हमारे देश में मंत्रियों के इस्तीफे का एक इतिहास है और उसमें सबसे ताजा घटना धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की है। बात शुरू करते हैं सबसे पहले हुए इस्तीफे से। एक रेल दुर्घटना हो गई थी, जिसमें 44 लोग मारे गए। उस समय लाल बहादुर शास्त्री रेल मंत्री थे। दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उन्होंने दिसंबर 1956 में पद से इस्तीफा दे दिया। वह प्रधानमंत्री नेहरू के पास गए और उनसे कहा कि मैं पश्चाताप करना चाहता हूं इसलिए मुझे जाने दीजिए। जवाहरलाल नेहरू ने उनका इस्तीफा मंजूर कर लिया। उन्होंने नैतिकता का जो पैमाना स्थापित किया उसको फॉलो करने की बहुत से लोगों ने कोशिश की लेकिन बाद में वैसा नहीं हुआ। दूसरी बात जिसकी चर्चा कभी नहीं होती कि 1957 में यानी इस्तीफा देने के कुछ ही महीने बाद शास्त्री जी फिर से नेहरू के मंत्रिमंडल में आ गए और नेहरू जी के निधन के बाद तो वह देश के प्रधानमंत्री भी बने।
इसके बाद मूंदड़ा कांड में तत्कालीन वित्तमंत्री टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था। दो कैटेगरी हैं। एक इस्तीफा दिया और एक इस्तीफा देना पड़ा। टीटी कृष्णमाचारी को इस्तीफा देना पड़ा क्योंकि जांच आयोग ने घोटाले के लिए उनको जवाबदेह माना था। मूंदड़ा की कंपनियों की हालत बहुत खराब थी। उसके शेयर एलआईसी के पैसे से खरीदवाए गए थे। तो दोनों इस्तीफों में अंतर करते चलिए। इसके बाद एक अहम इस्तीफा हुआ सिविल एविएशन मिनिस्टर पद से माधवराव सिंधिया का। 1993 में एक लीज एयरक्राफ्ट दुर्घटनाग्रस्त हो गया था। उसमें किसी की मौत नहीं हुई लेकिन नैतिकता के नाते सिंधिया प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के पास गए और इस्तीफा सौंप दिया। राव ने कहा कि अरे, इसकी क्या जरूरत थी? माधव राव सिंधिया को लगा कि राव ऐसा बोल रहे हैं तो इस्तीफा मंजूर नहीं होगा। प्रधानमंत्री आवास से निकलकर वह अपने घर पहुंचे ही थे कि टेलीविजन पर खबर चल रही थी कि राष्ट्रपति ने माधवराव सिंधिया का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। हालांकि कुछ समय बाद राव ने उन्हें मानव संसाधन विकास मंत्री की जिम्मेदारी दे दी। उसके बाद 2008 में मुंबई में आतंकी हमला हुआ। उस समय गृह मंत्री शिवराज पाटिल थे। उनको इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि जो काम उन्होंने किया था, उसके लिए उनको बर्खास्त किया जाना चाहिए था। सिर्फ उनके कारण एनएसजी समय से मुंबई नहीं पहुंच पाई। आतंकी हमले के समय एनएसजी मानेसर स्टेशन पर थी। एनएसजी कमांडो को मानेसर से दिल्ली एयरपोर्ट लाने के लिए किसी तरह एक विमान का इंतजाम किया गया। इसके बाद इन कमांडो को दिल्ली से मुंबई भेजने के लिए एक सिविल फ्लाइट खाली कराई गई। कमांडो उसमें बैठ गए और दो घंटे से ज्यादा समय तक इंतजार करते रहे। हवाई जहाज हवाई पट्टी पर ही खड़ा रहा क्योंकि गृह मंत्री ने कहा कि हम भी जाएंगे और उनको तैयार होने में इतना समय लगा। अब आप समझिए कि नेशनल क्राइसिस के समय गृह मंत्री ने कैसा व्यवहार किया। इसके बाद उनसे इस्तीफा लिया गया। हालांकि इस्तीफे के कुछ ही महीने बाद उनको एक तरह से पुरस्कृत करते हुए गवर्नर बना दिया गया।
तो यह जो सीजेपी का आंदोलन था,इसका कोई संगठन नहीं है। इसके कोई कार्यकर्ता नहीं हैं। इसका जमीन पर कोई आधार नहीं है। इन्होंने परिस्थितियां ऐसी पैदा कर दीं कि पूरे देश में अराजकता फैल सकती थी। ऐसे में सरकार के सामने दो विकल्प थे। वह सख्ती करे या पुलिस अल्टीमेटली गोली चलाए जो कि आंदोलनकारी चाहते थे। यह कोशिश तथाकथित किसान आंदोलन के समय से ही चल रही है कि सरकार को गोली चलवाने पर मजबूर करो जिससे हमको पूरे देश में अराजकता फैलाने का आधार मिले। सरकार वही बहाना देना नहीं चाहती थी। इस आंदोलन में भी सरकार ने तय कर लिया था कि गोली नहीं चलेगी लेकिन पुलिस एक्शन नहीं होगा ये कोई सरकार कैसे तय कर सकती है। दो चीजें होती है एक पुलिस एक्शन और दूसरा पुलिस इन एक्शन। इस मामले में तो पुलिस एक्शन हुआ लेकिन 1984 में जब सिखों का नरसंहार हुआ तब