तेलंगाना और तमिलनाडु में भाजपा के सेल्फ गोल

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#pradepsinghप्रदीप सिंह।
राजनीति में कभी-कभी ऐसा होता है कि आप सोचते हैं कि बहुत सही स्ट्रेटजी है, लेकिन वह उल्टी पड़ जाती है। बड़े-बड़े रणनीतिकारों से भी गलती हो जाती है, लेकिन सवाल यह है कि अगर आप उस गलती से सीखते नहीं हैं तो फिर गलती करने के लिए अभिशप्त होते हैं। 
चुनावी रणनीति की बात करें तो इस समय कोई पार्टी नहीं है जो भाजपा का मुकाबला कर सके। लेकिन कहते हैं न कि कोई व्यक्ति,कोई संस्था या कोई भी स्ट्रेटजी परफेक्ट नहीं होती है। वही भाजपा के साथ भी हुआ। पार्टी ने दो सेल्फ गोल किए। दो राज्यों में जहां पार्टी बढ़ सकती थी गलत फैसलों की वजह से पीछे चली गई। उनमें से पहला राज्य है तेलंगाना। बंडी संजय कुमार तेलंगाना में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष थे। वह युवाओं के बीच में बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने प्रदेश की लगभग 3000 किलोमीटर की यात्रा और जनसपर्क किया। जब वह लोकप्रियता के अपने चरम पर थे उसी समय कुछ लोग चंद्रशेखर राव की पार्टी छोड़कर भाजपा में आ गए। इनमें एटला राजेंद्र और उनके कुछ दूसरे साथी शामिल थे। एटला राजेंद्र केसीआर की पार्टी में नंबर दो माने जाते थे। वह टीआरएस की सरकार में वित्त मंत्री भी रहे। वह भाजपा में इस उम्मीद में आए थे कि पार्टी सत्ता में आएगी तो उनके लिए मुख्यमंत्री बनने का एक मौका होगा। उनके आने से भाजपा में दो गुट बन गए। एक पुराने लोगों का, जो संगठन से उभरे हुए लोग थे और जिसमें बंडी संजय कुमार और उनके साथी थे और दूसरा जो बाहर से आए लोग थे। यहीं पर भाजपा ने एक गलती कर दी। बाहर से आए लोगों के दबाव में विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी ने बंडी संजय कुमार को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में घोर निराशा छा गई। परसेप्शन यह बना कि भाजपा का केसीआर के साथ कोई समझौता हो गया है। भाजपा के इस फैसले का नतीजा यह हुआ कि तेलंगाना में पार्टी का जिस तेजी से विकास हो रहा था वह थम गया और विधानसभा चुनाव में भाजपा खिसक कर तीसरे नंबर पर चली गई। केसीआर के विरोध में जो जमीन बंडी संजय कुमार और भाजपा के कार्यकर्ताओं ने तैयार की थी,उस पर फसल कांग्रेस पार्टी ने काट ली और उसकी सरकार बन गई जो अब भी है।
उसके बाद जब भाजपा ने थोड़ा सा कोर्स करेक्शन किया तो लोकसभा चुनाव में तेलंगाना की 17 सीटों में से उसे आठ मिल गईं। आठ सीटें कांग्रेस को मिलीं और एक पर असदुद्दीन ओवैसी जीते। भाजपा ने अपनी खोई हुई जमीन कुछ तो हासिल की, लेकिन तेलंगाना में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का उसके पास जो मौका था,वह हाथ से निकल गया। उसके लिए अब बीजेपी को 2028 तक इंतजार करना पड़ेगा और उस समय भी हो पाएगा कि नहीं,अभी यह कहना मुश्किल है। बंडी संजय कुमार को हटाकर भाजपा ने बहुत बड़ी रणनीतिक भूल की। वह बेहद लोकप्रिय तो थे ही जातीय सामाजिक समीकरणों में भी फिट बैठते थे। पिछड़ा वर्ग से आते थे। तेलंगाना में पिछड़ा वर्ग की आबादी 50 फ़ीसदी से ज्यादा है। हर पैमाने पर वह नेतृत्व के लिए बिल्कुल फिट व्यक्ति थे, लेकिन बाहर से आए लोगों के दबाव में पार्टी ने उन्हें पीछे धकेल दिया। बाहर से आए लोग आज भी भाजपा में हैं,लेकिन वे पार्टी को जिता नहीं पाए।
इसी तरह का मामला तमिलनाडु का है। वहां बहुत तेजी से के. अन्नामलाई का नेतृत्व उभर रहा था। वह कर्नाटक कैडर के आईपीएस ऑफिसर हैं। आईपीएस की नौकरी छोड़कर वह भाजपा में आए। पार्टी ने उनको प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में पार्टी को अकेले दम पर लड़ना चाहिए। अन्नामलाई ने पहले ही इस बात को भांप लिया था कि तमिलनाडु की जनता द्रविड़ियन पॉलिटिक्स से ऊब रही है। वह उसका विकल्प खोज रही है। वह ऐसा विकल्प चाहती है जो न तो डीएमके के साथ खड़ा हो और न ही एआईएडीएमके के साथ। अन्नामलाई ने जैसे ही अपना अभियान शुरू किया भारी भीड़ उनके पीछे-पीछे चलने लगी। खासतौर से युवाओं में वह काफी लोकप्रिय हो गए थे। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से डीएमके बौखला गई और उन पर हमले शुरू कर दिए। राज्य में नंबर दो और प्रतिपक्ष की पार्टी एआईएडीएमके थी फिर भी हमले अन्नामलाई और भाजपा पर हो रहे थे। मीडिया परसेप्शन की बात करें तो ऐसा लगता था कि सीधी लड़ाई बीजेपी और डीएमके के बीच हो रही है। बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने भी अन्नामलाई की बात मानी और लोकसभा चुनाव में वह अकेले दम पर लड़ी। पार्टी को कोई सीट तो नहीं मिली लेकिन तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में पहली बार भाजपा को 11% से ज्यादा वोट मिले और यह लगने लगा कि भाजपा राज्य में बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है।
