राजीव रंजन।
दो दिन पहले बंगाल की एक महिला का वीडियो देखा। उसने बताया कि वह विशाखापत्तनम से 20 घंटे सफर करके अपने पति के साथ केवल विधानसभा चुनाव के लिए वोट करने आई है। ऐसे बहुत से दूसरी जगहों पर रहने वाले बंगाली मतदाता सिर्फ और सिर्फ मतदान करने के लिए आए हैं। ज़ाहिर है, जब ऐसे लोग गर्मी में दूरी तय करके, पैसा खर्च कर मतदान करने के लिए अपने गृहराज्य आए हैं, तो स्थानीय लोगों में भी मतदान को लेकर बहुत उत्साह है। पहले चरण में ऐतिहासिक 91.78 प्रतिशत मतदान इस भावना का प्रकटीकरण है। उसमें भी महिलाओं का प्रतिशत (92.69) पुरुषों (90.92) के मुकाबले 1.77 प्रतिशत ज्यादा है। 2021 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले यह 9 प्रतिशत ज्यादा है। इसलिए यह केवल एक सांख्यिकीय घटना नहीं है, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी हो सकता है। चुनाव आयोग के अनुसार, यह राज्य के इतिहास में सबसे अधिक मतदान है। इसे 2011 के परिवर्तनकारी चुनाव के बाद सबसे बड़ी जनभागीदारी माना जा रहा है।
पश्चिम बंगाल में पहले चरण की भारी वोटिंग किस बात का संकेत है? क्या यह मतदान सत्ता की वापसी का संकेत है, या बदलाव की दस्तक है?
भारी मतदान यानी जनता इस चुनाव को निर्णायक मान रही है
जब मतदाता बड़ी संख्या में घरों से निकलकर मतदान केंद्रों तक पहुंचते हैं, तो इसका सामान्य अर्थ यह होता है कि जनता चुनाव को औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि निर्णायक अवसर मान रही है। उदासीन समाज मतदान नहीं करता। उत्साहित, असंतुष्ट या आशावान समाज मतदान करता है। बंगाल में यह चुनाव सामान्य नहीं है। यह 15 वर्ष की सत्ता, राजनीतिक हिंसा, आर्थिक चुनौतियों, बेरोज़गारी, महिला सुरक्षा, सांप्रदायिक समीकरण और भविष्य की दिशा पर जनमत-संग्रह जैसा बन गया है।
क्या भारी मतदान हमेशा सत्ता-विरोध का संकेत होता है?
भारतीय राजनीति में कई बार देखा गया है कि अप्रत्याशित मतदान वृद्धि परिवर्तन का संकेत देती है। जब लोग मानते हैं कि उनका वोट असर डालेगा, तब मतदान बढ़ता है। 2011 में भी बंगाल में व्यापक मतदान ने 34 वर्ष पुराने वाम शासन का अंत किया था। इस बार भी रिकॉर्ड मतदान होने से स्वाभाविक रूप से परिवर्तन की चर्चा तेज हुई है। लेकिन यह भी पूर्ण सत्य नहीं है कि हर भारी मतदान सत्ता-विरोधी ही हो। कभी-कभी सत्तारूढ़ दल का मजबूत संगठन अपने समर्थकों को बड़े पैमाने पर बूथ तक लाता है। इसलिए केवल प्रतिशत देखकर निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी।
चुनाव आयोग की सख्ती और भयमुक्त मतदान का प्रभाव
बंगाल के चुनावों पर अक्सर हिंसा, बूथ कब्ज़ा, धमकी और स्थानीय दबाव की चर्चा होती रही है। अगर इस बार दो लाख चालीस हजार केंद्रीय बलों की तैनाती, निगरानी और आयोग की सख्ती के कारण मतदाता अधिक भयरहित होकर निकले हैं, तो इसका अर्थ यह हो सकता है कि पहले जो ‘डरा हुआ मतदाता’ घर में रहता था, वह अब मतदान कर रहा है। ऐसी स्थिति आमतौर पर सत्ता पक्ष के लिए चुनौतीपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि भयमुक्त मतदान छिपे हुए असंतोष को अभिव्यक्ति देता है।
महिलाओं की भागीदारी निर्णायक