इन एक्शन था। सिखों के खिलाफ हिंसा रोकने के लिए पुलिस ने कुछ नहीं किया। आर्मी का डिप्लॉयमेंट दो दिन बाद हुआ जबकि आर्मी कंटोनमेंट दिल्ली में ही है। आर्मी को आदेश देने में दो मिनट लगते और स्थिति कंट्रोल में आ जाती है। लेकिन पुलिस ने एक लाठी नहीं चलाई, किसी को गिरफ्तार भी नहीं किया। आजाद भारत के इतिहास में इससे बड़ा एडमिनिस्ट्रेटिव इन एक्शन का कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलेगा। उस समय पीवी नरसिम्हा राव गृहमंत्री और राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। कायदे से उस समय गृह मंत्री का इस्तीफा होना चाहिए था और प्रधानमंत्री की जवाबदेही तय होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ क्योंकि गृहमंत्री का इस्तीफा होता तो कई बातें खुलतीं। एक नवंबर को ही पीवी नरसिम्हा राव को प्रधानमंत्री कार्यालय से कह दिया गया कि कानून व्यवस्था का जिम्मा अब पीएमओ देख रहा है। आपको कुछ करने की जरूरत नहीं है। उनके सारे अधिकार ले लिए गए। उसके बाद दिल्ली और देश में अन्य जगहों पर हिंसा का कैसा नंगा नाच हुआ, उसे सबने देखा। इस घटना के बाद जब तक राजीव गांधी जीवित रहे उनसे किसी ने नहीं पूछा कि सिखों के नरसंहार के लिए माफी मांगेंगे। पुलिस ने क्यों एक्शन नहीं लिया,ये भी किसी ने नहीं पूछा। तो सीजेपी के आंदोलन के समय भी मोदी सरकार के सामने विकल्प था कि जो हो रहा है, उसको होने देते। संसद पर हमला हो गया तो हो गया। मार्च में शामिल 2873 जघन्य अपराधी संसद में घुसकर हंगामा,तोड़फोड़ और किसी की हत्या भी कर देते तो हो जाने देते। उस समय क्या कोई गारंटी ले सकता था कि ये लोग संसद में घुसेंगे तो कुछ नहीं करेंगे। संसद में घुसे बिना ये लोग जो कुछ कर रहे थे वह ट्रेलर था कि अंदर जाकर वे क्या करने वाले हैं। याद रखिए 1966 में कांग्रेस की सरकार तो संसद की ओर जा रहे निहत्थे साधुओं पर गोली चलवा चुकी है। देश भर में जब हंगामा मचा तो उस समय के गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा से इस्तीफा लिया गया। लेकिन वह फिर लौट कर आए और दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने।
अब ये सब बताने के बाद मैं असली मुद्दे पर आता हूं कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को किस कैटेगरी में रखें? मुझे लगता है कि जो दोनों कैटेगरी मैंने बताईं कि इस्तीफा लिया गया और इस्तीफा दिया उसके बीच में रखना चाहिए। सरकार के सामने जो संकट था वह धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बिना हल नहीं हो सकता था। सरकार चाहती तो धर्मेंद्र प्रधान को बर्खास्त कर देती,लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। उनसे इस्तीफा लिया और उन्होंने इस्तीफा देते हुए जो बातें लिखीं उसमें यह नहीं कहा कि यह सब जो हुआ उसके लिए मैं जिम्मेदार हूं। उन्होंने कहा कि छात्रों को भ्रमित न किया जा सके इसलिए छात्रों के हित में मैं इस्तीफा दे रहा हूं। उसके बाद की घटनाएं देखिए, इस्तीफा देने के बाद जब वह संसद में आए तो भाजपा के सांसदों ने किस तरह उनका स्वागत किया। सरकार और पार्टी की ओर से उनकी प्रशंसा की गई। मतलब सरकार यह मानती है कि पेपर लीक के लिए धर्मेंद्र प्रधान जिम्मेदार नहीं थे। परिस्थितियां ऐसी बनीं कि उनका इस्तीफा लेना पड़ा और उन्होंने इस्तीफा दिया। अब सवाल है कि धर्मेंद्र प्रधान की वापसी कब होगी। आप यह तय मान कर चलिए कि धर्मेंद्र प्रधान की वापसी होगी। वह केंद्रीय मंत्रिमंडल में भी आ सकते हैं और उड़ीसा के मुख्यमंत्री भी बनाए जा सकते हैं। दोनों ऑप्शन खुले हुए हैं। धर्मेंद्र प्रधान को पार्टी ने किनारे लगा दिया है, अगर यह गलतफहमी किसी को है तो दूर कर लेनी चाहिए। धर्मेंद्र प्रधान की मेन स्ट्रीम में फिर से वापसी तय है, यह इतिहास भी बताता है। भाजपा और केंद्र सरकार का मानना है कि हमें बड़े संकट से निपटने के लिए धर्मेंद्र प्रधान का बलिदान देना पड़ा। तो इंतजार कीजिए कि धर्मेंद्र प्रधान की वापसी कब होती है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)








