क्या बताएंगी, शादी के बाद 15 साल तक क्यों नहीं ली भारत की नागरिकता ।
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के संस्मरणों की किताब आ रही है। उसका खूब प्रचार किया जा रहा है। किताब को लेकर उनका एक वीडियो संदेश आया है। उसमें उन्होंने कहा कि मेरी किताब आएगी तो फिर तमाशा होगा। सवाल ये है कि आपने कभी किसी लेखक को यह कहते सुना है कि मेरी किताब जब छपकर आएगी तो तमाशा होगा। क्यों तमाशा होगा? दूसरी बात सोनिया गांधी ने कही कि अभी तक लोगों को मेरे बारे में वह पता है, जो लोगों ने बताया। अब मैं अपनी कहानी खुद बता रही हूं। यह बड़ी अच्छी बात है, लेकिन पेंच भी यहीं पर है कि जो लोगों ने कहा है,उसको गलत साबित करने के लिए आप किताब ला रही हैं या उसमें सचमुच सच्चाई बताने वाली हैं। इन दोनों में बहुत फर्क है।
सोनिया गांधी का सार्वजनिक जीवन बड़ा लंबा है। 1968 में उनकी इस देश की प्रधानमंत्री के बेटे से शादी हुई तो वह एक तरह से सार्वजनिक जीवन में आ गईं। जो भी राजनीति या सार्वजनिक जीवन में है तो उसका और उसके परिवार का सब कुछ सार्वजनिक ही होता है। सोनिया गांधी की शादी 1968 में हो जाने के बावजूद वह 1983 में भारत की नागरिक बनीं। लोगों को उम्मीद होगी कि किताब में सोनिया गांधी इसका जवाब जरूर देंगी कि उन्होंने इतने साल तक भारत की नागरिकता क्यों नहीं ली? अब आप जरा उसकी टाइम लाइन पर भी ध्यान दीजिए। मैं वह मुद्दे नहीं उठा रहा हूं कि वह भारत की नागरिक बनने से पहले वोटर कैसे बन गईं? उसे छोड़ दीजिए। सवाल ये है कि 1968 में उनकी राजीव गांधी से शादी हुई। तब से वह प्रधानमंत्री आवास में रह रही थीं। कानूनन और नैतिकता दोनों के मुताबिक कोई विदेशी प्रधानमंत्री आवास में नहीं रह सकता। ठीक है वह राजीव गांधी की पत्नी थीं तो उनके साथ रहतीं। राजीव गांधी को इंदिरा गांधी से अलग रहना चाहिए था। राजीव इंडियन एयरलाइंस में नौकरी कर रहे थे। सोनिया क्या इसका जवाब देंगी? एक और बात। 1977 में इंदिरा गांधी चुनाव हार गईं। उस समय के अखबार अगर आप उठाकर देखिए तो पता चलेगा कि तब राजीव गांधी और सोनिया इटली के दूतावास में पहुंच गए थे। वे भारत छोड़कर जाना चाहते थे। इसकी कभी न पुष्टि हुई न कोई खंडन करने वाला था। तो यह सच है या झूठ, किसी को नहीं मालूम। इतना तो तय है कि राजीव गांधी की रुचि राजनीति में नहीं थी। उनके छोटे भाई संजय गांधी राजनीति में रुचि रखते थे और माना तो यह जाता है कि इमरजेंसी के दौरान सरकार वही चला रहे थे। 1980 में इंदिरा गांधी जब फिर से सत्ता में आ गईं तब भी राजीव गांधी की ओर से ऐसा कोई प्रयास नहीं हुआ कि वह राजनीति में आना चाहते हैं। जून 1980 में संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मौत से उनकी अमेठी संसदीय सीट खाली हो गई। अब सवाल था कि वहां से कौन लड़ेगा? संजय की मौत के बाद उनकी पत्नी मेनका गांधी ने राजनीतिक विरासत को पाने की कोशिश की तो आधी रात को उनको घर से निकाल दिया गया। उसका कारण था कि इंदिरा गांधी अपने बेटे को ही राजनीतिक विरासत सौंपना चाहती थीं। तो किताब में क्या सोनिया गांधी बताएंगी कि जब आधी रात को मेनका गांधी को प्रधानमंत्री आवास से निकाला जा रहा था तब उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? क्या उन्होंने रोकने की कोशिश की थी? मुश्किल से एक साल के बच्चे को लेकर उस रात मेनका गांधी सड़क पर थीं। यह कोई सामान्य घटना नहीं है। इसके बारे में गांधी परिवार का ही कोई व्यक्ति बता सकता है।
राजीव गांधी ने 1981 में अमेठी से अपना पहला चुनाव लड़ा था। वह चुनाव जीतकर सांसद तो बन गए लेकिन अब कांग्रेस में उनका कद बढ़ाना था। उसके लिए इंदिरा गांधी ने कमलापति त्रिपाठी को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष नियुक्त किया। इंदिरा गांधी अध्यक्ष थीं। हालांकि कांग्रेस के संविधान में कार्यकारी अध्यक्ष का पद नहीं है, लेकिन परिवार की पार्टी है तो फिर इंदिरा गांधी को कौन रोकने वाला था? कमलापति त्रिपाठी ने कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद पहली नियुक्ति राजीव गांधी की राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में की। इसके कुछ ही समय बाद कमलापति त्रिपाठी को कार्यकारी अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। तो मुझे उम्मीद है कि सोनिया गांधी इसके बारे में भी कुछ बताएंगी। उन्होंने भारत की नागरिकता संजय गांधी