बंगाल में महिलाओं की लंबी कतारें चर्चा का विषय रहीं। महिला मतदाता किसी भी चुनाव में परिणाम बदल सकती हैं। यदि महिलाओं ने कल्याण योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ और स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा करके मतदान किया है, तो यह टीएमसी के पक्ष में जा सकता है। लेकिन अगर आरजी कर जैसे मुद्दे, सुरक्षा की भावना, कानून-व्यवस्था और स्थानीय भ्रष्टाचार ने असर डाला है, तो वही महिला मतदाता सत्ता परिवर्तन का कारण भी बन सकती हैं। यानी महिलाओं की भारी भागीदारी दोनों दलों के लिए अवसर और जोखिम, दोनों है।
हिंदू ध्रुवीकरण बनाम मुस्लिम मतों का समीकरण
बंगाल की राजनीति में पहचान आधारित मतदान एक वास्तविक तत्व बन चुका है। अगर हिंदू मतदाता बड़े पैमाने पर एकजुट होकर भाजपा की ओर गए, तो मुकाबला भाजपा के पक्ष में हो सकता है। दूसरी ओर, क्षेत्रीय नेताओं, असंतोष या बहुकोणीय मुकाबले के कारण अगर मुस्लिम मतों में विभाजन हुआ, तो इसका लाभ भी विपक्ष को मिल सकता है। लेकिन अगर अल्पसंख्यक मतदाता रणनीतिक रूप से एकजुट रहे, तो टीएमसी की स्थिति मजबूत बनी रह सकती है। यानी मतदान प्रतिशत बढ़ना केवल संख्या नहीं, सामाजिक समूहों की दिशा पर निर्भर करेगा।
भ्रष्टाचार और स्थानीय मुद्दों का असर
पिछले कुछ वर्षों में भर्ती घोटाला, स्थानीय नेताओं पर आरोप, गिरफ्तारी, पंचायत स्तर की शिकायतें और प्रशासनिक पक्षपात जैसे मुद्दों ने सरकार की छवि को प्रभावित किया है। जब सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार की धारणा बनती है, तब मतदान वृद्धि को अक्सर “जवाब देने की इच्छा” के रूप में पढ़ा जाता है। यदि यह भावना बूथ तक पहुंची है, तो परिणाम चौंकाने वाले हो सकते हैं।
क्या भाजपा सत्ता में आ सकती है?
पश्चिम बंगाल की राजनीति लंबे समय से व्यक्तित्व, विचारधारा, संगठन और सामाजिक समीकरणों का जटिल मिश्रण रही है। एक समय वामपंथ का गढ़ रहे इस राज्य में पहले तृणमूल कांग्रेस का उदय हुआ और अब भाजपा ने स्वयं को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर लिया है। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या इस बार भाजपा के सत्ता में आने की प्रबल संभावना बन रही है?
2024 लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घटी थीं, पर विधानसभा चुनाव का स्वभाव अलग होता है। विधानसभा में स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, संगठन और जातीय-सामुदायिक समीकरण अधिक प्रभाव डालते हैं। अगर भाजपा अपने 2021 के वोट आधार को पुनः संगठित कर ले, जिसकी संभावना दिख रही है, और 6–7 प्रतिशत अतिरिक्त स्विंग पा ले, तो वह ममता बनर्जी के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है। बंगाल में विपक्ष अब पहले जैसा कमजोर नहीं माना जा सकता। पहले भाजपा को बाहरी पार्टी कहा जाता था, लेकिन अब उसके पास राज्य स्तर पर कैडर, बूथ पर कार्यकर्ता, स्थानीय चेहरे और स्थायी वोट बैंक है। विपक्ष के रूप में उसकी स्वीकार्यता काफी बढ़ी है।
ममता बनर्जी को हल्के में नहीं लिया जा सकता
राजनीतिक अनुभव बताता है कि ममता बनर्जी केवल नेता नहीं, बंगाल की एक सशक्त चुनावी मशीनरी हैं। उनकी व्यक्तिगत पकड़, कल्याणकारी योजनाएं, बूथ प्रबंधन और भावनात्मक अपील अब भी बड़ा कारक हैं। कई बार एंटी-इन्कम्बेंसी की चर्चा होती है, लेकिन अंतिम परिणाम संगठन और नेतृत्व तय करता है, और इस क्षेत्र में टीएमसी अभी भी काफी मजबूत खिलाड़ी है।
पहले चरण का 92 प्रतिशत मतदान पांच संकेत देता है :
