हुमायूं-ओवैसी ने ममता को झटका दिया तो अखिलेश के लिए भी बज जाएगी खतरे की घंटी ।
प्रदीप सिंह।देश की मुस्लिम राजनीति में एक नया प्रयोग शुरू हो गया है। हालांकि इस तरह का प्रयोग 1967 में भी हो चुका है, लेकिन दोनों के चरित्र में अंतर है।
1967 आते-आते मुसलमानों को लगने लगा था कि कांग्रेस उनके लिए उतनी फायदेमंद नहीं है, जितना वे समझ रहे थे। इसके बाद उन्होंने एक संस्था बनाई मुस्लिम मजलिस मुशावरात। इस संस्था ने 1967 के चुनाव में तय किया कि जिस पार्टी में भी अच्छे उम्मीदवार होंगे,मजलिस उनका समर्थन करेगी। अच्छे उम्मीदवार से उनका मतलब मजबूत मुस्लिम उम्मीदवार से था। यह प्रयोग 1967 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव दोनों में सफल नहीं हुआ। तब तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही होते थे। मौलवियों-मुल्लों के कहने पर भी मुसलमानों ने उस तरह से वोट नहीं दिया, जैसा वह चाहते थे। नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम प्रतिनिधित्व और घट गया। लेकिन इसके बाद से कांग्रेस के प्रति मुसलमानों का झुकाव लगातार कम होता गया और 6 दिसंबर 1992 के बाद तो उनका कांग्रेस पार्टी से मोहभंग ही हो गया। जब मनमोहन-सोनिया की सरकार आई तो मुसलमानों का कांग्रेस के प्रति थोड़ा प्रेम फिर जगा। उसके बहुत से कारण थे। मनमोहन सरकार की ओर से कह दिया गया था कि जिस संपत्ति को वक्फ बोर्ड कह देगा, वह उसकी हो जाएगी। इसके अलावा माइनॉरिटी कमीशन बना, माइनॉरिटी मिनिस्ट्री बनी। इसी कारण 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को काफी फायदा हुआ और उसे 21 सीटें मिल गईं।
उसके बाद मुस्लिम राजनीति में एक और परिवर्तन आया। 2023 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मुसलमानों ने कांग्रेस को एकमुश्त वोट दिया। जबकि राज्य में पहले उनका वोट देवगौड़ा के जनता दल सेकुलर को मिलता रहा था। ऐसा ही तेलंगाना में हुआ। वहां भी मुसलमानों ने बीआरएस को छोड़ दिया और एकमुश्त वोट कांग्रेस को दिया। इस परिवर्तन से अखिलेश यादव डर गए। उनको लगा कि मुसलमान अब कांग्रेस की ओर जा रहा है। उसी का दबाव था कि अखिलेश ने 2024 के लोकसभा चुनाव में यूपी में कांग्रेस के साथ गठबंधन किया। उसका फायदा कांग्रेस और सपा दोनों को हुआ। कांग्रेस एक सीट से छह और समाजवादी पार्टी पांच सीट से सीधे 37 सीट पर पहुंच गई। वह मुस्लिम समाज की ओर से एक संकेत था कि हम विकल्प की तलाश में हैं। कांग्रेस छोड़कर पहले क्षेत्रीय दलों की तरफ गए फिर क्षेत्रीय दलों से मोहभंग हुआ तो कांग्रेस की ओर लौटने लगे।

अब एक तीसरा परिवर्तन आ रहा है और वह पश्चिम बंगाल में दिखाई दे रहा है। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की सीधी लड़ाई भाजपा से है। वहां मुसलमानों ने तय किया कि अपनी एक तीसरी पार्टी होनी चाहिए। तो टीएमसी के विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की और उसके बाद टीएमसी से इस्तीफा देकर अपनी पार्टी बना ली। उन्होंने 182 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है। उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से गठबंधन भी कर लिया है। एआईएमआईएम राज्य की उन आठ सीटों पर लड़ेगी जहां मुस्लिम आबादी 50% या उससे ज्यादा है। अब देखिए कि अगर मुसलमानों का ममता बनर्जी से मोहभंग हो रहा है तो वे सीपीएम या कांग्रेस की ओर भी जा सकते थे, लेकिन उन्होंने फैसला किया कि अब अपनी पार्टी की जरूरत है। असदुद्दीन ओवैसी देशभर में घूम-घूम कर कह रहे हैं कि जो लोग हमारा वोट लेकर सरकार में आते हैं,वे हमें कुछ नहीं देते हैं। वे गिनाते हैं कि कांग्रेस राज में किस तरह से दंगे हुए, कितने लोग मारे गए। वह उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और बिहार में तेजस्वी यादव के राष्ट्रीय जनता दल का विरोध करते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगभग 27 फीसदी थी। अब अनुमान है कि ये 30% से ऊपर हो चुकी है। राज्य की 85 सीटों पर मुसलमान मतदाता ही तय करता है कौन जीतेगा, कौन हारेगा। 