अखिलेश यादव को भाजपा से कम,अपने कट्टर समर्थक से ज्यादा खतरा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीति बड़ी बेरहम होती है, यह सबको पता है। लेकिन भाजपा वाले अपने विरोधियों के प्रति कुछ ज्यादा ही बेरहम होते हैं। हाल ही में विधान परिषद की स्नातक और शिक्षक सीटों के चुनाव हुए। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी ने इसमें 11 में से 5 सीटें जीतीं। पिछली बार चार जीती थीं। भाजपा 6 सीटें जीती। सपा को पिछली बार से एक सीट ज्यादा मिलने से अखिलेश बेहद खुश थे, लेकिन शुक्रवार को लखनऊ पहुंचे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जो बात कही उससे अखिलेश यादव को लगा होगा कि उनकी जीत की खीर में शाह ने नमक डाल दिया। अमित शाह ने कहा कि बीजेपी उत्तर प्रदेश में अंगद का पांव है। उसे कोई हिला नहीं सकता। इस बार सरकार बनने के बाद यूपी में यूसीसी भी आएगा।
विधान परिषद के इन चुनावों को सेमीफाइनल बताया जा रहा था और कहा जा रहा था कि इसे अखिलेश यादव जीत गए। हालांकि हकीकत दूसरी है। उत्तर प्रदेश विधान परिषद में कुल 100 सीटें हैं और इस चुनाव के बाद भाजपा की सीटों की संख्या 84 हो गई है जबकि सपा की सीटें 15 हो गई हैं। इससे आप अंदाजा लगा लीजिए कि इस चुनाव ने कितना बड़ा बदलाव किया है। तो अमित शाह ने यूसीसी लाने की बात कह करके यूपी विधानसभा चुनाव का एजेंडा सेट कर दिया है। अब देखिए किसी भी चुनाव में राजनीतिक दलों को एक दुश्मन की जरूरत होती है, जिसको प्रतिद्वंद्वी या प्रतिस्पर्धी कहते हैं क्योंकि कंट्रास्ट खड़ा करना पड़ता है। आपको अपने को अच्छा बताने के लिए अपनी अच्छाइयां बताने के अलावा अपने विरोधी की बुराइयां भी बतानी पड़ती हैं। अब अखिलेश यादव के सामने मुश्किल यह है कि वह भाजपा की कोई बुराई और अपनी अच्छाई बताने की स्थिति में नहीं हैं। जैसे ही वह समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौर की याद दिलाते हैं तो लोग डर जाते हैं और उनको लगता है कि सपा की सरकार तो नहीं ही आनी चाहिए। भाजपा के सामने इस समय मुश्किल यह है कि उसने पिछले 10 साल में उत्तर प्रदेश में इतना कुछ कर दिया है कि उसका जो पॉजिटिव है, वह सामान्य सा लगता है। 10 साल से उत्तर प्रदेश में दंगा नहीं हुआ, बिजली की कोई कमी नहीं है, सड़कें देश में सबसे अच्छी हैं, देश में सबसे ज्यादा मेडिकल कॉलेज हैं। इसके अलावा गैस कनेक्शन, शौचालय, घर ये सारी सुविधाएं भी हैं। इनमें अब कोई नयापन नहीं रह गया है। तो भाजपा को एक बिजूका की जरूरत है। किसी की नजर न लगे और फसल को चिड़ियों से बचाने के लिए खेत में बिजूका खड़ा किया जाता है। राजनीतिक दृष्टि से कह रहा हूं कि समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव से बेहतर भाजपा के लिए कोई बिजूका हो ही नहीं सकता। भाजपा को केवल समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौरान हुए कार्यकालापों की बात करनी है। अखिलेश यादव की मुश्किल यह है कि उनका जो सबसे मजबूत पक्ष है, वही सबसे कमजोर पक्ष भी है। यानी उनका कोर वोट मुस्लिम और यादव। उनका यादव वोट जब सक्रिय होता है और सड़क पर आता है तो वह लोगों को समाजवादी पार्टी से जोड़ता नहीं, उससे दूर भगाता है। इस समय अखिलेश यादव की सबसे बड़ी चिंता यही है कि उनका कोर वोट सड़क पर न उतरे। इसीलिए आपने ध्यान दिया होगा कि विधान परिषद के चुनाव में अखिलेश यादव जीत का चाहे जितना डंका बजा रहे हों, वह अपने कार्यकर्ताओं से कह रहे हैं कि विजय जुलूस मत निकालना। उनको मालूम है कि जुलूस निकलेगा तो क्या होगा। उनको बीजेपी से ज्यादा अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों से डर है कि जब वे सीना फुलाकर सड़क पर निकलेंगे तो उसके बाद लोग अपने घर में छिप जाएंगे और कहेंगे कि भैया, यह सरकार तो नहीं चाहिए।
