स्वागतयोग्य दो सुप्रीम फैसले।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दो ऐतिहासिक फैसले दिए। एक इस देश में बदलती हुई डेमोग्राफी के खतरे व धर्मांतरण के सिलसिले पर लगाम कसने और दूसरा समाज को बांटने की कोशिश कर रही विदेशी ताकतों पर अंकुश लगाने की दृष्टि से बेहद अहम है।

सुप्रीम कोर्ट को देश हित और समाज की चिंता है इसलिए आज इस तरह के फैसले आ रहे हैं। लेकिन एक दूसरा भी दौर रहा है। तब सुप्रीम कोर्ट के जज कैसे नियुक्त किए जाते थे,यह भी समझना चाहिए। इसमें सबसे बड़ा उदाहरण है जस्टिस बहरुल इस्लाम का, जिनको इंदिरा गांधी ने राज्यसभा में भेजा। फिर एक दिन बुलाकर उनसे कहा कि गुवाहाटी चले जाइए। बहरुल इस्लाम ने पूछा-किस लिए,तो उनसे कहा गया कि वहां पहुंचिएगा तो आपको पता चल जाएगा। गुवाहाटी एयरपोर्ट पर उनको बताया गया कि आपको गुवाहाटी हाईकोर्ट का जज बनना है। वे वहां कुछ दिन जज रहे फिर गुवाहाटी हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस हो गए। वहां से रिटायरमेंट के बाद उनको दिल्ली बुलाकर सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया गया। यह भारत के इतिहास में पहली और अब तक आखिरी बार हुआ है कि हाईकोर्ट का कोई चीफ जस्टिस रिटायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया हो, लेकिन इंदिरा गांधी के राज में सब संभव था। सुप्रीम कोर्ट का जज उनको इसलिए बनाया गया क्योंकि उनको बिहार के मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा के मामले में फैसला देना था। जगन्नाथ मिश्रा पर भ्रष्टाचार के आरोप थे। इस्लाम ने जगन्नाथ मिश्रा के पक्ष में फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने अगर ठीक से फैसला दिया होता तो जगन्नाथ मिश्रा जेल में होते। फैसला सुनाने के एक-दो दिन बाद बहरुल इस्लाम सुप्रीम कोर्ट से रिटायर हो गए और उनको फिर से राज्यसभा में भेज दिया गया। इसके बाद उनको असम में विधानसभा चुनाव लड़ाने की कोशिश हुई। वह नॉमिनेशन करने गुवाहाटी पहुंच भी गए थे लेकिन किसी कारण विधानसभा का चुनाव टल गया और वे विधायक नहीं बन पाए वरना हो सकता है कि असम के मुख्यमंत्री भी बन गए होते। इसी तरह एक थे जस्टिस फैसल। वह सुप्रीम कोर्ट के जज थे। जवाहरलाल लाल नेहरू की सरकार में उनके रिटायरमेंट से चार दिन पहले ही नोटिफिकेशन जारी हो गया कि इनको उड़ीसा का राज्यपाल नियुक्त किया जाता है। यह भी अपने आप में एकमात्र उदाहरण है, जब रिटायरमेंट से पहले ही गवर्नर बनाने की घोषणा कर दी गई है। अब आप समझिए कि कैसे पूरी न्याय व्यवस्था को लेकर कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार खेल करता रहा है। अच्छी बात है कि अब गांधी परिवार के नियुक्त किए हुए जज नहीं हैं।

Centre notifies appointment of Justice Joymalya Bagchi to be new SC judge -  The Hindu

