प्रदीप सिंह । 
मुंशी प्रेम चंद ने अपने उपन्यास गोदान में लिखा है कि ‘सुख के दिन आएं तो लड़ लेना, दुख तो साथ रोने से ही कटता है।‘ पर अपने देश में एक ऐसा वर्ग है जो इस विचार से सहमत नहीं है। वह सुख के दिन आने पर रोता है और दुख में लड़ता है। दुख की आहट मात्र से उसका मन मयूर नाचने लगता है। 

 

कोरोना की दूसरी लहर का यह महा-संकट उसके लिए अवसर लेकर आया है। उसका  एक ही ध्येय है देश जाए भाड़ में लेकिन मोदी को गिराने का अवसर नहीं जाना चाहिए। तो अब नई टूल किट आ गई है। देश और देश के बाहर के सारे मोदी विरोधी अहिर्निष सेवा में लगे हैं।

समां ऐसा बांधा जा रहा है…

अमेरिका में भारत के श्मशान घाट की फोटो पहले पन्ने पर छप रही है। समां ऐसा बांधा जा रहा है कि जैसे भारत में जिंदा कम और मुर्दों की संख्या ज्यादा है या हो जाएगी। अब आप जरा कुछ तथ्यों पर गौर कीजिए। अमेरिका की आबादी तैंतीस करोड़ के करीब है। भारत की आबादी 135 करोड़ से ज्यादा है। भारत विकासशील देश है। अमेरिका दुनिया के सबसे विकसित देशों में एक और सबसे अमीर देश है। भारत आज भी गांवों में बसता है। अमेरिका पूरी तरह शहरीकृत देश है। दोनों देशों के संसाधनों और स्वास्थ्य सेवाओं की कोई तुलना भी बेमानी होगी।

तीन तरह की चूक

COVID-19 crisis: US govt asks citizens to leave India as soon as possible

पर उस अमेरिका में कोरोना से पांच लाख छियासी हजार लोगों की मौत हो चुकी है। भारत, जिसको गर्त में जाता बताया जा रहा है, वहां यह आंकड़ा दो लाख अब पहुंचा है। अमेरिका, ब्राजील और रूस जैसे देशों के आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में प्रति दस लाख आबादी पर मृत्यु दर सबसे कम है। अंतरराष्ट्रीय औसत 395 का है और भारत का 133। अमेरिका में यह आंकड़ा 1754 है। यह सब बताने का यह कतई मकसद नहीं है कि हमारे यहां सब ठीक ठाक है और चिंता की कोई जरूरत नहीं है। सोलह अप्रैल के बाद दूसरी लहर सूनामी की तरह आई है। उसके सामने इलाज के सारे प्रबंध बहुत नाकाफी नजर आ रहे हैं। दूसरे किसी भी देश में इतनी तेजी से इतने कम समय में संक्रमण नहीं बढ़ा है। दो तीन तरह की चूक हुई है। सितम्बर के बाद जब कोरोना के केस बहुत कम हो गए तो हम गाफिल हो गए। मान लिया कोरोना चला गया। जनवरी आते आते तमाम विशेषज्ञ कहने लगे कि भारत हर्ड इम्यूनिटी की तरफ बढ़ रहा है। पहली लहर के समय केंद्र सरकार की इस बात को लेकर आलोचना हुई कि उसने सब कुछ केंद्रीकृत कर दिया है। राज्यों के हाथ बांध दिए हैं। केंद्र ने जनवरी के बाद मुख्यमंत्रियों को राज्य की जरूरत और स्थिति के अनुसार फैसले लेने की छूट दे दी। केंद्र ने 162 अस्पतालों में ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए राज्यों को पैसा दे दिया। पर राज्यों ने ध्यान नहीं दिया। और न ही बड़े निजी अस्पतालों- जिन्होंने पहली लहर में मरीजों से खूब कमाया था- ऑक्सीजन प्लांट लगवाने की जरूरत समझी। इस समय आक्सीजन के लिए सबसे ज्यादा हाहाकार निजी अस्पतालों में ही है।

लेफ्ट-लिबरल गैंग की सक्रियता

Brat Lee Covid Donation: Inspired by Cummins, Brett Lee donates bitcoin for India's fight against COVID-19 - The Economic Times