तो बीजेपी को चुनाव प्रचार में अपनी उपलब्धियों से ज्यादा इस बात का प्रचार करने की जरूरत है कि समाजवादी पार्टी की सरकार में क्या हो रहा था और अगर ये सत्ता में आ गई तो क्या होगा? ये ऐसा टाइम टेस्टेड फार्मूला है, जो हर कालखंड में काम करता है। आप देखिए कि लालू प्रसाद यादव का जंगल राज बिहार के हर चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा बनता है क्योंकि वह लोगों के मन में डर पैदा करता है। वह लोगों को उनकी जिंदगी के सबसे भयावह काल की याद दिलाता है। लोग नहीं चाहते हैं कि वह दौर फिर से लौट कर आए। उनके बच्चों का भविष्य खराब हो। उनके जान—माल की सुरक्षा खतरे में पड़े। तो उत्तर प्रदेश के लोगों ने पिछले 10 साल में जैसी कानून व्यवस्था, शांति और अपने जान—माल की सुरक्षा देखी, उनको समझ में आ रहा है कि इसको बिगड़ने नहीं देना है। इसमें किसी जाति या किसी धर्म—मजहब का भेदभाव नहीं है। कोई नहीं कह सकता कि वह योगी जी के राज में जितना सुरक्षित है, उससे ज्यादा सुरक्षित अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव के राज में महसूस करता था। हां, उस समय का जो गुंडा और माफिया तत्व है, वह जरूर दुखी है। उसके अच्छे दिन खत्म हो गए और कभी लौट कर नहीं आने वाले। आप एक सामान्य मुसलमान से भी पूछिए, भले ही वह वोट बीजेपी को नहीं देगा, लेकिन वह यह नहीं चाहेगा कि समाजवादी पार्टी का राज लौट कर आए। तो भारतीय जनता पार्टी ही क्या हर पार्टी को एक ऐसे विरोधी की जरूरत होती है, जिसकी छवि बिल्कुल नकारात्मक हो और जिसकी चर्चा से लोग डर जाएं। उस रूप में समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव उसके सामने जीता जागता उदाहरण हैं।
मैं बार-बार कह रहा हूं कि बीजेपी के संगठन में खामियां लगातार बढ़ती जा रही हैं। यह पार्टी कम से कम उत्तर प्रदेश में तो संगठन के बल पर नहीं चल रही है। ये तीन नेताओं मोदी, योगी और अमित शाह के बूते पर चल रही है। इन तीनों को आप सीन से हटा दीजिए। देखिए बीजेपी का किला कैसे भरभरा कर गिरता है। अखिलेश यादव के बस का नहीं है कि इन तीन में से किसी को छू सकें। इसलिए मैं बार-बार कहता हूं कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने की कोई संभावना नहीं है। अखिलेश यादव को बीजेपी से नहीं लड़ना है। उनको उनके जो कट्टर समर्थक हैं, उनसे लड़ना है क्योंकि समाज के लिए खतरा उनके ये कट्टर समर्थक ही हैं। यह खतरा ऐसा है जिसको लोग भुगत चुके हैं। समाजवादी पार्टी चार बार में कुल मिलाकर 13 साल उत्तर प्रदेश में सत्ता में रही है। मतदाता पहली बार माफ कर सकता है, दूसरी और तीसरी बार माफ कर सकता है पर चौथी बार तो बिल्कुल नहीं कर सकता। इसका मतलब है कि ये बदलने वाले नहीं। आप अखिलेश यादव के भाषण और बयान सुनिए। आपको समझ में आएगा कि वह भाजपा से भी ज्यादा अपने लोगों से डरे हुए हैं। उनको डर है कि उनके लोग अगर बाहर निकले तो उनको सत्ता से और दूर ले जाएंगे। अखिलेश यादव के लिए 2027 का चुनाव सत्ता की लड़ाई नहीं है। यह राजनीतिक अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है। जिस तरह से गृह मंत्री अमित शाह ने शुरुआत की है, उससे साफ है कि भाजपा उन्हें कोई मुरव्वत देने के मूड में नहीं है। तो 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जो विहंगम दृष्टि है, वह बता रही है कि अखिलेश यादव लड़ाई के मैदान में कहीं नहीं हैं और इसके लिए सबसे ज्यादा अगर कोई जिम्मेदार है तो उनके अपने लोग हैं। अपने लोगों से वह कैसे लड़ेंगे और लड़ना भी चाहते हैं क्या? अगर चाहते होते तो पिछले 10 साल में बदलने की कोशिश करते। उन्होंने कभी नहीं कहा कि हमारी पिछली सरकारोंं ने बहुत गलतियां कीं। अब हम उन गलतियों को दोहराएंगे नहीं। इसका मतलब वह उस दौर के सारे कारनामों को एंडोर्स करते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)