उत्तर प्रदेश से अलग होकर 9 नवंबर 2000 को भारत के 27वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आए उत्तराखंड राज्य की 26वीं सालगिरह (स्थापना दिवस) 9 नवंबर 2026 को मनाई जा रही है।
उत्तराखंड राज्य की 26वीं सालगिरह पर निसंदेह हम पहाड़ के लिए कुछ चमकदार भी देख रहे हैं। पर, इसके साथ ही कुछ गंभीर सवाल भी हैं जिनसे आंखें नहीं चुराई जा सकतीं। पहले चमकदार की बात करें। हमने देखा कि पिछले साल अप्रैल में भारत की सबसे लंबी रेल सुरंग का किस तरह सफलतापूर्वक मुंह खुल गया। यह ऐतिहासिक ‘ब्रेकथ्रू’ (दोनों छोरों का आपस में मिलना) केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की उपस्थिति में पूरा हुआ था। देवप्रयाग के सौड़ से श्रीनगर के जनासू तक 14.57 किलोमीटर लंबी सुरंग उत्तराखंड की ही नहीं, पूरे भारत में सबसे लंबी रेलवे सुरंग है। यह 125 किलोमीटर लंबी ऋषिकेश-कर्णप्रयाग ब्रॉड गेज रेल परियोजना का हिस्सा है। इस परियोजना का 105 किलोमीटर का मार्ग यदि सुरंग के रूप मे है तो कल्पना की जा सकती है कि उत्तराखंड में रेल सेवाओं का विस्तार इस राज्य के लिए आजाद भारत की कितनी बड़ी नेमत है।
कामयाबी की नई इबारत
केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव का यह बयान ध्यान देने योग्य है- ‘’यह पहली बार है जब देश के पहाड़ी इलाकों में रेल सुरंग बनाने के लिए टीबीएम तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। 9.11 मीटर व्यास वाली इस सिंगल-शील्ड रॉक टीबीएम ने काम में जो तेजी और सटीकता दिखाई है, वह वैश्विक स्तर पर भारत का एक नया मापदंड है। इस उपलब्धि के साथ रेल विकास निगम लिमिटेड (आरवीएनएल) ने भारत के सबसे मुश्किल इलाकों में आधुनिक निर्माण तकनीक में अपनी मजबूत जगह बनाई है। यह सफलता न सिर्फ एक सुरंग की कहानी है, बल्कि एक नए, मजबूत और कनेक्टेड भारत की शुरुआत है।’’
रेलमंत्री के इस बयान के मद्देनजर जब हम मजबूत और कनेक्टेड भारत की बात करते हैं तो खासकर उत्तराखंड जैसे संवेदनशील राज्य के संदर्भ में हमें बेहद संभलकर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। उत्तराखंड एक हिमालयी राज्य है और इसके कंधों पर सरहद के साथ-साथ देश की पर्यावरण सुरक्षा का भी भार है। हम यह न भूलें कि ऐतिहासिक चिपको आंदोलन की स्वर्णजयंती मनाकर हमने पिछले साल उत्तराखंड राज्य स्थापना के रजत जयंती वर्ष में प्रवेश किया। लगभग 50 साल पहले जब सुदूर गांव की एक महिला ने पास बहती ऋषिगंगा के रौद्र उफान को अपने सीने पर महसूस किया और गांव का जंगल काटने आए सरकारी नुमाइंदों के आगे सीना तान कर चुनौती दी कि पहले मुझे गोली मारो, फिर किसी पेड़ पर कुल्हाड़ी चलाओ। तब उस वीरांगना का रौद्र रूप देख कुल्हाड़े लिए खड़ी ‘शासन व्यवस्था’ के पांव उखड़ गए।
चिपको के सबक न भूलें
एक अत्यंत साधारण और निरक्षर महिला गौरा देवी का शौर्य पूरी दुनिया को पर्यावरण का मंत्र देकर नई राह दिखा गया। पर, उसके बाद क्या हुआ? हिमालय को न जाने कितनी वैज्ञानिक व्याख्याओं के बरस्क टटोला गया। क्या टिहरी डूबने से बच पाई? क्या भागीरथी का प्रलाप उसके इतिहास और सभ्यता से जुड़े प्रतीकों को बचा सका? सफर महज इतना तय हुआ कि हम केदार महाविनाश के घाव मंदिर के पास ठहर गई एक ‘चमत्कारिक’ शिला के पूजन के भरना सीख गए। वहां मलबे पर फिर मकान खड़े हो गए। नवनिर्माण के नाम पर ‘इको फ्रैंडली’ नारा जरूर दिया गया मगर क्या पंडे-पुजारियों और यजमानों ने निगरानी की? उलटे यदि सरकार ने साफ-सुथरे मन से देवस्थानम बोर्ड जैसे फैसले लेने चाहे तो पंडे-पुजारी विरोध पर उतर आए। आपदा से हांफती उस सरकार ने नदियों के किनारे निर्माण को लेकर नियम-कायदों के वादे किए, मगर तत्काल भुला भी दिए। अदालती हस्तक्षेप भी भोंतरे निकले और सबकुछ पुराने ढर्रे पर लौट आया।
