मोदी पर खरगे की अमर्यादित टिप्पणी की गूंज कांग्रेस को 2029 तक सुनाई देगी।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीति में नारों का बड़ा महत्व होता है। नारे, जो नारा लगा रहा है उसके लिए नैरेटिव को गढ़ने और उसके विरोधी के नैरेटिव को ध्वस्त करने का काम करते हैं। मुझे बचपन का कांग्रेस पार्टी का एक नारा आज भी याद है। उस समय भाजपा नहीं, जनसंघ हुआ करता था। उसका चुनाव चिह्न दीपक था। कांग्रेस का नारा था—इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं। यह नारा खूब चलता था। उन दिनों सरकार चलाना सिर्फ कांग्रेस के बस की बात मानी जाती थी। हालांकि इधर के कुछ सालों में कांग्रेस पार्टी के नारे बहुत प्रभावी नहीं रहे बल्कि कुछ तो ऐसे रहे, जिन्होंने उसका अपना नैरेटिव ध्वस्त और अपने विरोधी को मजबूत किया।
मैं मानता हूं कि इसकी शुरुआत सोनिया गांधी से हुई। 2007 के गुजरात विधानसभा चुनाव के समय अपने भाषण में सोनिया गांधी ने उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘मौत का सौदागर’ कहा था। उसका बिल्कुल उल्टा प्रभाव हुआ और दो तिहाई बहुमत से नरेंद्र मोदी की सरकार फिर बन गई। उसके बाद से कांग्रेस कभी लौटकर गुजरात की सत्ता में नहीं आ सकी और दूर—दूर तक आने की कोई संभावना लगती भी नहीं। फिर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का वह बयान आपको याद होगा,जिसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए कहा था कि हम उन्हें एआईसीसी के अधिवेशन के बाहर चाय बेचने की परमीशन दे सकते हैं, नरेंद्र मोदी इस सदी में प्रधानमंत्री नहीं बनेंगे, नहीं बनेंगे, नहीं बनेंगे। इसके अगले चुनाव में मणिशंकर अय्यर ने मोदी के लिए कहा, बहुत नीच किस्म का आदमी है। इसी तरह 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले प्रियंका वाड्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को नीच व्यक्ति कहा। इन तीनों चुनावों में इन बयानों का क्या असर हुआ,यह बताने की जरूरत नहीं है। भाजपा को जितना फायदा उसके अपने नारों से नहीं हुआ, उससे ज्यादा कांग्रेस के नारों और इस नैरेटिव गढ़ने की कोशिश से हुआ। 2014 की एक प्रेस कांफ्रेंस में मनमोहन सिंह का आक्रोशित चेहरा आज भी मुझे याद आता है। मनमोहन सिंह का ऐसा रूप पहले कभी नहीं दिखा था। उसमें उन्होंने नरेंद्र मोदी के लिए कहा कि ये गुजरात का बूचर है। गुजरात की सड़कों पर खून बहाया है। और जब 2014 के लोकसभा चुनाव का नतीजा आया तो मनमोहन सिंह की कुर्सी ही नहीं गई तब से लेकर आज तक कांग्रेस केंद्र की सत्ता में लौट ही नहीं पाई है। 2016 में भारतीय सेना ने पाकिस्तान के अंदर घुसकर सर्जिकल स्ट्राइक की। उस पर राहुल गांधी ने कहा कि खून की दलाली है। मतलब सेना के शौर्य को खून की दलाली बताया। उसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले का कांग्रेस का नारा कोई कैसे भूल सकता है? चौकीदार चोर है। तो उसका जवाब क्या आया? पूरे सोशल मीडिया पर अभियान चला— मैं भी चौकीदार और राहुल गांधी एवं उनकी पार्टी चारों खाने चित हो गई। कांग्रेस को केवल 53 सीटें मिल पाईं और भाजपा 303 पर पहुंच गई थी। इन नारों का क्या प्रभाव पड़ा और क्या नतीजा निकला, उससे कांग्रेस पार्टी ने कोई सबक नहीं सीखा है। वह आज भी उसी रास्ते पर चल रही है।
कांग्रेस पार्टी की ओर से अब एक नया बौखलाहट भरा नारा आया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पटना में एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। उसमें कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने कहा कि भाई, इस तरह से मोदी नहीं जाएगा। उसके लिए सड़क पर उतरना पड़ेगा, लेकिन मोदी का नाम आते ही कांग्रेस के बड़े नेताओं का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। खरगे तुरंत उत्तेजना में बोले— मोदी क्या, मोदी का बाप भी जाएगा। लेकिन खरगे ने जो बोला, उन्होंने सोचा नहीं होगा कि उसका नतीजा क्या होगा? उनको लगा कि मोदी पर आक्रामक हमला करने का यही तरीका है। भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास इसका कोई जवाब नहीं होगा। मेरी पार्टी के जो आका हैं, वे भी खुश हो जाएंगे। लेकिन खरगे की कही इस बात का जवाब गुजरात से आया है। हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनासकांठा में थे। बनासकांठा गुजरात की वह एकमात्र लोकसभा सीट हैं,जहां पर भाजपा 2024 में हार गई थी। वहां के रोड शो में लोग तख्तियां लेकर आए थे जिन पर लिखा था— मोदी कहीं नहीं जाएगा। वहां बड़ी संख्या में आई महिलाओं ने कहा कि जब भी देश हित में आप आवाज देंगे, हम महिलाएं दिल्ली आने को तैयार हैं। तो खरगे की कही बात पर यह प्रतिक्रिया हुई है। आज तक मल्लिकार्जुन खरगे और कांग्रेस पार्टी ने इस बात के लिए अफसोस जाहिर नहीं किया है। ऑस्ट्रेलिया में शिकारी एक हथियार रखते हैं—बूमरैंग। इसकी खासियत है कि चलाने के बाद यह पलट कर वापस आ जाता है। कांग्रेस कुछ ऐसे ही नारे गढ़ती है। उसके नारे ऐसे हैं कि विरोधी को फायदा और खुद उसे नुकसान होता है। मल्लिकार्जुन खरगे के इस बयान की गूंज कांग्रेस पार्टी को 2029 के लोकसभा चुनाव तक सुनाई देगी। जैसे—जैसे चुनाव नजदीक आएगा इसकी गूंज इतनी तेज होती जाएगी कि लोगों के कान के पर्दे फटने लगेंगे। भाजपा के हाथ बैठे-बिठाए मौका लग गया है। वह इसे क्यों छोड़ेगी? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनासकांठा में बोल भी दिया कि जीवन की आखिरी सांस तक देश की सेवा करूंगा। यानी उन्होंने भी कह दिया कि मोदी कहीं नहीं जा रहा है। और आजकल तो गृहमंंत्री अमित शाह बोल ही रहे हैं कि कम से कम 30 साल तक कांग्रेस के सत्ता में आने की कोई संभावना नहीं है। शायद वह 30 साल इसलिए बोलते हैं कि उनको लगता है इसके बाद वह राजनीति से रिटायर हो जाएंगे। उसके बाद भाजपा की कमान नए लोगों के हाथ में होगी तो इसलिए वह उनके बारे में भविष्यवाणी नहीं करना चाहते।
तो कांग्रेस पार्टी के रहते हुए भाजपा को नैरेटिव गढ़ने की बहुत ज्यादा चिंता कर नहीं करनी पड़ती। राहुल गांधी जिस तरह के मुद्दे उठाते हैं,चाहे वह पेगासस का हो,चाहे हिंडनबर्ग की रिपोर्ट का हो,सब भाजपा को फायदा पहुंचाते हैं। राहुल ने पिछले दिनों कहा था कि आईडीबीआई बैंक बेचा जा रहा है। जबकि आईडीबीआई बैंक में इन्वेस्टमेंट आया है। उसकी स्टेक सेल हुई है। बैंक बेचना और स्टेक सेल दोनों में अंतर होता है। ये अर्थशास्त्र और फाइनेंस से संबंधित मुद्दे हैं जो राहुल गांधी की समझ के बाहर हैं। उनको पता ही नहीं कि उनकी पार्टी के शासन में कितने बैंक प्राइवेटाइज हुए। आईसीआईसीआई बैंक से लेकर एचडीएफसी तक सारे बैंकों के नाम लेते जाइए, ये सब कांग्रेस के शासन में शुरू हुए। आज राहुल गांधी बोल रहे हैं कि टाटा को बर्बाद किया जा रहा है। वह भूल गए कि एयर इंडिया टाटा की ही थी, जिसको नेशनलाइज किया गया। मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव की सरकारों ने बैकों के प्राइवेटाइजेशन समेत निजीकरण को कितना बढ़ावा दिया, उसका हिसाब लगाना शुरू करेंगे तो कई पन्ने भर जाएंगे। मारुति कंपनी जापान की सुजुकी और भारत सरकार के जॉइंट वेंचर में शुरू हुई थी। दोनों का स्टेक 50-50% था। आज भारत सरकार का स्टेक 0% है। किसने बेचा? नरेंद्र मोदी ने बेचा क्या? जब आप कोई मुद्दा उठाते हैं तो आपको यह समझ तो होनी चाहिए कि क्या बोल रहे हैं?
तो भाजपा को मल्लिकार्जुन खरगे का आभार व्यक्त करना चाहिए। उन्होंने जो नारा गढ़कर उसे दे दिया है उसे वह न गढ़ पाती और गढ़ती तो इतना प्रभावी नहीं होता। मल्लिकार्जुन खरगे ने जिस हताशा और क्षोभ के साथ पटना में यह बात बोली उससे स्पष्ट हो गया, उनको यह डर सता रहा है कि मोदी नहीं जाएगा। वैसे भी यह किसी पार्टी के बस का नहीं होता। किसी को सत्ता से हटाना केवल और केवल मतदाता के बस की बात होती है। और कांग्रेस पार्टी तो मतदाता के पास जाने के लिए तैयार ही नहीं है। उसको लगता है कि ऐसे नारे लगाकर ही वह किसी को सत्ता से हटा सकती है और खुद सत्ता में आ सकती है। यह एक नारा कांग्रेस पार्टी को कितना भारी पड़ेगा शायद इसका अभी उसको अंदाजा नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)