अपना कल्याण करना। ‘कल्याण’ का तात्पर्य है कि इस लोक के साथ परलोक में भी सुख, समृद्धि और शान्ति प्राप्त हो। परलोक की बात अपने शास्त्र बताते हैं। अपने सम्पूर्ण शास्त्रों का सार श्रीमद्भगवद्गीता में समाहित है। इसीलिए गीता प्रेस का उद्देश्य शास्त्रों के साथ गीता का प्रचार-प्रसार करना विषेशरूप से रहा है। गीता में मुख्य रूप से मनुष्य को कर्तव्य की शिक्षा दी गई है, परंतु प्रश्न उठता है कि कर्तव्य का निर्णय कैसे हो? इसके लिए भगवान् ने गीता में स्पष्ट शब्दों में कहा है –
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 24) 
‘क्या करना चाहिए, क्या नहीं करना चाहिए – इसके लिए शास्त्र ही प्रमाण हैं।‘ इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा –
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥  
(श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 16, श्लोक 23)
‘जो व्यक्ति शास्त्र के बताए मार्ग को छोड़ कर अपनी मनमानी करता है, उसे न तो किसी प्रकार की सिद्धि प्राप्त होती है, न उसे सुख प्राप्त होता और न परमगति ही प्राप्त होती है’ – ये वचन साक्षात भगवान् के हैं, इसीलिए गीता प्रेस और कल्याण प्रारम्भ से ही शास्त्रसम्मत, कल्याणकारी, आध्यात्मिक विचारों का प्रचार-प्रसार जनमानस में करने का प्रयास करता है।
प्रश्न 4: गीता प्रेस लागत से कम मूल्य पर अपनी पुस्तकें और पत्रिकाएँ देता है, ऐसे में आपकी अर्थव्यवस्था कैसे चलती है?
खेमकाजी: सर्वविदित है कि गीता प्रेस किसी प्रकार का दान नहीं लेता तथा कल्याण में विज्ञापन भी नहीं छापे जाते। फिर भी भगवत्कृपा से कुछ व्यापारिक गतिविधियों से इसका कार्य सुचारुरूप से चलता रहता है, परंतु वर्तमान परिस्थिति में कई प्रकार की आर्थिक कठिनाइयाँ सामने दिखाई पड़ रही है। गीता प्रेस ठाकुरजी की (ईश्वर की) संस्था है और ठाकुरजी ही इसका समाधान करेंगे।

