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आईजीएनसीए और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय ने किया समझौता

भारत के परम्परागत ज्ञान का आधुनिक विज्ञान के साथ समन्वय कर ज्ञान के नए आयामों का संधान करने के लिए इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) और गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा (जीबीयू) ने एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए। इस अवसर पर आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डीन एवं कलानिधि प्रभाग के प्रमुख प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़, कलाकोश एवं सीआईएल प्रभाग के प्रमुख प्रो. सुधीर लाल, मीडिया प्रभाग के प्रमुख श्री अनुराग पुनेठा और बृहत्तर भारत एवं क्षेत्र अध्ययन प्रभाग के प्रमुख प्रो. धर्मचंद चौबे सहित केन्द्र के कई अधिकारी उपस्थित थे। इस अवसर पर जीबीयू की ओर से कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह, रजिस्ट्रार प्रो. चंद्र कुमार सिंह, प्रो. उत्तम कुमार सहित कई अध्यापक और अधिकारी उपस्थित थे। समझौता पत्र पर आईजीएनसीए की ओर से प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ और जीबीयू की ओर से रजिस्ट्रार प्रो. चंद्र कुमार सिंह ने हस्ताक्षर किए।

इस अवसर पर, डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने कहा, राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू होने के बाद से हो ये रहा है कि हर कोई भारतीय शिक्षा प्रणाली या ज्ञान प्रणाली के नए क्षितिजों को खोजने में लगा हुआ है। लेकिन सभी लोग उसी पुराने दायरे में, उसी सीमित सोच में ही घूम रहे हैं। नए आयामों की खोज की जानी चाहिए, और वे तभी खोजे जा सकते हैं, जब आप लीक से हटकर सोचें। इसलिए यह समझौता ज्ञापन (एमओयू) एक अनोखी और नई पहल है, जिसमें जीवन विज्ञान, चिकित्सा विज्ञान और आयुर्वेद विज्ञान से जुड़े लोग एक साथ आकर हमारी शास्त्रीय परम्परा में उपलब्ध उन तत्वों पर चर्चा करेंगे, जो इस प्रकार के ज्ञान से सम्बंधित हैं। ऐसा प्रयास ही कुछ ऐसा सामने ला सकता है, जो अब तक अनछुआ है और जिसके बारे में पहले कभी सोचा नहीं गया। इसलिए मुझे लगता है कि यह एमओयू ज्ञान के क्षेत्र में एक नए आयाम का मार्ग प्रशस्त करेगा।

जीबीयू के कुलपति प्रो. राणा प्रताप सिंह ने कहा, जब हम इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि हम कहां और कैसे मिलकर काम कर सकते हैं, तब ये सुझाव आया कि हमारे पास कई पाण्डुलिपियों का डिजिटल भंडार भी उपलब्ध है। हम उनमें निहित ज्ञान को खोजने और समझने पर विचार कर सकते हैं। उनमें जो भी उपयोगी विचार, जानकारी और अनुवाद उपलब्ध हैं, उन पर शोध किया जा सकता है। साथ ही, उनकी वर्तमान प्रासंगिकता को समझकर यह देखा जा सकता है कि वे समाज और आम जनता के लिए किस प्रकार उपयोगी हो सकते हैं। इस प्रकार की ज्ञान-आधारित परियोजनाओं पर हम मिलकर काम कर सकते हैं, क्योंकि हमारे पास उससे सम्बंधित सामग्री उपलब्ध है।

इस पर अपने विचार व्यक्त करते हुए प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने कहा, मुझे लगता है कि यही वास्तविक सहयोग है, क्योंकि हमारे पास ऐसे लोग हैं, जो लिपि तथा पाठ को समझते हैं और आपके पास ऐसे विशेषज्ञ हैं, जो विषय-वस्तु को गहराई से समझते हैं। यही वह स्थान है, जहां हम मिलकर सार्थक कार्य कर सकते हैं। आपने आयुर्वेदिक जीवविज्ञान का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, वह वास्तव में भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान या जैविक विज्ञान के सच्चे समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है। हमारे पास भारत की 52 पुस्तकालयों से एकत्र की गई लगभग तीन लाख पाण्डुलिपियां हैं। इन सभी का डिजिटलीकरण किया जा चुका है और ये माइक्रोफिल्म के रूप में उपलब्ध हैं। पिछले लगभग सात वर्षों में हमने इन सभी पाण्डुलिपियों की विवरणात्मक सूची (डिस्क्रिप्टिव कैटलॉग) भी तैयार की है। इसमें यह जानकारी है कि वेदांत, बौद्ध धर्म, आयुर्वेद आदि विषयों पर कौन-कौन सी पाण्डुलिपियां उपलब्ध हैं। हमने कुल 53 विषय-क्षेत्रों की पहचान की है। इसलिए यदि हमें बौद्ध धर्म और आयुर्वेद पर कार्य प्रारम्भ करना हो, तो हमारे पास पहले से तैयार सूची उपलब्ध है कि आयुर्वेद पर कितनी पाण्डुलिपियां हैं और बौद्ध धर्म पर कितनी हैं। यहीं से हम सहयोग की शुरुआत कर सकते हैं।

प्रो. धर्मचंद चौबे ने जानकारी दी कि इस समझौते के पहले चरण के क्रियान्वयन के क्रम में सबसे पहले आईजीएनसीए मैप मॉडल ‘बुद्ध शासनं चिरं तिष्ठतु’ (बुद्ध की शिक्षाएं चिरस्थायी हैं) को जीबीयू में स्थापित कर रहा है। इस मैप मॉडल में भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़े प्रमुख स्थानों और बौद्ध धर्म के भारत तथा एशिया के विभिन्न क्षेत्रों में प्रसार को मानचित्र के माध्यम से दिखाया गया है। भगवान बुद्ध, बौद्ध धर्म और उसके विस्तार के बारे में हम जो भी जानते हैं, या सुने हुए हैं, उसे इस मानचित्र के माध्यम से सरल व संक्षिप्त रूप से समझाने का प्रयास किया गया है।