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नैमिषारण्य का उल्लेख वाल्मीकि रामायण के युद्ध-काण्ड की पुष्पिका में है। पुष्पिका में बताया गया है कि लव और कुश ने गोमती नदी के किनारे श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में सात दिनों में वाल्मीकि रचित काव्य का गायन किया।


 

वाल्मीकि रामायण से ज्ञात होता है कि यह पवित्र स्थली गोमती नदी के तट पर स्थित थी, जैसा कि आज भी है। उसमें श्रीराम का अश्वमेध यज्ञ के लिए नैमिषारण्य जाने का उल्लेख है। रघुवंश में भी नैमिष का वर्णन है। उससे अयोध्या के नरेशों का वृद्धावस्था में नैमिषारण्य जाकर वानप्रस्थाश्रम में प्रविष्ट होने की परम्परा का पता चलता है।

मार्कण्डेय पुराण में अनेक बार इसका उल्लेख 88 हजार ऋषियों की तप:स्थली के रूप में आया है।

पुराणों में नैमिषारण्य तीर्थ का बहुधा उल्लेख मिलता है। जब भी कोई धार्मिक समस्या उत्पन्न होती थी, उसके समाधान के लिए ऋषिगण यहाँ एकत्र होते थे।

महासुर ने भगवान से कहा- तुमसे क्या मांगूं। तुम मुझसे वर मांग सकते हो

हमारी संस्कृति की विलक्षण बात यह है कि एक ही बात हर काल में अलग-अलग लोग एक दूसरे को बताते रहे हैं। इसलिए वे बातें सब समय में लोगों के अपनाने योग्य बनी रहीं। हां, भिन्न-भिन्न शास्त्रों में कथाओं में कुछ अंतर आता गया, पर वे कथाएं कोई बात आप तक पहुंचाने के लिए कही गई हैं। इसलिए हमें घटनाओं के अंतर में उलझे बिना उसके संदेश को ग्रहण करना चाहिए। यह अत्यंत आवश्यक है।

नैमिषारण्य के बारे में प्रचलित एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन काल में यहां गया नाम का एक महासुर था। उसने विष्णु भगवान का चिंतन करते हुए घोर तपस्या की थी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने चारों भुजाओं में शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए स्वरूप में दर्शन दिए और उस महासुर से कहा- मैं तुम्हारी तपस्या से बहुत प्रसन्न हूं। हे दानवराज, तुम वरदान मांगो, क्या चाहते हो? मैं तुम्हारी कामना पूर्ण करूंगा।

उसने क्रोध में आकर कहा- मैं तुमसे क्या वर मांगूं। जो इच्छा हो वह वरदान तुम मुझसे मांग सकते हो। तब विष्णु भगवान ने प्रसन्न होकर कहा- यदि तुम मुझे वरदान देना चाहते हो तो मैं यही चाहता हूं कि तुम्हारी मृत्यु मेरे हाथों से हो।

दानवराज ने प्रसन्न होकर कहा- तथास्तु।

यह वर पाकर भगवान ने सुदर्शन चक्र से उस राक्षस के तीन टुकड़े करके तीन जगह फेंक दिए। वहीं तीनों स्थल गया नाम से विख्यात हुए। उस राक्षस का चरण गया (गया जी में), नाभि गया (नैमिषारण्य में) और कपाली गया (बद्रीनारायण में)। इसलिए इन तीनों स्थलों पर पिंडदान का अपूर्व महत्व बताया जाता है।

परिक्रमा : नैमिषारण्य की परिक्रमा 84 कोस की है। यह परिक्रमा प्रतिवर्ष फाल्गुन की अमावस्या को प्रारंभ होकर पूर्णिमा को पूर्ण होती है। नैमिषारण्य की छोटी (अंतवेर्दी) में यहां के सभी तीर्थ आ जाते हैं। (समाप्त)


एकदा नैमिषारण्ये 1 : भारतीय संस्कृति और ज्ञान की गंगोत्री

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