प्रदीप सिंह देश की राजनीति,समाज और दूसरे क्षेत्रों में कई तरह के बदलाव हो रहे हैं। तमिलनाडु में विधानसभा का चुनाव चल रहा है, वहां की द्रविड़ राजनीति हिंदी के विरोध की रही है,लेकिन अब वहां तेजी से हिंदी का प्रचार-प्रसार हो रहा है और हिंदू सेंटीमेंट जाग रहा है।
तमिलनाडु में द्रमुक आंदोलन हिंदी और हिंदू विरोध पर खड़ा हुआ आंदोलन था। राज्य में सत्तारूढ़ द्रमुक सरकार में उप मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने करीब डेढ़ साल पहले बयान दिया था कि सनातन धर्म बीमारी है और इसका समूल नाश कर दिया जाना चाहिए। उनके पिता एमके स्टालिन हिंदी के घोर विरोध में रहते हैं क्योंकि केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है और केंद्र सरकार का बहुत सारा काम हिंदी में होने लगा है। द्रमुक के सांसद केंद्रीय मंत्रियों पर दबाव डालते हैं कि प्रश्नकाल में उनके प्रश्नों का जवाब हिंदी में न देकर अंग्रेजी में दें। मतलब अंग्रेजी मंजूर है, हिंदी नहीं। वैसे संसद में अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है। आप अपना माइक्रोफोन लगाइए और जिस भाषा में सुनना चाहते हैं जवाब उस भाषा में आपको सुनाई देगा, लेकिन उनको को हिंदी और हिंदू विरोध का मुद्दा बनाना है। अब तमिलनाड़ में जमीन से जो बातें आ रही हैं, वे बता रही हैं कि सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। राज्य में हिंदू सेंटीमेंट जाग रहा है।
कई बार कोई एक घटना परिवर्तन की शुरुआत कर देती है। तमिलनाडु में वह घटना थी दीपथून की। मदुरई जिले में एक पर्वत पर प्राचीन मंदिर है। कुछ समय पहले उससे थोड़ी ही दूर पर एक दरगाह बना दी गई। शताब्दियों से मंदिर के एक खंभे पर साल में एक बार दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा चली आ रही है। स्टालिन की सरकार ने 2025 में इसे यह कहकर रोक दिया कि इसकी रोशनी से दरगाह के लोगों यानी मुसलमानों को परेशानी होगी। अब आप कल्पना कीजिए यह किस तरह का तर्क है। दरगाह के लोगों ने कहा कि हमें कोई ऐतराज नहीं है,लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं हुई। मामला हाईकोर्ट में गया और उसने आदेश दिया कि दीपथून की परंपरा को निभाया जाएगा और दीप प्रज्ज्वलित किया जाएगा। लेकिन हिंदू विरोधी स्टालिन की सरकार इस फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल से इनकार कर दिया। फिर भी स्टालिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं बल्कि उसने तो फैसला सुनाने वाले हाईकोर्ट के जज के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की। अब आप समझ लीजिए स्टालिन किस हद तक जाने को तैयार हैं। द्रमुक सरकार के हिंदी विरोध का दूसरा मुद्दा भी जानिए। एमके स्टालिन केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह तमिलनाडु पर हिंदी थोपना चाहती है। जबकि तमिलनाडु की संस्कृति और तमिल भाषा के प्रचार प्रसार के लिए जितना काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है,किसी केंद्रीय नेता ने इससे पहले नहीं किया। तमिल और काशी की संस्कृति के मेलजोल के लिए काशी तमिल संगमम का हर साल काशी में आयोजन किया जाता है। नए संसद भवन में तमिल संस्कृति के प्रतीक को स्थान दिया गया है।