1. जनता चुनाव को निर्णायक मान रही है।
2. दूसरे चरण में भी भयमुक्त मतदान की संभावना बढ़ी है।
3. सत्ता के खिलाफ असंतोष मौजूद है।
4. विपक्ष पूरी मजबूती से मुकाबले में है, केवल प्रतीकात्मक नहीं।
5. अंतिम परिणाम सामाजिक ध्रुवीकरण, महिला वोट और स्थानीय उम्मीदवार तय करेंगे।
टीएमसी और बीजेपी दोनों दावा कर रहे हैं कि यह उनके लिए अच्छी खबर है। लेकिन चुनाव आयोग की सख्ती, भयमुक्त वोटिंग और इतनी बड़ी संख्या में लोगों का बूथ पर आना कहीं राज्य में बदलाव का संकेत तो नहीं? पिछली बार विधानसभा चुनावों में टीएमसी और भाजपा के वोट में लगभग 10 प्रतिशत का अंतर था। इस बार जिस तरह बंगाल में महिला सुरक्षा, भ्रष्टाचार, राज्य की खराब आर्थिक स्थिति, हिंदुओं में असुरक्षा की भावना जैसे मुद्दे हैं, हुमायूं कबीर तथा ओवैसी जैसे नेताओं की हुंकार से मुस्लिम मतों में बिखराव का अंदेशा है और हिंदू मतों के ध्रुवीकरण की स्थिति है, वैसे में ये सब कारण मिलकर कहीं ममता बनर्जी का खेल तो नहीं बिगाड़ देंगे? बंगाल जैसे करीबी मुकाबले वाले राज्य में 2–3 प्रतिशत वोट का अंतर भी कई सीटों का परिणाम बदल सकता है।
ममता बनर्जी की बॉडी लैंग्वेज भी इस बार पहले जैसी नहीं है। वह पहले वाला आत्मविश्वास नहीं दिखा रही हैं। वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने ममता बनर्जी सरकार के भ्रष्टाचार और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पर हमला बोलते हुए कहा है कि इससे बीजेपी को बंगाल में पैर पसारने का मौका मिला है। बंगाल में आरजी कर और संदेशखाली जैसे मुद्दों ने बीजेपी को माहौल बनाने का अवसर दिया। 2024 लोकसभा चुनावों में बीजेपी के हिंदू मतों में काफी गिरावट आई थी, जिससे उसकी सीटें 2019 के 18 के मुकाबले घटकर 12 रह गईं, लेकिन इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी के हिंदू मतों में वृद्धि होने की संभावना दिख रही है। आमतौर पर देखा गया है कि मत प्रतिशत में अप्रत्याशित वृद्धि परिवर्तन का संकेत देती है या फिर सत्ता पक्ष को प्रचंड बहुमत देती है। लेकिन टीएमसी पहले से ही प्रचंड बहुमत में है और इस कार्यकाल में ममता सरकार ने ऐसा कोई काम नहीं किया है, जिससे कहा जा सके कि यह बढ़ा हुआ मतदान सरकार के पक्ष में है। उल्टे सरकार पर भ्रष्टाचार, तुष्टिकरण, बेरोज़गारी और खराब कानून-व्यवस्था के आरोप लगे हैं। उसके कई नेताओं की गिरफ्तारी भी हुई। ऐसी खबरें हैं कि अप्रवासी बंगालियों ने बड़ी संख्या में आकर परिवर्तन के लिए वोट दिया है। पहले चरण में जहां चुनाव हुए हैं, वहां परंपरागत रूप से बीजेपी की स्थिति पहले से अच्छी रही है। 6 से 7 प्रतिशत का वोट स्विंग बीजेपी को सत्ता में ला सकता है। हालांकि बंगाल में ममता को हराना आसान काम नहीं है।
भाजपा के सामने चुनौतियां अभी भी गंभीर हैं। भाजपा की संभावनाएं मजबूत होने के बावजूद कुछ कठिनाइयां हैं। ममता बनर्जी का व्यक्तिगत करिश्मा अब भी प्रभावी है। टीएमसी का बूथ नेटवर्क बहुत मजबूत है। ग्रामीण क्षेत्रों में योजनाओं का असर बना हुआ है। इसलिए केवल माहौल से परिणाम तय नहीं होता। लेकिन यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि बंगाल में हवा बदलती दिख रही है, लेकिन आंधी आई है या नहीं, यह 4 मई को ही पता चलेगा। फिलहाल इतना तो कहा जा सकता है कि पश्चिम बंगाल का मतदाता इस बार कुछ बोल रहा है।