भाजपा चाहती थी इसीलिए धनराज नाथवानी सपा के राज्यसभा उम्मीदवार बन पाए।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
समाजवादी पार्टी ने राज्यसभा के लिए धनराज नाथवानी को अपना उम्मीदवार बनाकर एक खास संदेश दिया है और इसके कई निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। यह इस बात को भी दर्शाता है कि राजनीतिक दलों के बीच की विभाजन रेखा धूमिल पड़ रही है।
सभी पार्टियां धन कुबेरों को राज्यसभा भेजती रही हैं। कांग्रेस का तो सबसे लंबा इतिहास है। समाजवादी पार्टी ने कई साल पहले अनिल अंबानी को राज्यसभा भेजा था। उस समय अनिल अंबानी, अमर सिंह, मुलायम सिंह यादव और अमिताभ की बहुत करीबी थी। अनिल अंबानी यूपी में एक बड़ा पावर प्रोजेक्ट भी लगा रहे थे,यह अलग बात है कि वह सफल हो नहीं पाया। अनिल अंबानी समाजवादी पार्टी से राजनीतिक जुड़ाव रखते थे, लेकिन क्या धनराज नाथवानी समाजवादी पार्टी से राजनीतिक जुड़ाव रखते हैं? इसके बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। धनराज नाथवानी परिमल नाथवानी के बेटे और रिलायंस इंडस्ट्रीज ग्रुप के प्रेसिडेंट हैं। जाहिर है कि मुकेश अंबानी से रिलायंस ग्रुप से उनका गहरा नाता है। धनराज इसके साथ ही गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के प्रेसिडेंट भी हैं। उनके पिता भाजपा के समर्थन से झारखंड से कुछ ही दिन पहले राज्यसभा में पहुंचे हैं। तो उनका जुड़ाव भारतीय जनता पार्टी से भी है। फिर सवाल यह है कि वे राज्यसभा के लिए सपा के उम्मीदवार कैसे बन गए? दरअसल हम आप जैसे साधारण मतदाता पार्टियों को अलग-अलग तरीके से देखते हैं, लेकिन अब पार्टियों में उस तरह का फर्क नहीं रह गया है, जो एक समय हुआ करता था। गुजरात में दो ही पार्टियां हैं भाजपा और कांग्रेस। दोनों एक—दूसरे की विरोधी हैं, लेकिन आप गुजरात चले जाइए और किसी से बात कर लीजिए, आपको पता चल जाएगा कि गुजरात की कांग्रेस भारतीय जनता पार्टी की जेब में है। वहां वही होता है जो भाजपा चाहती है। अब उत्तर प्रदेश आ जाइए। यहां भाजपा की मुख्य प्रतिद्वंद्वी समाजवादी पार्टी है। तो क्या जो गुजरात में कांग्रेस का हाल है, उसी रास्ते पर समाजवादी पार्टी चल रही है।
ऐसा नहीं है कि समाजवादी पार्टी को ऐसे धनकुबेर नहीं मिलते जो उसके चुनाव लड़ने के लिए संसाधनों का प्रबंध कर सकें, लेकिन उसने ऐसे ही व्यक्ति को क्यों चुना जो भाजपा का करीबी है और जिसका कोई राजनीतिक जुड़ाव सपा से नहीं है। वह राज्यसभा में बैठेंगे तो समाजवादी पार्टी के साथ, लेकिन क्या वह समाजवादी पार्टी के साथ ही रहेंगे। मेरा मतलब है कि अगर कभी राज्यसभा में भाजपा को एक वोट की कमी पड़ जाए तो उस समय धनराज नाथवानी किसकी तरफ होंगे? इससे आप समझिए कि अखिलेश यादव ने जो किया है उसमें समाजवादी पार्टी और भाजपा दोनों के लिए विन—विन सिचुएशन है। आप एक क्षण के लिए कल्पना कीजिए कि नाथवानी की जगह अगर अखिलेश यादव ने किसी दलित को राज्यसभा भेजने का फैसला किया होता। ऐसा नहीं है कि उससे चुनाव या राजनीति बदल जाती, लेकिन राजनीति में प्रतीकों का बहुत महत्व होता है। दलित को राज्यसभा भेजने का बहुत बड़ा संदेश जाता और यह सपा के लिए राजनीतिक रूप से ज्यादा फायदेमंद और भाजपा के लिए नुकसानदेह होता। ऐसे में भाजपा उस उम्मीदवार को हराने की भी कोशिश नहीं करती क्योंकि उससे भी गलत संदेश जाता। वैसे भाजपा अब धनराज नाथवानी को भी हराने की कोई कोशिश नहीं करेगी। अखिलेश यादव ने धनराज नाथवानी को अपनी पार्टी का दूसरा उम्मीदवार बनाया है। यानी वह उनकी सुनिश्चित जीत चाहते हैं। वरना आमतौर पर राजनीतिक पार्टियां धनकुबेरों को अतिरिक्त