एमके स्टालिन और दक्षिण के राज्यों के दूसरे मुख्यमंत्री यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि आबादी पर नियंत्रण की योजना को उन्होंने ठीक ढंग से लागू किया इसलिए उनके प्रदेशों की आबादी नहीं बढ़ी। उत्तर के राज्यों ने इसे लागू नहीं किया इसलिए उनकी आबादी बढ़ गई। इसलिए लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के परिसीमन में हमें नुकसान होगा। इस पर केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि सीटों के अनुपात में कोई अंतर नहीं आएगा। दक्षिण और उत्तर के राज्यों की सीटों का जो अनुपात अभी है, वही बना रहेगा। लेकिन फिर भी स्टालिन इसको मानने को तैयार नहीं हैं। स्टालिन हिंदी का इतना विरोध करते हैं और आबादी को लेकर मुद्दा बनाते हैं, लेकिन इसका दूसरा पक्ष नहीं बताते। आबादी कम होने से तमिलनाडु और दक्षिण के अन्य राज्यों में लेबर फोर्स की जो कमी है, उसे उत्तर भारत से गए मजदूर ही पूरा करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, असम, झारखंड से जाकर मजदूर तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में काम करते हैं। ये कामगार अगर लौट आएं तो तमिलनाडु की फैक्ट्रियां चलना बंद हो जाएंगी। तमिलनाडु के विकास और वहां की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में इन मजदूरों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन यह बात स्टालिन नहीं बताते।
स्टालिन के लिए एक मुश्किल यह हो रही है कि जो मजदूर उत्तर भारत से जा रहे हैं, वे सब हिंदी भाषी हैं। तो तमिलनाडु में आम लोगों के स्तर पर हिंदी का विरोध लगभग नहीं के बराबर हो गया है। आप तमिलनाडु में चेन्नई या दूसरे शहरों में चले जाइए। वहां होटलों में जाइए आपको हिंदी बोलने व समझने वाले कई मिलेंगे। फैक्ट्रियों में काम वाले तमिल मैनेजर और सुपरवाइजर इन मजदूरों से हिंदी में ही बात करते हैं और उनकी बात अच्छी तरह समझते भी हैं। तो तमिलनाडु में हिंदी का प्रचार प्रसार आजादी के समय जितना था, उससे बहुत ज्यादा हो गया है। दक्षिण के अन्य राज्यों में हिंदी का इतना विरोध नहीं रहा है,जितना तमिलनाडु में रहा। डीएमके जो द्रविड़ राजनीति करती है, वह सबसे ज्यादा विरोध करती है। उनको हिंदी से नहीं,हिंदुत्व से डर है। उनको लगता है हिंदी आएगी तो हिंदुत्व का भी प्रभाव बढ़ेगा। लेकिन जो उदयनिधि सनातन को बीमारी बताते हैं,वह इस चुनाव के दौरान मंदिर-मंदिर जाकर साष्टांग दंडवत कर रहे हैं क्योंकि उन्हें तमिलनाडु की 88 प्रतिशत हिंदू आबादी का वोट चाहिए।
तमिलनाडु में मैं यह नहीं कहने जा रहा हूं कि 4 मई के बाद भाजपा सत्ता में आने जा रही है, लेकिन एनडीए सत्ता में आ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। एनडीए को सत्ता मिलती है तो राज्य में हिंदी और हिंदुत्व का वर्चस्व बढ़ेगा। तो हिंदी और हिंदुत्व दोनों पूरी धमक के साथ तमिलनाडु पहुंच रहे हैं। इसको द्रविड़ मूवमेंट रोक नहीं पाया। करुणानिधि परिवार रोक नहीं पाया। एमके स्टालिन भी रोक नहीं पाए। हो सकता है इसकी बाढ़ में बह भी जाएं, लेकिन 4 मई तक तो इंतजार करना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
कई बार कोई एक घटना परिवर्तन की शुरुआत कर देती है। तमिलनाडु में वह घटना थी दीपथून की। मदुरई जिले में एक पर्वत पर प्राचीन मंदिर है। कुछ समय पहले उससे थोड़ी ही दूर पर एक दरगाह बना दी गई। शताब्दियों से मंदिर के एक खंभे पर साल में एक बार दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा चली आ रही है। स्टालिन की सरकार ने 2025 में इसे यह कहकर रोक दिया कि इसकी रोशनी से दरगाह के लोगों यानी मुसलमानों को परेशानी होगी। अब आप कल्पना कीजिए यह किस तरह का तर्क है। दरगाह के लोगों ने कहा कि हमें कोई ऐतराज नहीं है,लेकिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं हुई। मामला हाईकोर्ट में गया और उसने आदेश दिया कि दीपथून की परंपरा को निभाया जाएगा और दीप प्रज्ज्वलित किया जाएगा। लेकिन हिंदू विरोधी स्टालिन की सरकार इस फैसले के विरोध में सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में दखल से इनकार कर दिया। फिर भी स्टालिन सरकार इसे मानने को तैयार नहीं बल्कि उसने तो फैसला सुनाने वाले हाईकोर्ट के जज के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने