कश्मीर आज भी डी फैक्टो मुस्लिम राज्य, आतंकी और अलगाववादी सोच अब भी कायम।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
जम्मू कश्मीर को भारत के संविधान निर्माताओं या संविधान बनाते समय जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला ने मिलकर एक डी जुरे मुस्लिम स्टेट (संविधान की व्यवस्था के तहत भारत में एक मुस्लिम राज्य) बना दिया। उसे अनुच्छेद 370 के तहत विशेष दर्जा मिला और वह हमेशा के लिए नासूर बन गया। शेख अब्दुल्ला दरअसल जिन्ना के साथ हाथ मिलाना चाहते थे, लेकिन जिन्ना ने कभी उन्हें कश्मीर के नेता की मान्यता नहीं दी। इसलिए उन्होंने भारत से हाथ मिला लिया और भारत में उनके दोस्त जवाहरलाल नेहरू बैठे ही हुए थे। नेहरू ने बिना किसी डेमोक्रेटिक प्रोसेस के उन्हें जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया। उस समय मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था। और यह महज इत्तेफाक नहीं है कि जवाहरलाल नेहरू भी 1946 में बिना किसी डेमोक्रेटिक प्रोसेस के प्रधानमंत्री बने थे। नेहरू जब प्रधानमंत्री बने तो किसी राज्य की कांग्रेस कमेटी ने उनके पक्ष में वोट नहीं दिया था। कांग्रेस वर्किंग कमेटी में कोई उनका समर्थन करने वाला नहीं था,लेकिन गांधी जी ने सारा फैसला पलटवा दिया।
शेख अब्दुल्ला को जम्मू-कश्मीर का प्रधानमंत्री बना दिया गया तो कुछ लोगों ने यह सोचकर इस कदम का समर्थन किया कि ठीक है उनकी सोच अलगाववाद की है,लेकिन अब चूंकि जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा है तो शेख अब्दुल्ला अलगाववादी तत्वों को राष्ट्रवाद की धारा में ले आएंगे। यह धारणा बिल्कुल गलत साबित हुई। शेख अब्दुल्ला व उनके परिवार और उसके अलावा मुफ्ती परिवार ने जम्मू कश्मीर में अलगाववाद को खूब बढ़ावा दिया। जम्मू कश्मीर में आजकल ओवर ग्राउंड वर्कर्स की बहुत बात होती है। दरअसल इनको समर्थन कहां से मिलता है, इस बारे में बड़े विस्तार से कश्मीरी नेता अजय चुंगरू ने बताया है। उनका कहना है अनुच्छेद 370 और 35ए को हटाया जाना अलगाववादी इंफ्रास्ट्रक्चर पर सबसे बड़ी चोट थी। उसके बाद जो डी जुरे मुस्लिम स्टेट था,वह डी फैक्टो में बदल गया। मतलब उसको जो संवैधानिक संरक्षण मिला था, वह खत्म हो गया। उसके बाद केंद्र सरकार ने दूसरा कदम यह उठाया कि राजनीतिक दलों के कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। उस समय उम्मीद थी कि केंद्र सरकार एक कदम और आगे जाएगी और यह जो डी फैक्टो स्टेटस है, उसको भी खत्म करेगी। उसको खत्म करने के लिए जरूरी था कि इस पूरे पॉलिटिकल स्ट्रक्चर को खत्म किया जाए।
5 अगस्त 2019 के बाद जम्मू कश्मीर में आतंकवाद की घटनाएं काफी कम हो गईं और उसका श्रेय केंद्र सरकार की नीतियों और सुरक्षा बलों को जाता है, लेकिन उसके बाद अलगाववाद का दूसरा स्वरूप सामने आया। डॉक्टर अजय चुंगरू मानते हैं कि यह अलगाववादियों और आतंकवादियों का स्ट्रेटेजिक रिट्रीट था। वे यह जानने की कोशिश कर रहे थे कि अनुच्छेद 370 हटने की प्रतिक्रिया पाकिस्तान और बाकी मुस्लिम देशों में क्या होती है। उसके बाद अपनी रणनीति बनाएंगे। इस वजह से उन्होंने आतंकवादी घटनाएं करनी