तो मैं अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसलों पर आता हूं। आंध्र प्रदेश में एक सज्जन पादरी का काम करते थे। उनकी कुछ लोगों से मारपीट हो गई तो उन्होंने मारपीट करने वालों के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट में मुकदमा कर दिया। कहा कि मैं अनुसूचित जाति से हूं। मामला हाईकोर्ट में गया। हाईकोर्ट ने कहा कि यह कैसे हो सकता है? आपने जैसे ही अपना धर्म छोड़ा आपका अनुसूचित जाति का दर्जा खत्म हो गया। फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में आया। वहां जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जय माल्या बागची की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और कहा कि हिंदू,सिख और बौद्ध सिर्फ इन तीन धर्मों के लोग अनुसूचित जाति का होने का दावा कर सकते हैं। जैसे ही आप इन धर्मों को छोड़ते हैं तो अनुसूचित जाति और आरक्षण के जो भी लाभ हैं सब खत्म हो जाते हैं। चूंकि कुछ लोग देश में रिकन्वर्जन का खेल कर रहे हैं कि हम अपने मूल धर्म में लौट आए हैं, इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बोनाफाइड रिकन्वर्जन की तीन शर्तें हैं कि वह व्यक्ति जो रिकन्वर्जन का दावा कर रहा है प्रमाणित करे कि धर्म परिवर्तन से पहले जिन जातियों को अनुसूचित जाति के रूप में अधिसूचित किया गया है,वह उसका सदस्य था। दूसरी शर्त ये है कि आपको ये साबित करना होगा कि आप जिस धर्म में गए थे, उसको पूरी तरह से छोड़ दिया है। तीसरी शर्त आप जिस मूल धर्म में लौटने का दावा कर रहे हैं, उस मूल धर्म का समाज आपको स्वीकार करे। इन तीन शर्तों में से अगर एक भी शर्त आप पूरी नहीं करते हैं तो आपको बोनाफाइट रिकन्वर्जन का हकदार नहीं माना जाएगा। यानी सुप्रीम कोर्ट ने धोखाधड़ी और बेईमानी के दरवाजे पूरी तरह से बंद कर दिए गए हैं। देश में बड़े पैमाने पर क्रिश्चियन मिशनरीज व अन्य लोग धर्म परिवर्तन करा रहे हैं और डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हो रही है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निश्चित रूप से ऐतिहासिक है। हिंदुओं का धर्म परिवर्तन रोकने में यह बहुत सहायक साबित होगा। हालांकि इसको लागू कैसे किया जाएगा,इसे लेकर कुछ सवाल हैं क्योंकि ऐसे राज्यों, पार्टियों और नेताओं की कमी नहीं है जो धर्म परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं। पंजाब उसका इस समय सबसे ज्वलंत उदाहरण है। आंध्र प्रदेश में जब जगनमोहन रेड्डी की सरकार थी, तब बड़े पैमाने पर यह काम हुआ। नॉर्थ ईस्ट में जो हुआ,हमारे सामने है। अगर राज्य सरकार या जो भी सत्ता में है वहां वह केस ही दर्ज नहीं करता तो फिर साबित करने का प्रश्न ही नहीं उठता। इस पर ध्यान दिए जाने की जरूरत रहेगी।

सुप्रीम कोर्ट ने दूसरा अहम फैसला सुनाते हुए विमुक्त,घुमंतू और अर्ध-घुमंतू जनजातियों को आगामी जनगणना में एक अलग श्रेणी के रूप में शामिल करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। इस फैसले के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया और उनकी बेंच को साधुवाद दिया जाना चाहिए। आमतौर पर अदालतें कानून और संविधान में जो लिखा हुआ है, उसी के हिसाब से फैसला कर देती हैं। उसके पीछे जो बड़ा षड्यंत्र है उसको नहीं देखती हैं। लेकिन इस मामले में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि हम समझ रहे हैं यह भारत के अंदर से नहीं, विदेश से आ रहा है। यह भारत के समाज को तोड़ने की साजिश है। अगर आपको आपको लगता है कि आपके साथ अन्याय हो रहा है तो आप जो सरकारी संस्थाएं इस काम को देखती हैं, उनके पास जाइए।

अब आप कल्पना कीजिए कि यही मुकदमे अगर 2014 से पहले सुप्रीम कोर्ट में आए होते तो क्या फैसला इसी तरह का आता? मैं सुप्रीम कोर्ट या किसी पूर्व जज पर कोई आक्षेप नहीं लगा रहा हूं। मैं वातावरण की बात कर रहा हूं कि उस समय की सरकार देश को किस दिशा में ले जाना चाहती थी। जो लोग आज जेब में संविधान की प्रति लेकर घूमते हैं, उन्होंने संविधान को कुचलने की कितनी बार और कैसी-कैसी कोशिश की है,इससे पिछले 80 साल का इतिहास भरा पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट के ये दो फैसले बताते हैं कि देश में परिवर्तन की एक हवा चल रही है। जरा एक मिनट के लिए सोच कर देखिए कि अगर इन दोनों मामलों में फैसला इसके उलट आया होता तो क्या होता? देश में धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया बहुत तेज हो जाती। नॉर्थ ईस्ट के राज्य आज ईसाई बहुल हो चुके हैं। यह काम ब्रिटिश राज में नहीं हुआ। आजाद भारत में हुआ। इससे आप समझिए कि इस विदेशी षड्यंत्र में देसी ताकतें कितने बड़े पैमाने पर शामिल हैं। अगर हम सोए रहेंगे, अपने अधिकारों के प्रति जागृत नहीं होंगे तो हमारा क्या होगा, इसकी कल्पना करना भी आज शायद मुश्किल है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)