नदियां रहमो-करम पर
धारी देवी को अलकनंदा पर बन रहे बांध से बचाने के लिए आगे आए पर्यावरण प्रेमी संत गुरुदास अग्रवाल पर पोती गई कालिख और उमा भारती पर फेंके गए पत्थरों के घाव इस सालगिरह पर हमारी यादाश्त में इसलिए भी होने चाहिए हि उन्हें वे पत्थर हमीं ने मारे थे। सरकार यही चाहती थी और इसीलिए उत्तराखंड के तत्कालीन मंत्री ने धारी गांव के पंडे-पुजारियों और स्थानीय लोगों को बस में भरकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर इकट्ठा कर दिया कि देखिए साहब, बांध के प्रमोटर स्थानीय लोगों को नौकरी देने को तैयार हैं मगर ये पर्यावरणवादी रोड़ा बनकर खड़े हैं! उन कथित नौकरियों का हस्र क्या हुआ, यह तो अलग से अनुसंधान का विषय है, मगर यह सच है कि केदार आपदा में इस बांध से छोड़े गए पानी के कारण एसएसबी समेत श्रीनगर शहर का एक हिस्सा रेत के टीले में बदल गया और आज अलकनंदा का बहाव पूरी तरह बांध के प्रमोटरों के रहमो-करम पर है।
हिमालय को दिल दे बैठे गुरुदास अग्रवाल (स्वामी ज्ञान स्वरूप सानंद) वही संत थे, जिन्होंने आईआईटी कानपुर की प्रतिष्ठित प्रोफेसरी छोड़ 2009 में भागीरथी घाटी में मंजूर की गई तीन बड़ी बांध परियोजनाओं- लोहारी नागपाला, पाला मनेरी और भैरोंघाटी के खिलाफ अनशन किया। तत्कालीन केंद्र सरकार को इन तीनों परियोजनाओं को रद्द करना पड़ा और जुलाई 2011 में भागीरथी घाटी को ‘इको-सेंसटिव जोन’ घोषित कर दिया गय। इस फैसले से गोमुख से नीचे उत्तरकाशी तक भागीरथी के 135 किलोमीटर के जल संभरण क्षेत्र में निर्माण कार्यों पर रोक लग गई और किसी भी जरूरी निर्माण कार्य के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी को अनिवार्य कर दिया। केंद्र सरकार के इस कदम से तत्कालीन उत्तराखंड की सरकार बुरी तरह बौखला उठी। मुख्यमंत्री ने तो फोन पर ही तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश को खूब खरी-खोटी सुनाई। 2013 में कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी इसी बात पर केंद्र से गुस्से में रहे और 6 मई को चारों कांग्रेसी सांसदों के साथ प्रधानमंत्री से भी मिले। मजा देखिए कि विकास के नाम पर भागीरथी को खोदने के लिए दलों की सीमाएं टूट गईं।
सिर्फ आसमान मुजरिम नहीं
भागीरथी घाटी यदि 2011 से ही ‘इको सेंस्टिव जोन’ है तो फिर ‘आल वेदर रोड’ जैसी बड़ी परियोजनाएं क्यों पहाड़ों को काटती चली गईं। सुप्रीम कोर्ट आज भी टिप्पणी कर रहा है कि चाहे हिमाचल हो या उत्तराखंड, पेड़ों का अंधाधुंध कटान आपदाओं का सबसे बड़ा कारण है। पर सरकारों के पास हर मर्ज की दवा है। बताया जाता है कि मनमुताबिक सड़क चौड़ी करने के लिए जगह को किलोमीटर के हिसाब से ऐसे छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया गया जिनके लिए एनजीटी की मंजूरी जरूरी नहीं होती। पहाड़ों में सड़क बनें, पर कितनी चौड़ी? होटल बनें, पर क्या इतने विराट कि पूरी पहाड़ी खोदनी पड़ जाए! बांध बनें, पर क्या रिजर्व-वायर का आयतन गुपचुप बढ़ा दिया जाए! तीर्थों को सुविधामय बनाने के लिए उनका विकास हो, पर सुरक्षित पर्यावरण के उसूलों का माखौल उड़ा दिया जाए! हेली सेवाओं से पैसा कमाने के लालच में सुरक्षा मानकों को धता बता दिया जाए!
आधुनिक और अंधाधुंध विकास का चश्मा लगाकर हिमालय और इसके संसाधनों पर लार टपकाने वाली सरकारों और उसके योजनाकारों को यह समझ बढ़ानी होगी कि हिमालय के लिए किस तरह की योजनाओं का खाका खींचना है। आप आपदाओं के लिए आसमान को कितना ही निशाने पर लें मगर जमीन पर पसरी मानवीय भूलों से पिंड नहीं छुड़ाया जा सकता !
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)