‘कल्याण’ के विशेषांक 

सन् 1926 में प्रवेशांक के बाद अगले वर्ष ‘कल्याण’ का पहला विशेषांक प्रकाशित हुआ इसका शीर्षक था – भगवन्नाम अंक. इसमें भी महात्मा गांधी का एक लेख था – ‘नाम महिमा’। श्री जयदयाल गोयन्दकाजी का भी एक लम्बा लेख था – ‘ईश्वर साक्षत्कार के लिए नाम-जप सर्वोपरि साधन है’। कल्याण मासिक पत्रिका अपने विशेषांकों के लिए प्रसिद्ध रही है। हर वर्ष के प्रारम्भ इसका विशेषांक निकलता है। पाठकगण इन विशेषांकों का बेसब्रीसे इंतजार करते हैं। ‘कल्याण’ के अबतक प्रकशित विशेषांकों की सूची इस प्रकार है:
भगवन्नाम अंक, भक्त-अंक, श्रीमद्भगवदगीता अंक,  रामायणांक, श्रीकृष्णांक, ईश्वरांक, शिवांक,  शक्ति-अंक, योगांक, वेदान्त-अंक, संत-अंक, मानस-अंक, गीता-तत्वांक,  सधानांक, भागवतांक, संक्षिप्त महाभारतांक, संक्षिप्त वाल्मीकि-रामायणांक, संक्षिप्त पद्मपुराणांक, गो-अंक, संक्षिप्तमार्कन्डेय-ब्रह्मपुराणांक, नारी-अंक, उपनिषद्-अंक, हिन्दू-संस्कृति-अंक, संक्षिप्त स्कन्दपुराणांक, भक्त-चरितांक,  बालक-अंक, संक्षिप्त-नारद-विष्णुपुराण अंक, संत-वाणी अंक,  सत्कथा अंक, तीर्थांक, भक्ति-अंक, मानवता-अंक, संक्षिप्त देवीभागवत-अंक, संक्षिप्त योगवासिष्ठ-अंक, संक्षिप्त शिवपुराण अंक, संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्त्त पुराण अंक, श्रीकृष्ण-वचनामृत अंक, श्री भगवन्नाम-महिमा और प्रार्थनांक, धर्मांक, श्री रामवचनामृत अंक , उपासना-अंक,  परलोक और पुनर्जन्मांक,  अग्निपुराण गर्ग संहिता अंक, अग्निपुराण गर्ग संहिता नरसिंह पुराण अंक, श्रीराम अंक, श्रीविष्णु-अंक, श्री गणेश-अंक, श्रीहनुमान-अंक, श्रीभगवत्कृपा-अंक , संक्षिप्त वाराह पुराण, सदाचार अंक, सूर्यांक, निष्काम कर्मयोग अंक, भगवतत्वांक, श्रीवामन पुराण अंक , चरित्र निर्माण अंक, मत्स्यपुराणांक (पूर्वार्ध), मत्स्यपुराणांक (उत्तरार्ध), संकीर्तनांक, शक्ति-उपासना-अंक,  शिक्षा-अंक, पुराण-कथांक, देवतांक, योगत्वांक, संक्षिप्त भविष्य-पुराण अंक, शिवोपासनांक, श्रीरामभक्ति-अंक, गोसेवा-अंक, धर्मशास्त्रांक, कूर्मपुराण अंक, भगवल्लीला-अंक, वेद-कथांक, संक्षिप्त गरुड़ पुराण अंक,  आरोग्य अंक, नीतिसार-अंक, भगवत्प्रेम-अंक, व्रतपर्वोत्सव-अंक, देवीपुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक,  संस्कार-अंक, अवतार-कथांक, श्रीमद्देवीभागवतांक  (पूर्वार्ध), देवीभागवतांक (उत्तरार्ध), जीवनचर्या अंक, दान-महिमा अंक, लिंगमहापुराणांक, भक्तमाल अंक,  ज्योतिषतत्वांक, सेवा अंक,  गंगा अंक, श्रीशिवमहापुराण अंक (पूर्वार्ध), श्रीशिवमहापुराण अंक (उत्तरार्ध), श्रीराधामधाव अंक, बोध कथा अंक, श्रीगणेश पुराण अंक , कृपानुभूति अंक, दैवी सम्पदा-अंक, आनन्द रामायण-अंक, पर्यावरण-अंक, शताब्दी-अंक।
कल्याण के उपर्युक्त विशेषांकों में से अनेक की मांग आज भी बनी हुई है और वे कई बार पुनर्मुद्रित हो चुके हैं। इनमें शामिल हैं: नारी अंक, हनुमान अंक, ज्योतिष अंक, श्रीगणेश पुराण अंक, भक्तमाल अंक, हिन्दू संस्कृति अंक, आदि।

कल्याण के सम्पादकों का कार्यकाल

कल्याण के अब तक के सभी सम्पादकों का कार्यकाल इस प्रकार रहा:
हनुमान प्रसाद पोद्दार अगस्त 1926 से फरवरी 1971
चिम्मन लाल गोस्वामी मार्च 1971 से मई 1974
स्वामी रामसुखदास जून 1974 से जुलाई 1976
मोतीलाल जालान अगस्त 1976 से अक्टूबर 1982
राधेश्याम खेमका नवम्बर 1982 से फरवरी 1983
राधेश्याम खेमका मार्च 1983 से फरवरी 2005
प्रेमप्रकाश लक्कड़ मार्च 2005 से जनवरी 2026
इन्हीं महानुभावों के कुशल सम्पादन में ‘कल्याण’ उपर्युक्त विशेषांकों का प्रकाशन संभव हो पाया। वर्ष 2027 का ‘कल्याण’ के विशेषांक का विषय होगा – राष्ट्रभक्ति अंक।