2021 के विधानसभा चुनाव में इन 85 में से 75 सीटें तृणमूल कांग्रेस ने जीती थीं और इस बार अनुमान है कि अगर हुमायूं कबीर और ओवैसी की पार्टी का गठबंधन ठीक से लड़ा तो इन 85 में से कम से कम 60-65 सीटों पर वे तृणमूल कांग्रेस को हरा या हरवा देंगे।
अभी तक बीजेपी को कौन हरा रहा है मुसलमान उसे ही वोट करता था। पहली बार यह होने जा रहा है कि बीजेपी को कौन हरा रहा है,यह बात उसके सोच-विचार से बाहर हो गई है। बीते कई लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल का मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से ममता बनर्जी के साथ था। लेकिन अब इस परिस्थिति में बदलाव आ रहा है। भाजपा से लड़ने के लिए अब वे अपनी ताकत तैयार कर रहे हैं। पश्चिम बंगाल का 2026 का चुनाव इसी प्रयोग के लिए हो रहा है। बसपा संस्थापक कांशीराम का एक नारा आपको याद होगा। पहले हारेंगे, फिर हराएंगे और उसके बाद जीतेंगे। ऐसा लगता है कि पश्चिम बंगाल के मुसलमान इसी रास्ते पर चल रहे हैं। उनको मालूम है कि हारेंगे लेकिन उनको यह भी मालूम है कि इसी चुनाव में वह हराने की भी ताकत रखते हैं। उसके बाद जहां 35, 40, 50, 60 या 70% मुस्लिम आबादी है,उन चुनाव क्षेत्रों में उनको जीत की उम्मीद है। इसलिए पहले वे तृणमूल कांग्रेस से अपना नाता तोड़ना चाहते हैं। उनको लगता है कि तृणमूल कांग्रेस को हरवाकर इस समीकरण से बाहर कर दें तो उनकी सीधी लड़ाई भाजपा से होगी। तब मुस्लिम ध्रुवीकरण में हमें सबसे ज्यादा मदद मिलेगी। मुस्लिम राजनीति में इस नए प्रयोग को बिहार के दो चुनाव में बल मिला है। ओवैसी की पार्टी सीमांचल में बड़ी ताकत बनकर उभरी है। महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनाव में भी इसी तरह मिली जीत से उनमें उम्मीद जगी है कि मुसलमानों को अपनी पार्टी से जोड़ा जा सकता है। ओवैसी का लक्ष्य है कि मुसलमानों का अपना नेता होना चाहिए, जो आजादी के बाद से देश में कभी नहीं हुआ। पहले नेहरू को माना। उसके बाद जब क्षेत्रीय दलों जैसे उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव। इसी तरह से बिहार में लालू प्रसाद यादव और अब तेजस्वी यादव। अब उनको यह बात समझ में आ गई है कि क्षेत्रीय दल या कांग्रेस में वह ताकत नहीं है, जो बीजेपी को हरा सकें।
मुसलमानों का यह नया प्रयोग क्षेत्रीय दलों और मेरा मानना है कि सबसे ज़्यादा कांग्रेस के लिए बहुत बुरी खबर है। भारत के मुसलमान कोशिश कर रहे हैं कि क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस से उनको छुटकारा मिले। एक दिन ऐसा आए कि उनकी लड़ाई सीधे भाजपा से हो इसीलिए वे डेमोग्राफिक चेंज पर बड़ी तेजी से काम कर रहे हैं। उनके दिमाग में सिर्फ एक बात है कि विधानसभा,लोकसभा,राज्यसभा में ज्यादा से ज्यादा मुसलमानों को भेजा जाए। इस दृष्टि से यूपी में 2027 में होने वाला विधानसभा का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होगा।
उसमें अगर मुसलमान थोड़ा सा भी खिसक गया तो समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन का सफाया हो जाएगा। इस बात की आशंका कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों के मन में बढ़ती जा रही है। इस दिशा में मामला कितना बढ़ेगा, इसका फैसला होगा जब पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव का नतीजा आएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



