तीनों मस्जिदों में अब महिलाएं पढ़ सकेंगी पांचों समय नमाज।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ से भी इसी तरह के फैसले की उम्मीद बंधी।

पुणे की तीन मस्जिदों के ट्रस्ट ने महिलाओं को इन मस्जिदों में नमाज अता करने की स्वीकृति दी है, जो दुनिया भर के लिए नजीर बन चुका है। इससे उम्मीद बंधी है कि सुप्रीम कोर्ट भी महिलाओं को मस्जिदों में पांच वक्त की नमाज की अनुमति देने का फैसला देगा।इस हक़ के लिए वर्षों से संघर्ष कर रही यासमीन पीरजादा का मानना है कि उसका संघर्ष अब पूरे देश के लिए सुधार बदलाव की मिसाल बनने वाला है। पीरजादा के गांव मोहम्मदिया और पुणे शहर की दो मस्जिदों में नमाज कक्ष की दिशा बताने वाले बाकायदा बोर्ड भी लगा दिए गए हैं, जिन पर लिखा है- अहम ऐलान ख्वातीन के लिए तहारत वजू ओर नमाज का माकूल इंतजाम है।

महिलाओं के लिए खुले तीन मस्जिदों के दरवाजे

पुणे से शुरू हुए संघर्ष और आये बदलाव के बाद महिलाओं को मस्जिदों में पांच वक्त की नमाज की अनुमति को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नौ सदस्यों वाली संविधान पीठ को विचार करना है। उससे पहले पुणे की तीन मस्जिदों मुहम्मदिया जामा, बागबान और कोंडोवा पारबेन नगर मस्जिद के ट्रस्ट को एहसास हो गया कि इस तरह के प्रतिबंध मजहब समेत किसी भी आधार पर टिक नहीं सकते।

यासमीन पीरजादा की इस लड़ाई में हर जगह साथ देने वाले जुबेर अहमद पीरज़ादा बताते हैं कि अगर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला हमारे पक्ष में आया, तो पूरे देश में अधिकारों की इस लड़ाई को नया मुकाम मिल जाएगा। पीठ को मस्जिदों में महिलाओं को नमाज की इजाजत से लेकर सबरीमाला मंदिर , पारसी और बोहरा समुदाय की महिलाओं के अधिकारों के सवालों के संदर्भ में भी अपना फैसला देना है।

हालात बदलने में लगता है समय

पीरजादा कहते हैं कि पर्सनल लॉ बोर्ड ने कोर्ट में पक्ष रखा कि महिलाओं के लिए मस्जिदों में नमाज वर्जित नहीं है। उसके बाद उन लोगों पर नैतिक दबाव बना है, जो इसके विरोधी थे। उन्होंने बताया कि अब हालात बदलने का सिलसिला शुरू हो गया है, क्योंकि हालात पूरी तरह बदलने में वक्त तो लगता ही है। समाज के अंदर भी हलचल शुरू हो चुकी है। पर्सनल लॉ बोर्ड ने फरवरी, 2020 में सुप्रीम कोर्ट में अपने हलफनामे में कहा था कि एक मुस्लिम महिला को नमाज के लिए मस्जिद में जाने का अधिकार है, लेकिन यह उसकी इच्छा पर निर्भर करता है कि वह अपने इस अधिकार का कैसे इस्तेमाल करती हैं। इस्लाम के अनुसार यह उसके लिए बाध्यकारी नहीं है कि उसे समूह में ही नमाज पढ़नी है।

यह है पूरा मामला

यासमीन और जुबेर पीरजादा ने अक्टूबर, 2018 में पत्र लिखकर पुणे के बोपोड़ी में मोहम्मदिया जामा मस्जिद में नमाज पढ़ने की इजाजत मांगी थी, जिसके जवाब में मस्जिद ने कहा कि पुणे और अन्य क्षेत्रों में महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का चलन नहीं है। बाद में दारुल उलूम देवबंद के हवाले से भी यही जानकारी सामने आई, जिसके बाद इस जोड़ी में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। (एएमएपी)