ब्रिटिश सरकार का कल्याण पर प्रतिबन्ध

वर्ष 1946 में कल्याण का एक अतिरिक्त अंक भी निकला था। यह था – महामना मालवीय श्रद्धांजलि अंक। इसे ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबन्धित कर दिया था।

भाईजी ने महात्मा गांधीजी की जमकर आलोचना की

वैसे तो भाईजी और महात्मा गांधीजी का सम्बन्ध बहुत प्रगाढ़ थे, परन्तु एक समय ऐसा भी आया जब भाईजी ने गांधीजी की जमकर आलोचना की। वर्ष 1946 में जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे के दौरान बंगाल और बिहार में हजारों हिन्दुओं का कत्लेआम हुआ, तो गांधीजी के अन्यायपूर्ण रवैये की भाईजी ने घोर भर्त्सना की।

कल्याण के ग्राहक विदेशों में भी हैं

आज कल्याण पत्रिका भारत के अतिरिक्त आस्ट्रेलिया, कनाडा, जर्मनी, मारिसस, न्यूजीलैंड, सिंगापुर, ब्रिटेन, अमेरिका, जांबिया, युगांडा, यूएई, श्रीलंका, नार्वे, फिजी, नेपाल व चीन में भी पहुंचकर पाठकों का ‘कल्याण’ कर रही है।
भारत में और विदेशों में जो लोग ‘कल्याण’ के ग्राहक बनना चाहें, वे व्हाट्सएप नम्बर पर संपर्क कर सकते हैं: +91-9235400242. यह नम्बर ‘कल्याण’ पत्रिका में प्रकाशित होता है।  

कल्याण ने इस्कॉन की भी मदद की   

स्वामी प्रभुपादजी (1896-1977) एक मालवाहक जहाज से 17 सितम्बर 1965 को भारत से  अमेरिका पहुंचे थे। तब उनकी आयु 69 वर्ष थी। नौ महीने के अन्दर उन्होंने वहां न्यूयॉर्क में पहला राधा कृष्ण मन्दिर स्थापित कर दिया था। और उसके दो महीने के अन्दर वहां इस्कॉन (International Society for Krishna Consciousness – ISKCON) की स्थापना की। उस समय इस्कॉन के सभी डायरेक्टर अमेरिकी थे। प्रभुपादजी की योजना थी कि अमेरिका, यूरोप और विश्व के अन्य नगरों में अन्य कई इस्कॉन मन्दिर स्थापित किए जाएं। परन्तु वहां इतनी संख्या में राधा कृष्ण की मूर्तियां उपलब्ध नहीं थीं।
प्रभुपादजी ने 4 मार्च 1970 के अपने एक पत्र में भाईजी से अनुरोध किया कि वह भविष्य में भारत से मूर्तियां भिजवाने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करें। तब भाईजी ने ‘कल्याण’ के अप्रैल 1970 के अंक में इस्कॉन के बारे में छपे एक लम्बा लेख छापा। उस लेख में इस आशय की अपील भी की गई कि प्रभुपादजी को भारत से मूर्तियां भेजी जाएं। उस लेख में प्रभुपादजी का अमेरिका का पता भी छापा गया, ताकि पाठकगण सीधे उनसे संपर्क कर सकें। और पाठकों ने  श्री प्रभुपादजी को भारत से सीधे पत्र लिखे भी।
अपने जीवन काल के शेष बचे अगले सात वर्षों में प्रभुपादजी ने विश्व के अनेक बड़े नगरों में इस्कॉन के 108 केन्द्र स्थापित कर दिए थे।
अभी हाल में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवतजी अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान न्यूयार्क के उस मन्दिर में गए थे जिसे प्रभुपादजी ने स्थापित किया था और जो दुनिया का पहला इस्कॉन मन्दिर है।
प्रभुपादजी दो बार भाईजी से मिलने गोरखपुर गए
प्रभुपादजी अपने जीवन काल में  भाईजी से मिलने दो बार गोरखपुर गए थे। एक बार सन् 1962 में और दूसरी बार फरवरी 1971 में।
गोरखपुर में 15 फरवरी 1971 को अपने एक लेक्चर में स्वामी प्रभुपाद जी ने कहा था:
मैंने सन् 1950 में घर छोड़ा था। फिर सन् 1959 तक इधर-उधर रहा। सन् 1959 में मैंने संन्यास ले लिया। तब किसी मित्र ने कहा कि तुम कोई पुस्तक क्यों नहीं लिखते। तब मैंने श्रीमद् भागवतम् का अंग्रेजी में अनुवाद शुरू किया। जब इसका पहला खण्ड समाप्त हो गया, तो सन् 1962 में मैं भाईजी के पास आया। और मैंने उनसे इसके प्रकाशन की इच्छा व्यक्त की।