की कोशिश की। अब आप समझ लीजिए स्टालिन किस हद तक जाने को तैयार हैं। द्रमुक सरकार के हिंदी विरोध का दूसरा मुद्दा भी जानिए। एमके स्टालिन केंद्र सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि वह तमिलनाडु पर हिंदी थोपना चाहती है। जबकि तमिलनाडु की संस्कृति और तमिल भाषा के प्रचार प्रसार के लिए जितना काम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है,किसी केंद्रीय नेता ने इससे पहले नहीं किया। तमिल और काशी की संस्कृति के मेलजोल के लिए काशी तमिल संगमम का हर साल काशी में आयोजन किया जाता है। नए संसद भवन में तमिल संस्कृति के प्रतीक को स्थान दिया गया है।
एमके स्टालिन और दक्षिण के राज्यों के दूसरे मुख्यमंत्री यह मुद्दा उठाते रहे हैं कि आबादी पर नियंत्रण की योजना को उन्होंने ठीक ढंग से लागू किया इसलिए उनके प्रदेशों की आबादी नहीं बढ़ी। उत्तर के राज्यों ने इसे लागू नहीं किया इसलिए उनकी आबादी बढ़ गई। इसलिए लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के परिसीमन में हमें नुकसान होगा। इस पर केंद्र सरकार ने साफ कर दिया है कि सीटों के अनुपात में कोई अंतर नहीं आएगा। दक्षिण और उत्तर के राज्यों की सीटों का जो अनुपात अभी है, वही बना रहेगा। लेकिन फिर भी स्टालिन इसको मानने को तैयार नहीं हैं। स्टालिन हिंदी का इतना विरोध करते हैं और आबादी को लेकर मुद्दा बनाते हैं, लेकिन इसका दूसरा पक्ष नहीं बताते। आबादी कम होने से तमिलनाडु और दक्षिण के अन्य राज्यों में लेबर फोर्स की जो कमी है, उसे उत्तर भारत से गए मजदूर ही पूरा करते हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, उड़ीसा, असम, झारखंड से जाकर मजदूर तमिलनाडु की फैक्ट्रियों में काम करते हैं। ये कामगार अगर लौट आएं तो तमिलनाडु की फैक्ट्रियां चलना बंद हो जाएंगी। तमिलनाडु के विकास और वहां की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाने में इन मजदूरों का बहुत बड़ा योगदान है, लेकिन यह बात स्टालिन नहीं बताते।
स्टालिन के लिए एक मुश्किल यह हो रही है कि जो मजदूर उत्तर भारत से जा रहे हैं, वे सब हिंदी भाषी हैं। तो तमिलनाडु में आम लोगों के स्तर पर हिंदी का विरोध लगभग नहीं के बराबर हो गया है। आप तमिलनाडु में चेन्नई या दूसरे शहरों में चले जाइए। वहां होटलों में जाइए आपको हिंदी बोलने व समझने वाले कई मिलेंगे। फैक्ट्रियों में काम वाले तमिल मैनेजर और सुपरवाइजर इन मजदूरों से हिंदी में ही बात करते हैं और उनकी बात अच्छी तरह समझते भी हैं। तो तमिलनाडु में हिंदी का प्रचार प्रसार आजादी के समय जितना था, उससे बहुत ज्यादा हो गया है। दक्षिण के अन्य राज्यों में हिंदी का इतना विरोध नहीं रहा है,जितना तमिलनाडु में रहा। डीएमके जो द्रविड़ राजनीति करती है, वह सबसे ज्यादा विरोध करती है। उनको हिंदी से नहीं,हिंदुत्व से डर है। उनको लगता है हिंदी आएगी तो हिंदुत्व का भी प्रभाव बढ़ेगा। लेकिन जो उदयनिधि सनातन को बीमारी बताते हैं,वह इस चुनाव के दौरान मंदिर-मंदिर जाकर साष्टांग दंडवत कर रहे हैं क्योंकि उन्हें तमिलनाडु की 88 प्रतिशत हिंदू आबादी का वोट चाहिए।
तमिलनाडु में मैं यह नहीं कहने जा रहा हूं कि 4 मई के बाद भाजपा सत्ता में आने जा रही है, लेकिन एनडीए सत्ता में आ जाए तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। एनडीए को सत्ता मिलती है तो राज्य में हिंदी और हिंदुत्व का वर्चस्व बढ़ेगा। तो हिंदी और हिंदुत्व दोनों पूरी धमक के साथ तमिलनाडु पहुंच रहे हैं। इसको द्रविड़ मूवमेंट रोक नहीं पाया। करुणानिधि परिवार रोक नहीं पाया। एमके स्टालिन भी रोक नहीं पाए। हो सकता है इसकी बाढ़ में बह भी जाएं, लेकिन 4 मई तक तो इंतजार करना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)



