देश के खिलाफ जाने की धमकी दिखा रही डीएमके लीडरशिप की हताशा।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
दुश्मन के खेमे में अगर बेचैनी हो तो समझिए कमजोरी का लक्षण है और खलबली हो तो समझिए कि उसको लग रहा है कि हार हो रही है। तमिलनाडु इसी ओर बढ़ रहा है। सत्तारूढ़ डीएमके के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और उनके बेटे उप मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन के बयान सुनिए तो आपको अंदाजा लग जाएगा कि तमिलनाडु का चुनाव किस ओर जा रहा है। एमके स्टालिन ने कहा है कि डीएमके के खिलाफ कोई षड्यंत्र हुआ तो डीएमके 50 के मोड में लौट जाएगी। 50 के दशक में डीएमके अलगाववादी यानी भारत विरोधी थी। तो स्टालिन एक तरह से धमकी दे रहे हैं कि उनकी सत्ता गई तो वह देश के खिलाफ भी जा सकते हैं। अब कोई जीतने वाला नेता तो इस तरह की बात बोल नहीं सकता।
अब आप देखिए कि डीएमके के पक्ष में और खिलाफ क्या है। डीएमके के पक्ष में यह है कि उनका कैडर बहुत मजबूत है और उनके पास एमके स्टालिन के रूप में मास लीडर है। करुणानिधि की पॉलिटिकल लिगेसी है। सत्ता में रहने का भी एडवांटेज है। वह कई स्कीमें चला रही है। बहुत सारी स्कीम्स का वादा किया है। अब उसकी कमजोरियों पर आते हैं। डीएमके के गठबंधन में एक पार्टी वीसीके शामिल है। यह मूल रूप से दलितों की पार्टी है। लेकिन वीसीके से ज्यादा सीटें डीएमडीके पार्टी को दी गई हैं,जो कमजोर मानी जा रही है। तमिलनाडु में दलित वोटों का चुनाव नतीजों पर बहुत बड़ा प्रभाव रहता है। तो वीसीके को कम सीटें देना स्टालिन की पहली गलती है। 2021 के चुनाव में तमिलनाडु में जहरीली शराब से मौतें बहुत बड़ा मुद्दा बना था। स्टालिन ने तमिलनाडु की महिलाओं से वादा किया था कि अगर हम सत्ता में आए तो प्रदेश में शराबबंदी लागू करेंगे। लेकिन सत्ता में आने के बाद वह वादा भूल गए। तो उन्होंने महिलाओं से वादा खिलाफी की। चूंकि पुरुष ज्यादातर पैसा शराब पर खर्च कर देते हैं तो इससे महिलाओं की ही आर्थिक सुरक्षा खतरे में पड़ती है। शराब से किसी कमाने वाले की मौत का भी उन्हीं पर सीधा असर होता है। इसके अलावा इन चुनावों में महिला सुरक्षा को भी एनडीए ने बड़ा मुद्दा बना दिया है। लोकसभा चुनाव में अकेले दम पर 11% वोट लाकर भाजपा ने अपनी ताकत दिखा दी थी। अब विधानसभा चुनाव में अमित शाह ने समझ लिया है कि ताकतवर गठबंधन के बिना कुछ नहीं होगा। इसीलिए उन्होंने अपनी पार्टी को बढ़ाने के बजाए डीएमके को सत्ता से हटाने का लक्ष्य रखा है। उसने एआईएडीएमके को मजबूत करने के लिए अपनी सीटों की संख्या कम कराई। उसके अलावा गठबंधन में पीएमके और दिनकरण की पार्टी एएमएमके को जोड़ा। दिनकरण जयललिता के करीबी माने जाते थे। उनका प्रभाव थेवर वोटरों पर अच्छा खासा है जो डीएमके को बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
डीएमके एंटी इनकंबेंसी का दबाव भी महसूस कर रही है। इसीलिए स्टालिन ने अपने एक तिहाई विधायकों का टिकट काट दिया है। सवाल यह है कि क्या टिकट कटने से ही उस क्षेत्र में डीएमके के खिलाफ जो माहौल है, वह बदल जाएगा। अब इसका कितना फायदा एनडीए गठबंधन में शामिल पार्टियां उठा पाती हैं यह देखने वाली बात होगी। सनातन का समूल नाश करने की बात कहने वाले उदयनिधि स्टालिन के मंदिर-मंदिर घूमने से भी आप उनके दबाव को समझिए। 2026 के चुनाव से पहले तक क्रिश्चियन वोट डीएमके को मिलता रहा है। लेकिन इन चुनावों में उस वोट के चैलेंजर के रूप में सुपरस्टार विजय आ गए हैं। उनकी पार्टी टीवीके अकेले दम पर लड़ रही है। लोगों के मन में सवाल यह है कि वह वोट किसका काटेंगे? विशेषज्ञों की राय है कि विजय की पार्टी 10 में से सात वोट डीएमके और तीन वोट एनडीए का काट सकती है। क्रिश्चियन समुदाय इस समय पूरी तरह से विजय के साथ खड़ा है। तो विजय ज्यादा बड़ा झटका डीएमके को देने वाले हैं।
एक विचित्र बात यह है कि डीएमके गठबंधन में कांग्रेस भी शामिल है, लेकिन तमिलनाडु में एक भी सभा स्टालिन और राहुल गांधी की एक साथ नहीं हुई। महिला आरक्षण बिल गिराने में दोनों साथ रहे, लेकिन चुनाव प्रचार साथ नहीं किया। स्टालिन के साथ चुनाव प्रचार किसने किया? अरविंद केजरीवाल और तेजस्वी यादव। ये दोनों ऐसे नेता हैं जिनकी तमिलनाडु में एक वोट दिलाने की हैसियत नहीं है। ये अपने ही राज्यों में हारे हुए नेता हैं। मैंने जब रोड शो में एमके स्टालिन के साथ अरविंद केजरीवाल को देखा तो मुझे हंसी आ रही थी कि आखिर स्टालिन की राजनीतिक समझ को क्या हो गया है? अरविंद केजरीवाल उनको क्या दे सकते हैं? केजरीवाल की छवि अब कट्टर बेईमान की है। वह जेल जा चुके हैं और फिर जेल जाने का खतरा उनके सिर पर मंडरा रहा है।
दूसरी तरफ एआईएडीएमके के पास उस तरह की करिश्माई लीडरशिप नहीं है, जैसी जयललिता के समय हुआ करती थी,लेकिन ई पलनिस्वामी जमीन पर काम करने वाले नेता हैं। एआईएडीएमके का संगठन जमीन पर अब भी बहुत मजबूत है। पललिस्वामी ने जिस तरह से छोटी-छोटी जगहों तहसील,जिला व ब्लॉक स्तर पर सभाएं कीं, उससे डीएमके की परेशानी और ज्यादा बढ़ी है। एनडीए के कैंपेन में भी ज्यादा जोश दिखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह के साथ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रचार अभियान में हिस्सा लिया। कुल मिलाकर अभी तो बड़ा स्पष्ट लग रहा है कि 4 मई को एनडीए अगर सत्ता में आ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जैसे-जैसे चुनाव आगे बढ़ा है, डीएमके लगातार नीचे खिसकती गई है। महिला आरक्षण संशोधन विधेयक को गिराकर भी डीएमके ने महिला सेंटीमेंट को बिगाड़ा है। डीएमके सत्ता से बाहर जाती हुई दिखाई दे रही है, लेकिन असली फैसला तो 4 मई को ही आएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)