ऐसे लोगों को संवैधानिक और सामाजिक दोनों तरीकों से जवाब देने का वक्त।
कोई बेचारा नहीं होना चाहता। लेकिन राजनीति एक अलग चीज है। राजनीति में कभी-कभी बेचारा होने का फायदा मिल जाता है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ 1984 का लोकसभा चुनाव याद कीजिए। उस समय राजीव गांधी को बेचारा माना गया और उन्हें सहानुभूति का भरपूर लाभ मिला। हालांकि ऐसा लाभ दीर्घकालिक नहीं, तात्कालिक होता है। जैसे ही भावनाओं का ज्वार ठंडा होता है सहानुभूति खत्म हो जाती है। इसीलिए 1984 में 414 लोकसभा सीटें जीतने वाली कांग्रेस पार्टी 5 साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में 192 सीटों यानी आधे से भी कम पर सिमट गई थी। इसके अलावा कुछ ऐसे लोग होते हैं जिनके लिए बेचारगी बहुत फायदेमंद नहीं होती बस उनकी प्रासंगिकता बनी रहती है।
देश में कई ऐसे लोग हैं, जो पुरानी सरकारों के रहमो करम पर पलते और बढ़ते थे। वह सरकार चली गई तो उनकी मौज भी खत्म हो गई। अब उनको लग रहा है कि अचानक वे अनाथ हो गए हैं तो रोते हुए घूम रहे हैं। ऐसे ही कुछ अनाथ होते हैं, जो गाली गलौज पर उतर आते हैं। मैं जिनकी बात करने जा रहा हूं, वे गाली—गलौज वाले हैं। इनमें सबसे पहला नाम है नसीरुद्दीन शाह का। हाल ही में उनका एक वीडियो मैसेज आया है। उसमें उन्होंने कहा कि मुझे फख्र है कि मैं दिमागी नक्सल हूं। उनके इस वीडियो मैसेज पर संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजीजू की बड़ी तीखी प्रतिक्रिया आई है। रिजीजू ने कहा है कि यह आदमी देश के लिए खतरा है। उनकी बात बिल्कुल सही है। हमें समझना पड़ेगा कि यह देश विरोध की नींव डाली जा रही है। इसे केवल बयान तक सीमित मत समझिए। इसमें शबाना आजमी जैसे लोग शामिल हैं,जो हर ऐसे प्रदर्शन में पहुंचती हैं,जो भाजपा के खिलाफ हो। आपने इनको कांग्रेस के खिलाफ किसी प्रदर्शन में कभी देखा था क्या? कांग्रेस सरकार के खिलाफ अन्ना हजारे ने आंदोलन किया था। उसमें क्या शबाना आजमी और नसीरुद्दीन शाह जैसे लोग दिखाई दिए? उस समय भ्रष्टाचार इन लोगों को अच्छा लगता था। दाग अच्छे लगते थे। कांग्रेस की चोरी इनको बुरी नहीं लगती। इनमें से कौन है, जो इमरजेंसी के खिलाफ खड़ा हुआ था? 10 साल के मनमोहन सोनिया के राज में इतना भ्रष्टाचार हुआ, उसके खिलाफ इनमें से किसी के मुंह से आवाज निकली क्या? शबाना आजमी, नसीरुद्दीन शाह और एक रिजेक्टेड विलेन प्रकाश राज ऐसे लोग हैं, जिनको आज कोई पूछता नहीं है। जब तक इनका जमाना था तो इन्होंने एंटी हिंदू एजेंडा खुलकर चलाया। इनकी फिल्मों के डायलॉग और स्क्रिप्ट देखें तो आपको एक बारगी ये शंका हो जाएगी कि आप भारत में हैं या पाकिस्तान में। पाकिस्तानी भी भारत और खासतौर हिंदुओं के खिलाफ इतना जहर नहीं उगलते जितना ये लोग उगलते हैं। और इसके लिए इनको कांग्रेस की सरकारें लगातार सम्मानित करती रहीं और हम—आप जैसे बेवकूफ हिंदू इनकी फिल्में देखकर वाह—वाह करते रहे।