की मृत्यु और राजीव गांधी के राजनीति में आने के बाद ही क्यों ली,इसके बारे में भी उन्हें बताना चाहिए। यह ऐसा रहस्य है जिसकी गुत्थी अभी तक सुलझी नहीं है। हालांकि इसके बारे में बहुत से लोगों ने बहुत कुछ लिखा है। उसी वीडियो में सोनिया का यह भी बयान आया है कि क्यों वह राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के खिलाफ थीं? यह प्रचार तब से चल रहा है जब राजीव गांधी इंदिरा गांधी का पार्थिव शरीर देखने के लिए एम्स पहुंचे थे। कहा गया कि सोनिया गांधी ने राजीव गांधी से बहुत झगड़ा किया और कहा कि मैं नहीं चाहती कि आप प्रधानमंत्री बनें। उनका कहना था कि उनको डर था जिस तरह से इंदिरा गांधी की हत्या हुई, उसी तरह से राजीव गांधी भी मारे जा सकते हैं। यह किसी भी पत्नी का स्वाभाविक डर हो सकता है, लेकिन उसके बाद का घटनाक्रम यह साबित नहीं करता कि वह ऐसा नहीं चाहती थीं। राजीव गांधी पांच साल प्रधानमंत्री रहने के बाद 1989 में चुनाव हार गए थे। तब सोनिया उनसे कह सकती थीं कि अब आप चुनाव हार चुके हैं,राजनीति छोड़ दीजिए। उन्होंने ऐसा कुछ कहा हो,इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया ने राजीव गांधी फाउंडेशन बनाया। इसके अलावा वह एक और फाउंडेशन में वाइस चेयरमैन बनीं, जो मांग करता रहा है कि जम्मू कश्मीर को स्वतंत्र घोषित किया जाए। सोनिया की ऐसी क्या मजबूरी थी कि वह ऐसी संस्था की उपाध्यक्ष बन गईं। तो सोनिया गांधी के इर्द—गिर्द बहुत रहस्य है,जिनसे पर्दा केवल वही उठा सकती हैं।
सोनिया गांधी से यह भी सवाल होगा कि जब आप कांग्रेस की सदस्य भी नहीं थीं तब आप प्रधानमंत्री कैसे नियुक्त कर रही थीं? पहले आपने शंकर दयाल शर्मा को प्रधानमंत्री बनाने की कोशिश की। उन्होंने मना कर दिया तो फिर आपने नरसिम्हा राव को बनाया, लेकिन उनको ठीक से काम नहीं करने दिया। उनकी कितनी बेइज्जती की, यह सबको मालूम है। जो व्यक्ति प्रधानमंत्री और कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष रहा हो, उसके पार्थिव शरीर को पार्टी मुख्यालय में नहीं आने दिया गया। सोनिया को बताना पड़ेगा कि क्या मजबूरी थी जो उन्होंने ऐसा किया? 1999 की बात है। राष्ट्रपति भवन में सोनिया गांधी ने एक कागज लहराया था कि मेरे पास 272 सांसदों का समर्थन है। उससे पहले वह राष्ट्रपति से भी मिल चुकी थीं और उन्होंने उन्हें दो दिन का समय सदन में बहुमत साबित करने के लिए दिया था। तो क्या उस समय वह प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं, जो 2004 में उन्हें त्याग की मूर्ति बताया गया। वह तो ऐन मौके पर अगर मुलायम सिंह यादव ने पलटी न मारी होती तो 1999 में ही सोनिया गांधी देश की प्रधानमंत्री बन गई होतीं। इसका कभी खंडन नहीं आया कि वह उस समय प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहती थीं। इसके बाद 2004 में भी राष्ट्रपति कलाम के सामने सोनिया ने सरकार बनाने का दावा पेश किया था। सुब्रमण्यम स्वामी कहते हैं कि मैंने राष्ट्रपति को जाकर कानून और संविधान की जानकारी दी कि इटली का संविधान कहता है कि अगर कोई बाहरी व्यक्ति इटली का नागरिक बन जाता है तब भी वह देश का प्रधानमंत्री या कोई भी संवैधानिक पद ग्रहण नहीं कर सकता और रेसिप्रोसिटी जो नियम इटली में भारत के नागरिकों पर लागू होता है,वही इटली के नागरिकों पर भारत में लागू होगा। इसलिए सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं बन सकतीं। कहते हैं कि कलाम साहब ने इसके बाद चिट्ठी विड्रा कर ली थी। तो सोनिया गांधी से उम्मीद करनी चाहिए कि वह इस पर भी रोशनी डालेंगी। कांग्रेस कहती है कि सोनिया ने बड़ा त्याग किया। सवाल है कि जिसने प्रधानमंत्री पद का त्याग कर दिया हो उसको नेशनल एडवाइज़री कमेटी का चेयरमैन बनने और कैबिनेट का दर्जा लेने की क्या जरूरत पड़ गई? प्रस्ताव तो यह भी था कि नेशनल एडवाइज़री कमेटी को किसी भी मंत्रालय की फाइल देखने का अधिकार होगा। वह तो विपक्ष ने हंगामा किया कि संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। तब उस प्रस्ताव को वापस लिया गया। लोगों को उम्मीद है कि ऐसे सारे सवालों का जवाब सोनिया गांधी देंगी। बात अगर ईमानदारी से कही जाएगी तो लोग विश्वास करेंगे। अगर अपने छल छद्म को छिपाने की कोशिश होगी तो उस पर कोई भरोसा नहीं करेगा। फिर तमाशा ही होगा, जिसकी आपको आशंका है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)










