सोनिया गांधी ने रचा था नेपाल को हिंदू राष्ट्र से धर्मनिरपेक्ष बनाने का षड्यंत्र

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारत में कुछ लोग खासतौर से विपक्षी पार्टियां मोदी सरकार को गिराने या डिसक्रेडिट करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। पिछले काफी समय से उनका एक ही नारा है कि भारत को नेपाल जैसा बना देंगे। भारत में नेपाल जैसा तख्ता पलट का आंदोलन चलेगा। जेन-जी इसको लीड करेगा। जंतर मंतर पर जो हुआ उसके बाद तो यह अभियान और तेज हो गया,लेकिन अब जो कुछ नेपाल में हो रहा है, उसके बाद मेरा एक ही सवाल है कि जरा वे लोग हाथ उठाएं जो भारत को नेपाल बनाना चाहते हैं।
नेपाल दुनिया का एकमात्र देश है, जिसका चरित्र हिंदू है। वहां विश्व प्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर है। नेपाल पर पिछले 20-25 साल से वामपंथ को थोपने की कोशिश की गई,लेकिन सफल नहीं हो पाए। उसके मन में जो हिंदुत्व है,वह निकला नहीं। वहां कावड़ यात्रा निकल रही थी जिस पर मुसलमानों ने हमला कर दिया। हिंदुओं ने भी जवाब देना शुरू किया। मुसलमानों की दुकानें, घर, मस्जिदें जला दीं। पुलिस की फायरिंग में तीन हिंदू मारे गए और प्रधानमंत्री बालेन शाह चार दिन तक चुप रहे। मारे गए तीनों हिंदू मधेस क्षेत्र के रहने वाले थे। यहां के लोगों को भारत समर्थक माना जाता है। नेपाल में मुसलमानों ने जब हिंदुओं के खिलाफ हिंसा शुरू की तो नारा लगाया-हिंदू भगाओ, देश बचाओ। आप कल्पना कीजिए कि जिस देश की आबादी 95% हिंदू है वहां मुसलमान हिंदुओं को भगाने की बात कर रहा है। इसके जवाब में हिंदुओं ने नारा लगाया-मुसलमान भगाओ, देश बचाओ। और फिर पूरे काठमांडू और दूसरी जगहों पर नारे लगे- एक ही नारा, एक ही नाम, जय श्री राम-जय श्री राम। तो ये है नेपाल का ताजा हाल। अब फिर से वह सवाल दोहरा रहा हूं कि कितने लोग हैं, जो भारत को नेपाल बनाना चाहते हैं? नेपाल में आंदोलनकारी अब सरकार से मांग कर रहे हैं कि तीन महीने में नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाए और राजशाही को वापस लाया जाए। इसके लिए संविधान में संशोधन कीजिए। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि 2015 में जब संविधान बनाया नया तो उसमें सेकुलर शब्द किससे पूछ कर डाला? क्या आपने कोई जनमत संग्रह कराया था? नेपाल को किसके कहने पर धर्मनिरपेक्ष बना दिया गया? दरअसल यह बहुत बड़ा षड्यंत्र था और इस षड्यंत्र का नेतृत्व करने वाली और कोई नहीं, सोनिया गांधी थीं। सोनिया गांधी नेपाल से अपने अपमान का बदला लेना चाहती थीं। वह घटना क्या थी,यह भी जान लीजिए। राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। वह सोनिया गांधी के साथ नेपाल की यात्रा पर पहुंचे। राजीव गांधी पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन करना चाहते थे। वहां के पुजारियों ने कहा कि आप दर्शन कीजिए आपका स्वागत है, लेकिन सोनिया गांधी नहीं आ सकतीं। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि इस मंदिर में केवल हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति है जबकि सोनिया गांधी ईसाई धर्म की अनुयायी थीं। राजीव गांधी ने नेपाल के महाराजा से कहा कि आप अपने पुजारियों को समझाइए। उन्होंने कहा कि मंदिर के प्रबंधन और संचालन में सरकार का कोई दखल नहीं है। मंदिर के मुख्य और दूसरे पुजारी दक्षिण भारत के ही हैं। आप अपने लोगों के जरिए उनको समझाने की कोशिश कीजिए, लेकिन मैं इसमें कुछ नहीं कर सकता। तो सोनिया गांधी पशुपतिनाथ मंदिर नहीं जा सकीं। उसके बाद आपको याद होगा कि राजीव गांधी की सरकार ने नेपाल का कितना बड़ा ब्लॉकेड किया था। वहां भारत से डीजल, पेट्रोल, खाद्य सामग्री जाना सब बंद हो गया था। नेपाल में त्राहि-त्राहि मच गई थी।
