20 पार्टियां मिलकर दिल्ली जैसे महानगर में 50 हजार लोगों को नहीं जुटा पाईं।
इंडी गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग को लेकर 1 नवंबर को दिल्ली में रैली की। इसे लेकर राहुल गांधी ने दिल्ली चलो का नारा दिया था। वह दावा कर रहे थे कि इसमें 10 लाख से ज्यादा की भीड़ जुटेगी,लेकिन 20—22 पार्टियां मिलकर 50 हजार लोगों को नहीं जुटा पाईं।
इस रैली में राहुल गांधी का भाषण जिसने भी सुना होगा, वह हंस रहा होगा। उन्होंने कहा कि अगर ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त न होते तो न तो नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री होते और न ही अमित शाह गृह मंत्री होते। अब आप उनकी इस बात से समझिए कि मूर्खता के अहंकार में जब आदमी सातवें आसमान पर पहुंच जाता है तो वह कुछ भी बोलता है। अब या तो उनको मालूम नहीं है या जानबूझकर नहीं जानने का दिखावा कर रहे थे कि ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त 2025 में बने। नरेंद्र मोदी मई 2024 में तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री और अमित शाह दूसरी बार देश के गृहमंत्री बन चुके थे। इसलिए यह कहना कि ज्ञानेश कुमार के कारण बने हैं पूरी तरह से गलत है। राहुल गांधी ने एक और बात कही कि 2024 में भी वोट चोरी हुई थी। एक मिनट के लिए मान लें कि वोट चोरी हुई थी तो भाई उसी वोट चोरी से तो आप भी जीते हैं। तो दूसरों से इस्तीफा मांगने से पहले अपना इस्तीफा दीजिए कि मैं वोट चोरी से जीता हूं। सबसे बड़ी बात भाजपा अगर वोट चोरी से जीत रही है तो 2014 में कैसे जीती? तब तो आपकी सरकार थी। अब इसके दो ही मतलब होते हैं कि सत्ता से बाहर रहते हुए भाजपा वोट चोरी करा सकती है और आप सरकार में होते हुए भी इतने निकम्मे हैं कि उसको पकड़ नहीं सकते तो सरकार के बाहर आकर आप क्या कर लेंगे? कुल मिलाकर इस रैली के जरिए राहुल गांधी और उनके साथी दलों के नेताओं ने अपनी कमजोरी को और ज्यादा उजागर किया है। ये नेता रैली से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा कर रहे थे कि वोट चोरी को लेकर देशभर में सरकार के खिलाफ बहुत नाराजगी है,लेकिन 1 नवंबर को पूरे देश को पता चला कि इस मुद्दे पर राहुल गांधी और उनके साथियों के साथ जितनी पार्टियां थीं, उनके कार्यकर्ता ही उनके साथ नहीं हैं बाकी आम जनता को तो छोड़ ही दीजिए। आम जनता को अच्छी तरह से मालूम है कि उसका वोट चोरी नहीं हुआ। वह अपने वोट के अधिकार का इस्तेमाल कर रही है।
दरअसल राहुल गांधी और उनके साथी दो लोगों का वोट बचाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। पहला, जो लोग इस दुनिया में नहीं हैं और दूसरा बांग्लादेशी एवं रोहिंग्या घुसपैठिये। घुसपैठियों के वोट कटने का इनका दर्द बहुत बड़ा है और उन्हीं के वोट जुड़वाना चाहते हैं। इसलिए आप उनकी मांगों पर ध्यान दीजिए। वे कह रहे हैं कि पुरानी वोटर लिस्ट बहाल करो। अब ये घुसपैठिये किसको वोट देंगे, इसमें तो कोई शक है नहीं। तो राहुल गांधी और उनके साथियों का जो ढका छिपा एजेंडा था, वह उजागर हो गया। लेकिन एजेंडा उजागर हो जाना मेरी नजर में कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है आपके जनसमर्थन की पोल खुल जाना। अगर आप यह रैली न करते तो एक परसेप्शन बनाकर रख सकते थे कि देश में बहुत बड़ी संख्या में लोग हमारे साथ हैं। हरियाणा बगल का राज्य है। केसी वेणुगोपाल ने दीपेंद्र हुड्डा को जिम्मेदारी सौंपी थी कि हरियाणा से दो लाख लोगों को लेकर आना है। अब आप बताइए कि दीपेंद्र हुड्डा कितने लोगों को लेकर आए? हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल, उत्तर प्रदेश ये सभी दिल्ली से सटे राज्य