ऐसा बहुत कम होता है जब किसी को फिल्मों में हूबहू वैसा कैरेक्टर मिले जैसा वह वास्तविक जीवन में है। ऐसी ही एक फिल्म आई थी सरफरोश। उसमें नसीरुद्दीन शाह एक पाकिस्तानी एजेंट गुलफाम हसन बने थे। कहने को वह शायर था लेकिन वास्तव में वह आईएसआई का एजेंट था और भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने व हथियारों की स्मगलिंग का काम करता था। अब वास्तविक जीवन में वही नसीरुद्दीन शाह बड़े गर्व से कहता है कि मैं दिमागी नक्सल हूं। मैं टुकड़े-टुकड़े गैंग हूं, जो करना है कर लो। ऐसे लोगों की जगह तो सिर्फ जेल होनी चाहिए। अगर आप यह समझ रहे हैं कि ये लोग भाजपा या सरकार को कमजोर करना चाहते हैं तो आप बिल्कुल गलत हैं। इनका ये उद्देश्य कतई नहीं है। ऐसा हो जाए तो इनके लिए बहुत अच्छा है, लेकिन इनका असली लक्ष्य भारत का एक और विभाजन है। ये उसकी जमीन तैयार कर रहे हैं। जब नसीरुद्दीन शाह कहता है कि हां, मैं टुकड़े-टुकड़े गैंग हूं तो टुकड़े किसके करोगे भाई? अपने टुकड़े करने की बात तो कर नहीं रहे हो। तुम इस देश के टुकड़े करने की बात कर रहे हो। ऐसा व्यक्ति भारत का नागरिक कैसे बना रह सकता है? ऐसे लोगों की लंबी फेहरिस्त है। ये जितने लोग सीजेपी के आंदोलन से जुड़ रहे हैं और कांग्रेस के समर्थन में आ रहे हैं, पूछिए इनमें से किसी ने अन्ना हजारे के आंदोलन में हिस्सा लिया? इनमें से किसी ने जेपी मूवमेंट का समर्थन किया था क्या? इनमें से किसी ने इमरजेंसी का विरोध किया था क्या? तो ये सब दरबारी दलाल हैं, जिनके सामने टुकड़ा डाला जाता है और ये पूंछ हिलाते हैं। अब इनकी समस्या ये है कि टुकड़ा मिलना बंद हो गया है। जो लोग टुकड़ा देते थे, वे खुद ही मोहताज हैं। तो इनकी सारी कोशिश है कि किसी तरह से उन लोगों को फिर से सत्ता में लाया जाए और इसके लिए देश को तोड़ना जरूरी हो तो उसमें भी कोई बुराई नहीं है।
अब ऐसे लोगों की सिर्फ निंदा से काम नहीं चलने वाला है। देश का संविधान बड़े स्पष्ट रूप से बताता है कि ऐसे देशद्रोहियों के साथ कैसे निपटा जाना चाहिए। इन पर देशद्रोह की धाराओं में मुकदमा दर्ज होना चाहिए। अगर आप इनको नजरअंदाज करके बोलने का मौका देते रहेंगे तो एक दिन ऐसी स्थिति आ जाएगी जब देश को तोड़ने वालों की संख्या बढ़ जाएगी। इनके आका विदेश में बैठे हुए हैं। वहां से भी इनको न केवल इंटेलेक्चुअल फायर कवर मिलता है बल्कि आर्थिक मदद व संसाधन भी मुहैया कराए जाते हैं और अगर देश की सबसे पुरानी पार्टी साथ हो तो आप समझिए कि मामला कितना खतरनाक है। इस समय देश में रिजीम चेंज की साजिश से लेकर इस्तीफा मांगने तक जो कुछ हो रहा है,वह सब दिखावा है। इनका असली मकसद है इस देश को तोड़ना और उसके लिए पहला कदम है देश के आर्थिक विकास को रोकना। उसके लिए ये चाहते हैं कि देश में अराजकता का माहौल बने। इनको लगता है कि देश के विकास को रोक दो तो अपने आप असंतोष की एक लहर उठेगी। महंगाई बढ़ने से लोगों को सड़क पर उतारना आसान हो जाएगा। इसीलिए ये अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहते हैं। तो खबर में बने रहने के लिए ये देश को गाली देते हैं। एक पूरा इको सिस्टम बना हुआ है,जिनका काम ही ऐसे लोगों को प्रचारित—प्रसारित करना है। तो जो भी देश को तोड़ने वाली ताकतें हैं, उनको हर हाल में कमजोर किया जाना चाहिए। इन पर संवैधानिक और सामाजिक दोनों तरफ से हमला होना चाहिए। इनको बताया जाना चाहिए कि तुम समाज और देश के विरोध में हो तो हम तुम्हारे खिलाफ हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