कम कर दीं लेकिन उन्होंने न आतंकवाद छोड़ा और न अलगाववाद। अजय चुंगरू की नजर में केंद्र सरकार की ओर से गलती यह हुई कि डेवलपमेंट का काम उन स्थानों पर ज्यादा किया, जहां आतंकवाद ज्यादा था। एक तरह से आतंकवाद को इंसेंटिवाइज किया गया। जिन इलाकों में आतंकवाद नहीं के बराबर था, वहां विकास के काम कम हुए। मतलब जो आतंकवाद या अलगाववाद के साथ नहीं है उनको एक तरह से दंडित किया गया। इस विरोधाभास के कारण कश्मीर की स्थिति बाहर से बड़ी शांतिपूर्ण दिखाई दे रही है, लेकिन अंदर से ऐसा नहीं है। वहां आतंकवादी अब छिटपुट घटनाएं नहीं कर रहे,वे जिहाद और विचारधारा की लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने इसका प्रमाण तब दिया जब पहलगाम में 26 हिंदुओं को उनका धर्म पूछकर मार डाला। उन्होंने संदेश दिया कि उनकी नीति बदली नहीं है। उनका लक्ष्य एक बार फिर से जम्मू कश्मीर को डी जुरे मुस्लिम स्टेट बनाना है। इसलिए आप देखिए कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद जम्मू में आतंकवादी घटनाएं बढ़ गई हैं। जम्मू में हिंदुओं की आयेदिन हत्याएं हो रही हैं।
तो अलगाववाद और आतंकवाद जम्मू कश्मीर से खत्म नहीं हुआ है। यह कुछ समय के लिए मंद पड़ गया है और यह एक रणनीति के तहत किया जा रहा है। हालांकि इस स्थिति के लिए सुप्रीम कोर्ट भी दोषी है,जिसने केंद्र सरकार पर विधानसभा का चुनाव कराने के लिए दबाव डाला। पहलगाम की घटना बताती है कि आतंकवाद और अलगाववाद की सोच खत्म नहीं हुई है और चुनाव के बाद राज्य में जो सरकार बनी है,उसने उनको एक नया जीवन दिया है। डॉक्टर अजय चुंगरू का कहना है कि ये जो डिफेक्टो मुस्लिम स्टेट है,एक तरह से उससे केंद्र सरकार ने हाथ मिला लिया है। हालांकि मुझे इसमें शक है कि सरकार ने हाथ मिला लिया। मैं यह क्यों न मान लूं कि केंद्र सरकार ने भी एक स्ट्रेटेजिक रिट्रीट किया है। अगला जो एक्शन होगा, उसके लिए समय चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद राज्य में चुनाव कराना उसकी मजबूरी थी। हालांकि भारत सरकार की यह सोच कि जो राष्ट्र के उस तरह से विरोधी नहीं हैं जैसे अलगाववादी हैं,उनके जरिए अलगाववादी व आतंकवादियों को मुख्यधारा में लाया जा सकता है, कभी सफल नहीं हो सकती है। वे अपनी परिस्थिति के कारण अलगाववादी या आतंकवादी नहीं बने हैं, वे एक सोच के कारण बने हैं और वह सोच खत्म नहीं हुई है। वह अपने को अलगाववादी से राष्ट्रवादी दिखाने की कोशिश कर रहा है, लेकिन जब मौका मिलता है वह बताता है कि वह अलगाववाद और आतंकवाद के रास्ते पर अब भी चलने को तैयार है। पहलगाम के आतंकवादियों को जिस तरह से कश्मीर घाटी में संरक्षण मिला,छिपने की जगह मिली, खाना पीना मिला,उनके बारे में कोई सूचना नहीं दी गई, वह कोई सामान्य बात नहीं है। डोमिसाइल एक्ट ने भी अलगाववादियों का हौसला बढ़ाया है। भारत सरकार ने घाटी की डेमोग्राफी बदलने के लिए अभी तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है। इससे भी उनकी हिम्मत और बढ़ी है। आप मान कर चलिए कि जब तक कश्मीर घाटी में डेमोग्राफिक चेंज नहीं होगा,वहां की स्थिति नहीं सुधरेगी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)