हैं। दिल्ली एनसीआर की ही लगभग दो करोड़ आबादी है फिर भी भीड़ न जुटा पाना बताता है कि लोग खाली नहीं हैं। लोग तमाशा देखने अपनी मर्जी से अपने घर के आसपास जाते हैं, लेकिन दिल्ली आकर राहुल गांधी और उनके साथियों का तमाशा देखने के लिए तैयार नहीं हैं। इन लोगों ने एक तमाशा रैली से एक दिन पहले भी किया। एक नकली पार्लियामेंट में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पास करा दिया। तो आप कल्पना में तो कुछ भी कर सकते हैं। आप नकली राष्ट्रपति भवन बनाकर वहां पर अपने को प्रधानमंत्री पद की शपथ भी दिलवा सकते हैं। उससे आप प्रधानमंत्री हो जाएंगे क्या? सवाल यह है कि आप संदेश क्या देना चाहते हैं? आप सारी संवैधानिक संस्थाओं पर हमला कर रहे हैं और बात जनतंत्र को बचाने की कर रहे हैं। दरअसल आप जनतंत्र को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि आप इस निष्कर्ष पर पहुंच चुके हैं कि जनतंत्र के जरिए आपको सत्ता नहीं मिल सकती। राहुल गांधी और उनके साथियों के लिए दुर्भाग्य की बात यह है कि इस देश का मतदाता बहुत ज्यादा समझदार है। वह जानता है कि आपकी नीयत और क्षमता क्या है? वह राहुल गांधी को 22 साल से परख रहा है। उसे उन पर विश्वास नहीं हुआ और आगे कभी होगा भी नहीं। ममता बनर्जी, तेजस्वी यादव, अखिलेश यादव भी जनता द्वारा ट्राइड, टेस्टेड और रिजेक्टेड लोग हैं। एसआईआर को लेकर आपने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की हुई है। उस पर 17 नवंबर को सुनवाई है। अगर आप इस मुद्दे को लेकर गंभीर होते तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करते। चुनाव आयोग या सरकार के खिलाफ फैसला आता और तब आप आंदोलन शुरू करते तो उसमें लोगों को कुछ दम नजर आता। आप तो सुप्रीम कोर्ट पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहे हैं,लेकिन आपको अंदाजा नहीं है कि ऐसी चीजों से दबाव बनता नहीं है। भारत में ऐसा कभी नहीं हुआ। आजादी के बाद जेपी मूवमेंट से बड़ा कोई आंदोलन इस देश में नहीं हुआ लेकिन तब जो सरकार थी उसको जबरन नहीं हटा दिया गया या अदालत ने आदेश नहीं दिया कि अब आप इस्तीफा दीजिए। चुनाव के जरिए जनता ने उसे हटाया। आपके पास अगर सही मुद्दा है और उस मुद्दे पर लोगों का समर्थन है फिर भी जो काम होगा वह कानूनी और लोकतांत्रिक तरीके से ही होगा। ऐसा नहीं होगा कि संविधान बदल दिया जाएगा। संविधान वही बदलेगा, जो डरा हुआ होगा। इंदिरा गांधी 1975 में डरी हुई थीं इसलिए संविधान बदला और इमरजेंसी लगाई। यह सरकार डरी हुई नहीं है।
मुझे लगता है कि 1 नवंबर को अगर देश में सबसे ज्यादा कोई खुश हुआ होगा तो वह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार। उनको लगा होगा कि ये कैसे लोग मेरे खिलाफ खड़े हैं, जिनकी कोई ताकत और क्षमता नहीं है। राहुल गांधी 100 जन्म भी ले लें तो भी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को उनके कार्यकाल से पहले हटा नहीं सकते। इसलिए इस पूरी कंट्रोवर्सी के दौरान जो भी चिंता मुख्य चुनाव आयुक्त के मन में रही होगी, वह सब 1 नवंबर को दूर हो गई होगी। जिस नेता के साथ उसके अपने समर्थक न हों, आप समझ लीजिए वह कितना कमजोर और नाकारा है। जनतंत्र में संख्या का सबसे ज्यादा महत्व होता है और उस दृष्टि से देखें तो यह रैली सुपर फ्लॉप थी। इस रैली से ये जिनको डराना चाहते थे, वे हंस रहे होंगे। तो राहुल गांधी को इस देश के लोगों ने आईना दिखा दिया है। अब चाहें तो वह आईना तोड़ दें और चाहें तो आईने में अपनी शक्ल देखकर समझ जाएं कि जनता ने उनको क्या संदेश दिया है। जनता ने उनको संदेश दिया है कि तुमसे न हो पाएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