किसी भी बड़े संकट के समय सरकारों के इंतजाम हमेशा कम पड़ जाते हैं। इसके लिए उनकी आलोचना में कोई हर्ज नहीं है। पर सवाल है कि क्या इसके लिए देश को बदनाम करेंगे। लेफ्ट-लिबरल गैंग किस स्तर पर सक्रिय है इसके लिए एक छोटा सा उदाहरण शायद काफी होगा। आस्ट्रेलिया को दो क्रिकेटर पैट कमिंस और ब्रेट ली ने पीएम केयर्स फंड में पैसा दिया। उन्होंने कहा कि वे भारत से प्यार करते हैं। उनके ऐसा करते ही उनके खिलाफ अभियान शुरू हो गया। बाकायदा ट्वीट करके उनसे यहां तक कहा गया कि इसमें पैसा मत डालिए। इस फंड से तो भाजपा का चुनाव अभियान चलता है। आप कल्पना कर सकते हैं कि किसी और देश में सरकार का बड़ा से बड़ा विरोधी भी ऐसी बात कह सकता है।
मोदी सरकार की सात सालों की विदेश नीति और संकट के समय दूसरे देशों की मदद का नतीजा है कि आज अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस सहित तमाम देश भारत की मदद के लिए तत्पर हैं। इन लोगों से यह भी बर्दाश्त नहीं हो रहा। कहा जा रहा है कि अमेरिका तो इसलिए तैयार हुआ कि चीन और रूस ने मदद का प्रस्ताव दिया। भारतीय वैक्सीन के लिए कच्चा माल देने का आदेश बाइडन प्रशासन ने इसलिए दिया कि पहली लहर के समय भारत अमेरिका को हाइड्रोक्सिन क्लोरोक्वीन सहित दूसरी दवाइयां मुहैया करवाईं थीं। अमेरिकी प्रशासन ने इस बात को स्वीकार किया। अमेरिका में भारतीय मूल के लोगों का प्रभाव और अमेरिकी संसद के बहुत सारे सदस्यों के दबाव ने भी काम किया। पर यह सब मानने से मोदी पर हमला कमजोर पड़ता है। इसलिए डिनायल मोड में चले जाओ। चीन की प्रशंसा करो।

मकसद है अफरातफरी फैलाना

Supreme Court seeks govt explanation on vaccine pricing - The Economic Times

चीन जो तमाम संसाधन और वायरस के बारे में सबसे ज्यादा जानकारी होने के बावजूद एक कायदे की वैक्सीन नहीं बना पाया। भारत ने उससे कम समय में दो-दो वैक्सीन बना ली। एक अपनी और एक अंतरराष्ट्रीय मदद से। वैक्सीन आई तो कहा यह भाजपाई वैक्सीन है। लोगों के मन में संदेह पैदा कर दिया। नतीजतन टीकाकरण का अभियान धीमा हो गया। तो इसके लिए भी सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया। टीकाकरण शुरू होते ही हल्ला मचाया कि सबको वैक्सीन दो। मकसद सबको सुरक्षित करना बिल्कुल नहीं था। सबको मालूम है कि वैक्सीन के उत्पादन में समय लगेगा। ये लोग चाहते थे कि सरकार पर दबाव बनाओ कि सबके लिए एक साथ टीकाकरण हो। टीकाकरण केंद्रों पर अफरा-तफरी मचे। अब जब सरकार अट्ठारह साल से ऊपर वालों के लिए एक मई टीकारण शुरू कर रही है तो चार कांग्रेस शासित राज्य कह रहे हैं कि हम तो नहीं शुरू कर पाएंगे। क्यों? क्योंकि वैक्सीन कंपनी कह रही है कि पंद्रह मई से पहले टीका नहीं दे पाएंगे। केंद्र और दूसरे राज्यों ने पहले ऑर्डर दिया, ये अब जागे हैं।

देश-समाज की चिंता नहीं

ये जो अभियान चल रहा है इससे संक्रमित लोगों की कोई मदद नहीं हो रही है। जो संक्रमित नहीं हैं उनके मन में डर पैदा किया जा रहा है। इन्हें अपने आत्मसम्मान की चिंता तो नहीं ही है। पर देश और समाज के आत्म सम्मान की भी चिंता नहीं है। ये इस दम्भ में जीते हैं कि सिर्फ वे ही सब कुछ समझते हैं। हरिशंकर परसाई कहते हैं कि ‘यह एहसास आदमी को नासमझ बना देता है।‘ अब ये नासमझ हैं या नासमझी की ओट में एजेंडा चलाने वाले आप ही तय कीजिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं। आलेख ‘दैनिक जागरण’ से साभार)