उम्मीदवार बनाती हैं। पार्टी के जो बचे हुए वोट होते हैं,वह उन्हें दिलाए जाते हैं और फिर उन पर छोड़ दिया जाता है कि आप बाकी वोट जुटाइए। सपा चाहती तो नाथवानी को तीसरा उम्मीदवार बना सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। इससे सपा ने एक संदेश दिया है और यह संदेश उत्तर प्रदेश की जनता के लिए नहीं है, यह पहले ही स्पष्ट हो जाना चाहिए। यह संदेश सिर्फ अपने लोगों के लिए है। यानी सपा से जो विधायक हैं और जो उम्मीदवार बनना चाहते हैं, उनके लिए संदेश है कि तुम्हारे चुनाव लड़ने का मैंने इंतजाम कर दिया है। चुनाव लड़ने के लिए पार्टी के पास संसाधन और पैसा नहीं है,इस डर से लोग भाग न जाएं या चुनाव लड़ने न आएं, उसको रोकने के लिए अखिलेश यादव ने यह काम किया है। अखिलेश ऐसा कर पाए क्योंकि भाजपा ने उन्हें ऐसा करने दिया। अगर भाजपा तय कर लेती कि धनराज नाथवानी को सपा का उम्मीदवार नहीं बनने देना है तो वह नहीं बन पाते क्योंकि उनका सारा व्यापार गुजरात में है। गुजरात का कौन सा व्यापारी है जो इतनी हिम्मत करेगा कि भाजपा के खिलाफ जाए। तो यह मामला उतना सामान्य नहीं है, जितना ऊपर से दिखाई दे रहा है।
देश में इस समय भाजपा इकलौती विचारधारा पर आधारित पार्टी है। उसके अलावा जितनी पार्टियां हैं, वे या तो जाति पर आधारित हैं या परिवार पर। चुनाव लड़ने के लिए सब पार्टियों को पैसा चाहिए, लेकिन विचारधारा के आधार पर चलने वाली पार्टियों को पैसा देने वालों की संख्या बहुत ज्यादा होती है जबकि जाति और परिवार पर आधारित पार्टियों को पैसा देने वालों की संख्या कम होती है। इसलिए आप देखिए कांग्रेस जब केंद्र की सत्ता में थी तो सपा के उससे बेहद करीबी संबंध थे और आज जब भाजपा केंद्र में सत्ता में है तो समाजवादी पार्टी भाजपा के खिलाफ नहीं जा सकती। सपा अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को दिखाने के लिए विरोध जरूर करेगी, लेकिन एक सीमा तक। अब आप भाजपा और सपा के संबंधों को जरा गौर से देखिए। पिछले कई दशकों में भाजपा की सबसे बड़ी उपलब्धि अयोध्या आंदोलन रहा है। और उस आंदोलन के खिलाफ सबसे मजबूती से मुलायम सिंह यादव खड़े थे। उन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोली तक चलवा दी, लेकिन उन्हीं मुलायम सिंह यादव को भाजपा की सरकार ने पद्म विभूषण दिया। मुझे लगता है कि शायद वह कुछ समय तक और जीवित रहते तो हो सकता है कि भारत रत्न भी मिल जाता। आपने अदालतों में देखा होगा कि वकील जब बहस करते हैं तो लगता है कि इनसे बड़ा दुश्मन आपस में कोई है ही नहीं और वही वकील जब कोर्ट रूम से बाहर निकलते हैं तो साथ में चाय—कॉफी पीने जाते हैं। राजनीतिक दलों का भी ऐसा ही हाल है। यह हमारे आप जैसे मतदाता हैं, जो बहुत भावुक हो जाते हैं। जिस पार्टी को अच्छा मानते हैं तो उसकी कोई बुराई नहीं दिखती और जिसको बुरा मानते हैं तो मान लेते हैं कि इसमें कोई अच्छाई नहीं है। वास्तविकता इन दोनों के बीच की है। कोई सिर्फ अच्छा नहीं होता और कोई सिर्फ बुरा नहीं होता। फर्क यही होता है कि अच्छा जो है, उसमें बुराई कम होती है और बुरा जो है, उसमें अच्छाई कम होती है। लेकिन अब ये फर्क धीरे-धीरे मिटता जा रहा है। अब सत्ता ही सबसे बड़ी विचारधारा बन गई है। राजनीति में सब कुछ जायज हो गया है। कुछ भी गलत नहीं है। अगर आप गलत करके अपने लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं तो वह सही है। इसलिए राजनीति के मुद्दे पर बहुत भावुक होकर सोचने, विचारने और फैसला करने की जरूरत नहीं है। देश का नुकसान कौन कम करेगा, उस आधार पर फैसला करना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)