उसके बाद दीनदयाल उपाध्याय दिल्ली चले गए और 21 अक्टूबर 1951 को वहां जनसंघ की स्थापना की घोषणा कर दी गई। पार्टी का चुनाव चिह्न दीपक था, जो तत्कालीन परिस्थिति में घोर अंधेरे में भी उम्मीद की किरण का प्रतीक था। अपनी स्थापना के एक साल के अंदर ही 1952 के संसदीय चुनाव में पार्टी ने तीन सीटें जीतीं। कोलकाता की जिस इमारत में जनसंघ की नींव पड़ी, वह 26 नंबर विधान सरणी में स्थित है। इसे संघ और भाजपा के लोग केवल 26 नंबर के नाम से जानते हैं। 26 नंबर कहते ही लोग समझ जाते हैं कि लकड़ी की तीन मंजिला सीढ़ियों वाली वह औपनिवेशिक इमारत जिसने आजादी के कई गुमनाम इतिहास को अपने अंदर दफन रखा है।

स्वामी विवेकानंद के आवास से चंद कदम की दूरी पर मौजूद इस इमारत का नाम फिलहाल प्रज्ञा मंदिर है, जो संघ के प्रज्ञा प्रवाह का पूर्वी क्षेत्रीय मुख्यालय है। प्रज्ञा प्रवाह के पूर्वी क्षेत्रीय संयोजक अरविंद दास यहां प्रभारी हैं। जनसंघ की स्थापना के इतिहास का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि गुरुजी के अलावा इस प्रज्ञा मंदिर में अटल बिहारी वाजपेई, दत्तोपंत ठेंगड़ी, मधुकर दत्तात्रेय देवरस समेत उन तमाम महापुरुषों की पुण्य स्थली रही है जिनके कर्म योग की वजह से आज संघ दुनिया का सबसे बड़ा समाजिक संगठन और भारतीय जनता पार्टी विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद की विशालकाय प्रतिमा स्थापित करने की भी रणनीति यहीं से बनी थी।
अरविंद दास बताते हैं कि इसी 26 नंबर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवदर्शन का अपना विचार प्रस्तुत किया था। वह जगह आज भी मौजूद है जहां बैठकर पंडित दीनदयाल तीन दिनों तक एकात्ममानव दर्शन पर बोलते रहे थे। वह कमरा आज भी मौजूद है जहां दीनदयाल उपाध्याय ठहरते थे, अटल बिहारी वाजपेई जहां बैठकर खाना खाते थे, जिस कमरे में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी बाजपेई सरीखे संघ और जनसंघ के बड़े नेताओं ने रणनीतिक चर्चा की थी। वह कमरा भी आज जस का तस मौजूद है। यहां अखंड भारत का मैप भी लगा हुआ है। वह चटाई जिस पर बैठकर ये सारे लोग खाना खाते थे वह भी है और सिर्फ ढाई हाथ लंबीं वह चटाई जिस पर इन तमाम महापुरुषों को सोना पड़ता था वह भी संरक्षित रखी गई है।

अरविंद दास बताते हैं कि देश के बंटवारे के बाद भी कई सालों तक हिंदुओं पर अत्याचार जारी थे। खांसकर बांग्लादेश में लोग पलायन कर कोलकाता आते थे और इसी प्रज्ञा मंदिर में उन्हें ठहरने की व्यवस्था की जाती थी। बड़ी संख्या में लोग आते थे इसलिए जगह कम होती थी। ढाई हाथ की चटाई पर ही लोगों को सोना पड़ता था। इन तमाम यादों को यहां संजोकर रखा गया है।
अरविंद दास कहते हैं कि आज भारत पूरी दुनिया में एक मजबूत राष्ट्र के तौर पर स्थापित है। इसकी नींव इसी प्रज्ञा मंदिर में रखी गई थी। राष्ट्रप्रेमी लोगों को एक बार इस प्रज्ञा मंदिर में जरूर आना चाहिए ताकि आजादी के पहले और उसके बाद दशकों तक अंधेरे में गुमनाम रहकर आज के सशक्त भारत के लिए नींव बने उन तमाम महापुरुषों की पुण्य स्मृतियों को समझकर भविष्य के लिए और मजबूती से राष्ट्र निर्माण में जुड़ सकें। (एएमएपी)



