भाजपा के मददगार का टैग सपा प्रमुख को पड़ेगा भारी, झालमुड़ी खाकर ध्वस्त किया टीएमसी का नैरेटिव।
प्रदीप सिंह।राजनीति में अपने विरोधी को पटखनी देने के लिए कोई हिंसा करने की जरूरत नहीं होती है। एक छोटा सा कदम विरोधी को परास्त कर देता है और परास्त नहीं भी कर पाए तो संकट में तो डाल ही देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा अक्सर करते हैं। विपक्ष पर जब वह हमला करते हैं तो उसको कोई मौका नहीं देते। हाल ही में ऐसी दो घटनाएं हुई हैं।
16 अप्रैल को प्रधानमंत्री लोकसभा में जब महिला आरक्षण संशोधन विधेयक पर बोल रहे थे तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि अखिलेश यादव जी मित्र हैं और समय-समय पर मदद करते रहते हैं। अब आप समझिए कि प्रधानमंत्री अगर बंद कमरे में यह बात बोलते तो अलग बात होती। पूरा देश इस टेलीकास्ट को देख रहा था। समाजवादी पार्टी के समर्थक और उसके नेता-कार्यकर्ता भी देख रहे थे। तो उनके मन में सवाल होगा कि अखिलेश यादव प्रधानमंत्री की क्या मदद करते हैं? अखिलेश यादव की इस पर क्या प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी? अगर कोई भी गंभीर राजनेता होता तो वह खड़ा होता और कहता कि हम राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं,दुश्मन नहीं हैं और एक दूसरे की मदद करना हमारा मानवीय धर्म है। लेकिन अखिलेश यादव ने क्या किया? उन्होंने हाथ जोड़े और मुस्कुराते हुए कृतज्ञता के भाव से बिछ गए कि आपने यह कहकर मुझे उपकृत कर दिया। मैं धन्य हो गया। मतलब प्रधानमंत्री ने अखिलेश यादव के साथ खेल कर दिया और अखिलेश यादव समझ ही नहीं पाए। बाद में अखिलेश के समर्थकों या सलाहकारों ने उन्हें बताया होगा कि आपने इस तरह की प्रतिक्रिया क्यों दी तो पांच दिन बाद उन्होंने सफाई दी कि उस समय मेरा माइक बंद हो गया था। सवाल है कि माइक बंद हो गया था, लेकिन हाथ जोड़कर कृतज्ञता जताने के लिए किसने कहा था। आपको कम से कम इस बात पर एतराज तो जताना चाहिए था।

उत्तर प्रदेश में फरवरी-मार्च 2027 में विधानसभा का चुनाव होना है और उससे पहले ही प्रधानमंत्री ने प्रदेश के मतदाताओं के मन में यह संदेह पैदा कर दिया कि अखिलेश यादव और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व मिला हुआ है। मतलब अखिलेश यादव जो लड़ाई लड़ते हुए दिखा रहे हैं,वह दरअसल लड़ाई लड़ नहीं रहे हैं। अब इससे नुकसान किसका होगा? भाजपा का तो फायदा ही होगा। नुकसान अखिलेश यादव का होगा। उनको अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों को सफाई देनी पड़ेगी कि उनका बीजेपी से अंदर खाने कोई मेलजोल नहीं है। और अगर मेलजोल है तो किसलिए है? उनको प्रधानमंत्री को जवाब देने में क्या समस्या थी? लेकिन अब तो वह खेल हो चुका। परिपक्व राजनेता और अपरिपक्व नेता के बीच का यही अंतर होता है। अब यूपी के चुनाव तक अखिलेश से यह सवाल बार-बार पूछा जाता रहेगा और वह सफाई देते रहेंगे।

अब दूसरे मुद्दे पर आते हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री ने ममता बनर्जी के खिलाफ कोई अपशब्द नहीं कहा जबकि ममता ने उनके बारे में जो बातें कहीं उन्हें दोहराया नहीं जा सकता। लेकिन प्रधानमंत्री ने झारग्राम में एक ऐसा काम कर दिया कि टीएमसी की नींद उड़ गई। उन्होंने एक दुकान पर रुककर झालमुड़ी खा ली। हालांकि ये बड़ी सामान्य बात है। उसका वीडियो बन गया। यह भी सामान्य बात है। लेकिन 10 करोड़ से ज्यादा लोगों ने उस वीडियो को देख लिया। इससे ममता बनर्जी का कैंप बौखला गया कि हम तो नैरेटिव बना रहे थे कि बांग्ला खानपान,बांग्ला भाषा और बांग्ला संस्कृति को ये लोग खत्म कर देंगे लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा पड़ गया। प्रधानमंत्री ने पश्चिम बंगाल के बेहद लोकप्रिय स्नैक्स झालमुड़ी को खाकर ममता बनर्जी के उस नैरेटिव को एक झटके में खत्म कर दिया कि ये लोग बाहरी हैं। प्रधानमंत्री ने बता दिया कि किसी प्रदेश की संस्कृति,भाषा, खानपान से हमको कोई परहेज नहीं है। वह सब हमको उसी तरह से प्रिय हैं, जैसे अपने प्रदेश के। अब बौखलाई हुई ममता बनर्जी कह रही हैं कि झालमुड़ी खाना कौन बड़ी बात है। प्रधानमंत्री जरा मछली खाकर दिखाएं। अगर वह मछली खाने को तैयार हो जाएं तो मछली बनाने के लिए तैयार हूं। अब आप इस बात पर ध्यान दीजिए कि यह एक हताश नेता का बयान है। ममता को मालूम है कि प्रधानमंत्री वेजिटेरियन हैं। नॉनवेज खाना नहीं खाते। तो आप एक वेजिटेरियन व्यक्ति को मछली खिलाना चाहती हैं। दूसरा ममता का इको सिस्टम लगातार प्रधानमंत्री के खिलाफ यह प्रचार करता है कि वह तय करना चाहते हैं कि हम क्या खाएं और क्या पहनें? तो आप क्यों तय करना चाहती हैं कि प्रधानमंत्री क्या खाएं? झालमुड़ी खाएं कि मछली खाएं।

ऐसी बातें नेता तब करते हैं जब उनके पास कोई मुद्दा बचता नहीं है। वही ममता बनर्जी कर रही हैं। और अब तो समय निकल गया है। गुरुवार को राज्य में पहले दौर का मतदान हो गया। रिकार्ड वोट पड़े हैं। इसके बाद ममता बनर्जी को समझ में आ जाएगा कि उनका आसन डोल रहा है। खेला होबे का नारा लगाने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ खेला हो गया। वैसे भी खेला होबे का नारा उनका नहीं है। ओरिजिनल नारा शौकत उस्मान का है। यह ममता बनर्जी के तुष्टीकरण का उदाहरण है। ममता इसके अलावा जय बांग्ला का नारा लगाती हैं। वह नारा भी पहली बार बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति रहे शेख मुजीब उर रहमान ने लगाया था। तो उनके नारे भी पश्चिम बंगाल के नहीं हैं। ममता बात तो बांग्ला संस्कृति की करती हैं, लेकिन उनका सब कुछ उधार का है। उनके पास कोई ओरिजिनल आइडिया नहीं है। ओरिजिनल आइडिया के नाम पर उनके पास सिर्फ कटमनी,सिंडिकेट और भ्रष्टाचार है। इससे पश्चिम बंगाल के लोग ऊब चुके हैं और 4 मई को उसका नतीजा आपको दिखाई देगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