मैं तो संन्यासी था मेरे पास तो कोई धन था नहीं।

भाईजी ने मुझसे कहा के हमारे यहाँ अंग्रेजी प्रिंटिंग की बहुत अच्छी व्यवस्था नहीं है। आप इसे कहीं और से छपवा लो। भाई जी ने कहा कि मैं भी उसमें आपकी थोड़ी-बहुत मदद कर दूंगा।
तो उन्होंने डालमिया ट्रस्ट से कुछ धन दिला दिया जिससे कि श्रीमद् भागवतम् का पहला खण्ड प्रकाशित हो पाया।  इसके लिए मैं भाईजी का बहुत एहसानमंद हूँ।

गीता सेवा ट्रस्ट का महत्व क्यों   

‘कल्याण’ के शुरू से लेकर अभी तक के सभी विशेषांक और साधारण अंक धीरे-धीरे Gita Seva Trust App पर अपलोड किये जा रहे हैं। अब तक वर्ष 1931 तक के अंक अपलोड हो चुके हैं। इस एप्प पर इनको फ्री में पढ़ा जा सकता है। गीता प्रेस ने 15 भाषाओँ में लगभग 1600 पुस्तकें प्रकाशित की हैं। इनमें से कई सौ पुस्तकें इस एप्प पर अपलोड हो चुकी हैं। स्वामी रामसुखदास, श्रीजयदयालजी गोयन्दाका और भाईजी के कई सौ प्रवचन के आडियो भी इस एप्प पर उपलब्ध हैं।

‘कल्याण’ का प्रमुख योगदान क्या रहा 

अनेक लोगों ने गीता प्रेस और ‘कल्याण’ पर पीएच.डी. की है। उनमें एक जाना-माना नाम है – डॉ. रजनीश चतुर्वेदीजी। इस लेख के लेखक ने डॉ. चतुर्वेदीजी से पूछा कि ‘कल्याण’ का मुख्य योगदान क्या रहा है, तो उन्होंने बताया:
‘कल्याण’ का सबसे बड़ा योगदान यह है कि उसने पत्रकारिता को व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज-निर्माण का मिशन माना। ‘कल्याण’ ने सत्य, धर्म, करुणा, सेवा और नैतिक मूल्यों को पत्रकारिता के केंद्र में रखा। इसने वेद, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत और संत साहित्य जैसे भारतीय ज्ञान-परंपरा को सरल भाषा में जन-जन तक पहुँचाया। इसने धर्म को केवल कर्मकांड के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक जीवन और लोक कल्याण से जोड़कर प्रस्तुत किया। और कम मूल्य पर उच्च गुणवत्ता की सामग्री उपलब्ध कराकर समाज के सभी वर्गों तक आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक ज्ञान पहुँचाया।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)