उसके ऑपरेशन शुरू हुआ कि नेपाल से राजशाही को खत्म करना है। उसे हिंदू राष्ट्र नहीं रहने देना है। इसमें भारत के कम्युनिस्टों और नेपाल के कम्युनिस्टों का भी साथ मिल गया। माओवादी नेता प्रचंड को राजनीति की मुख्यधारा में लाया गया। उसके बाद गलत जानकारी फैलाई गई कि राजशाही खत्म न की गई तो महाराजा चीन से मिल जाएगा और भारत के हितों को स्थाई नुकसान हो जाएगा। और जो नेपाल दुनिया का एकमात्र हिंदू राष्ट्र था,वह 18 मई 2006 को हिंदू राष्ट्र नहीं रहा। संविधान संशोधन हुआ और राजशाही को खत्म कर दिया गया। 95 फीसदी हिंदू आबादी वाला देश धर्मनिरपेक्ष बन गया। अब आप सोचिए कि यह कितना बड़ा षड्यंत्र था,जो सफल हो गया। अब पिछले डेढ़-दो साल से फिर राजशाही को वापस लाने की बात उठ रही है। राजा के वारिस लंबे समय बाद काठमांडू लौटे तो उनका भव्य स्वागत हुआ। इसी बीच नेपाल में जेन-जी आंदोलन भड़का दिया गया। आंदोलनकारियों ने अपने ही देश की संपत्ति को जला दिया। देश में तख्ता पलट हो गया और बालेन शाह प्रधानमंत्री बन गए। लेकिन सवाल यह है कि उसके बाद क्या बदला? जिनको हटाया आज वह उन्हीं से समझौते की कोशिश कर रहे हैं। नेपाल में बालेन शाह से नाराजगी इसलिए भी है कि वे खुद भी मधेशी हैं और हिंदू राष्ट्र की मांग को लेकर आंदोलन मधेश में तेजी से फैल रहा है। 26 जुलाई को कांवड़ यात्रा पर हमले के बाद जो हिंदुत्व की लहर उठी है वह इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं है।
नेपाल में हिंदुओं पर जो हमले हुए उसकी तैयारी पहले से चल रही थी। भारत की सीमा से लगा हुआ जितना इलाका है, वहां पर मजारों और मस्जिदों की बाढ़ आ गई थी। योगी आदित्यनाथ के उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद इन सबका सफाया हो गया तो मुसलमान दबाव में थे। इन्हीं मजारों और मस्जिदों के जरिए पाकिस्तान की इंटेलिजेंस एजेंसी का भी खेल चल रहा था तो उसके खेल में भी बाधा आ गई। उसी के जरिए धर्मांतरण का जो धंधा चल रहा था, उसमें भी रुकावट आ गई। तो हिंदुओं को सबक सिखाने के लिए मुसलमान तैयार बैठे थे और हमले के लिए कांवड़ यात्रा का समय चुना गया,लेकिन वे भूल गए कि नेपाल का हिंदू बहुत ही प्रतिबद्ध हिंदू है। भगवान कृष्ण गीता में कह चुके हैं कि अहिंसा सबसे बड़ा धर्म है लेकिन धर्म की रक्षा के लिए की जाने वाली हिंसा उससे भी सर्वोत्तम है और यही नेपाल में हुआ। 26 जुलाई की ये आग अभी ठंडी नहीं हुई है और जब तक इसका समाधान नहीं निकलेगा ठंडी होगी भी नहीं। 5% लोग 95% लोगों को देश से निकालने की बात करेंगे, यह कैसे स्वीकार हो सकता है? अब सरकार को अल्टीमेटम दिया गया है। सरकार ने कहा है कि हम इस पर विचार करेंगे। प्रधानमंत्री बालेन शाह और उनके साथी इस मांग को ज्यादा समय तक टाल नहीं सकते। मुझे यह नहीं मालूम कि यह छह महीने में होगा,एक साल में होगा या तीन साल में होगा, लेकिन होगा जरूर क्योंकि नेपाल का मानस मूलत: हिंदू है। ऊपर से थोपी गई कोई बात ज्यादा देर तक टिकती नहीं है। नेपाल के लोगों को वामपंथी बनाने की कितनी ही कोशिशें हुईं। फिर चर्च की एंट्री के जरिए धर्मांतरण कराने की कोशिशें हुईं। इसके लिए नेपाल में अनाप-शनाप पैसा आ रहा था। उधर आईएसआई नेपाली हिंदुओं को मुसलमान बनाने का अभियान चला रही थी। अब नेपाल के लोगों को समझ में आ रहा है कि हमारा जो मूल है उससे अगर कटेंगे तो कुछ नहीं बचेगा। बालेन शाह के बारे में कई लोग बताते हैं कि प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने दफ्तर में उन्होंने सारा काम वास्तु के हिसाब से करवाया है। तो हिंदू उनके अंदर भी है। उनको मालूम है कि हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग को वह कुछ समय के लिए टाल सकते हैं, लेकिन इस मुद्दे को खत्म नहीं कर सकते।
एक समय ऐसा लग रहा था कि नेपाल शायद चीन के साथ चला जाए, लेकिन चीन ने नेपाल की जमीन पर कब्जा कर लिया और अब वह नेपालियों को वहां घुसने नहीं देता। नेपाल के लोगों को समझ में आ रहा है कि उनका हित भारत के साथ रहने में है। उनके धर्म की रक्षा भारत के साथ रहकर ही हो सकती है। यह आंदोलन दबने वाला नहीं है। ये नेपाल की मूल आत्मा का आंदोलन है इसलिए यह सफल होकर रहेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)