उसके बाद विधानसभा चुनाव में भाजपा ने रणनीति बदली और अन्नाद्रमुक से गठबंधन की सोची। अन्नाद्रमुक ने शर्त रखी कि आप अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाएंगे और उनको फोर फ्रंट में नहीं रखेंगे तभी हम सीट एडजस्टमेंट की बात करेंगे। बीजेपी को बड़ा लक्ष्य लग रहा था कि पहले द्रमुक को सत्ता से हटाना है। उसके बाद अपनी पार्टी के बारे में सोचेंगे। द्रमुक को हटाने के लिए उसे अन्नाद्रमुक को साथ लेना जरूरी लगा। भाजपा ने अन्नाद्रमुक की शर्त मानते हुए अन्नामलाई को अध्यक्ष पद से हटा दिया और तमिलनाडु की राजनीति से भी एक तरह से अलग कर दिया। यह उसकी दूसरी बहुत बड़ी गलती थी। अभिनेता विजय की पार्टी को मिली सफलता ने इसे साबित भी कर दिया है। सिर्फ दो साल पहले बनी विजय की पार्टी टीवीके की विचारधारा क्या है, संगठन क्या है, नीतियां क्या हैं,कोई नहीं जानता। टीवीके की सबसे बड़ी पूंजी विजय की लोकप्रियता है। विजय ने किसी से गठबंधन नहीं किया और अकेले लड़े। उनकी पार्टी 108 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी है। विजय को युवा वर्ग का सबसे ज्यादा समर्थन मिला है। राज्य के इसी युवा वर्ग का समर्थन एक समय अन्नामलाई को मिल रहा था। जो युवा अन्नामलाई के पीछे चल रहा था,वह विजय के पीछे चलने लगा। तमिलनाडु के जो लोग द्रविड़ राजनीति से ऊब चुके थे और अन्नामलाई को विकल्प के रूप में देख रहे थे,उनके सामने से जब वह विकल्प हट गया तो विजय ने उसकी जगह ले ली।
भाजपा अगर तमिलनाडु में अकेले लड़ी होती तो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि उसकी सरकार बन जाती या बहुत ज्यादा सीटें आ जातीं,लेकिन उसका वोट शेयर और सीटें दोनों बढ़तीं। साथ ही आगे विकल्प के रूप में वह लोगों के सामने होती। अन्नाद्रमुक के साथ अलायंस से उसको कुछ नहीं मिला। कुल 27 सीटें चुनाव लड़ने के लिए मिलीं तो जाहिर है वोट शेयर भी कम हो गया और सीट मिली केवल एक। तो भाजपा का जो हाल तेलंगाना में हुआ था, मेरा मानना है कि उससे बुरा हाल तमिलनाडु में हो गया। दो सेल्फ गोलों से बीजेपी ने दक्षिण के दो राज्यों में अपने विकास को अवरुद्ध कर दिया। अब उसको फिर से खड़ा करने में समय लगने वाला है। कितना समय लगेगा पता नहीं। बीजेपी इन दोनों राज्यों में बहुत तेजी से बढ़ रही थी। तेलंगाना के 2028 में होने वाले विधानसभा चुनाव में तो वह सत्ता की दावेदार बन सकती थी। इसी तरह तमिलनाडु के अगले चुनाव तक वह एक बड़ा प्लेयर बन सकती थी। अभी विजय ने जो ट्रायंगुलर बनाया है,उसे बीजेपी बना सकती थी। तो गलत फैसले किस तरह से पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकते हैं, इसके दो-दो उदाहरण हैं। क्या भविष्य में भाजपा इससे सबक लेगी और अपने नेताओं की बढ़ती हुई लोकप्रियता को रोकने की कोशिश नहीं करेगी? इन दोनों नेताओं से भाजपा के किसी नेता को कोई खतरा नहीं था। लेकिन बाहरी साथियों के दबाव में भाजपा ने अपने नेता को कमजोर किया।
तमिलनाडु में मेरा मानना है कि अन्नाद्रमुक का खेल अब खत्म है। अब ये पार्टी सत्ता की चैलेंजर के रूप में अगले चुनाव में आपको दिखाई नहीं देगी। ई. पलनिस्वामी अगले चुनाव तक पार्टी के नेता बने रहेंगे, इसमें भी शंका है। द्रमुक का भी हाल बुरा है। तो तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ियन पॉलिटिक्स से बाहर जा रही है, जो भाजपा के लिए सुनहरा अवसर था। ऐसे समय में अपने गलत फैसले के कारण भाजपा सीन से बाहर हो गई है। क्या वह इसको सुधारेगी और सुधारने की कोशिश करेगी तो तमिलनाडु के लोगों पर उसका क्या असर होगा,यह सब भविष्य में पता चलेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)