टीसीएस के बाद लेंसकार्ट: सनातन के खिलाफ सुनियोजित साजिश।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
देश में इस समय अंदरूनी संकट बहुत गहरा है। इसीलिए हमारे पूर्व सीडीएस जनरल बिपिन रावत कहते थे कि हमको भविष्य में जो लड़ाई लड़नी पड़ेगी वह टू एंड हाफ फ्रंट की होगी यानी पाकिस्तान, चीन और घरेलू मोर्चे पर। लेकिन मेरा मानना है कि यह लड़ाई और ज्यादा मुश्किल है।
हमारा कॉर्पोरेट सेक्टर लगता है कि वोकिज्म का शिकार होता जा रहा है। पहले टीसीएस के नासिक स्थित बीपीओ से खबर आई और अब ताजा खबर चश्मों का लेंस बनाने वाली कंपनी लेंसकार्ट से आई है। वहां एक मैनुअल लागू है कि उनकी जिन दुकानों में चश्मा और लेंस बिकता है वहां की कर्मचारी बिंदी और सिंदूर नहीं लगा सकतीं। अगर सिंदूर लगाना भी है तो ऐसा लगाइए जो बहुत ही कम हो। पुरुषों के लिए कहा गया है कि आप कलावा नहीं पहन सकते और न ही तिलक लगा सकते हैं। लेकिन मुस्लिम महिलाएं हिजाब पहनकर आ सकती हैं। इस पर कोई रोक नहीं है। सवाल है कि धर्म के आधार पर यह भेदभाव क्यों? और वह भी एक कार्पोरेट ऑफिस में। नासिक स्थित टीसीएस के बीपीओ का मामला बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय रैकेट के रूप में सामने आ रहा है। कहा जा रहा है कि यह मलेशिया प्लान था। टीसीएस के इस आफिस में हिंदू लड़कियों और पुरुषों के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव हुआ, हिंदू देवी देवताओं के बारे में अपशब्द कहे गए, जबरन गौ मांस खिलाया गया, धर्म परिवर्तन का दबाव डाला गया, महिलाओं का शारीरिक शोषण किया गया और जब उन्होंने एचआर से शिकायत की तो कहा गया कि कॉर्पोरेट कल्चर में यह सब होता है। शिकायत करने वालों से एचआर ने पलट कर सवाल पूछा कि क्या आप यह मुद्दा उठाकर फेमस होना चाहते हैं? तो इसलिए चुप रहिए। यह कौन सा कॉर्पोरेट कल्चर है? जांच में यह भी पता चल रहा है मलेशिया में इमरान नाम का शख्स इस रैकेट को निर्देशित कर रहा था। इसकी फॉरेन फंडिंग भी हो रही थी।
सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि टीसीएस की ओर से इस प्रकरण पर कोई बड़ी चिंता नहीं जाहिर की गई। उन्होंने यह नहीं कहा कि वह अपने सारे दफ्तरों में जांच कराएंगे। अब ये लेंसकार्ट का मामला उजागर होने पर वहां के मैनेजमेंट का कहना है कि कोई नया मैनुअल जारी नहीं हुआ। पुराना ही लागू है। यानी आप पहले से ही यह कर रहे थे। कितनी हैरानी की बात है कि ये भारत में रह रहे हैं, जहां 79% आबादी हिंदुओं की है और वहां भेदभाव किसके साथ हो रहा है? हिंदुओं के साथ। कार्पोरेट में कहते हैं कि कैसे व्यवहार करना चाहिए, किस तरह से बोलचाल होनी चाहिए,कैसी वेशभूषा होनी चाहिए, यह सब ग्रूमिंग का हिस्सा होता है। कॉर्पोरेट ग्रूमिंग में यह कहां से आता है कि आप किसी धर्म के देवी देवताओं का अपमान करें, धर्म परिवर्तन कराने की कोशिश करें, महिलाओं का शारीरिक शोषण और उसके बाद उनको ब्लैकमेल करें। ये जिस तरह की खबरें सामने आ रही हैं,उससे लगता है कि हमारा जो कॉर्पोरेट है उसका एक बड़ा हिस्सा वोक कल्चर का शिकार हो गया है। यह शब्द पिछले कुछ दशकों से चलन में आया है। दरअसल यह रेशियल डिस्क्रिमिनेशन रोकने के लिए शुरू हुआ। इसके विरोधी कहते हैं कि यह दरअसल ऑब्सेशन विद आइडेंटिटी पॉलिटिक्स है। अब यह एक नकारात्मक शब्द बन गया क्योंकि इसमें वामपंथी आईडियोलॉजी घुस गई। वामपंथी आईडियोलॉजी के साथ इसमें जिहादी इस्लामी मानसिकता का मेल हो गया। वरना आप बताइए कि किसी कॉर्पोरेट ऑफिस में धार्मिक आधार पर भेदभाव करने का क्या कारण हो सकता है? लेकिन यह सब बड़े धड़ल्ले से हो रहा है। और सबसे अफसोस की बात तो यह है कि इन कंपनियों में ज्यादातर के मालिक हिंदू हैं। इनमें बड़े पदों पर हिंदू बैठे हुए हैं। इस कल्चर ने पूरे यूरोप को बर्बाद कर दिया है और अमेरिका को भी बर्बाद कर रहे थे। वह तो डोनाल्ड ट्रंप की इस बात के लिए प्रशंसा होनी चाहिए कि वे सीना ठोक कर इस कल्चर के खिलाफ खड़े हो गए हैं। उन्होंने कहा कि मैं अमेरिका के शिक्षण संस्थानों से ऐसे तत्वों को बाहर करूंगा। इनकी फंडिंग रोकूंगा।

हमारे देश में इस कल्चर को बढ़ावा देने वालों में वामपंथी और इस्लामी ताकतें तो हैं ही, अपने को सेकुलर बताने वाले सबसे बड़े मददगार हैं। दरअसल वे सेकुलरिज्म का मतलब भी नहीं समझते हैं। वे हैं तो रेडिकल, लेकिन अपने बचाव के लिए सेकुलरिज्म शब्द का इस्तेमाल करते हैं। भारत में इस शब्द का कोई मतलब नहीं है। जो हिंदू है वह सेकुलर होगा ही। हिंदुओं ने कभी किसी का धर्मांतरण कराने की कोशिश नहीं की है। बल्कि इसका उल्टा हो रहा है कि हिंदू धर्मांतरण का शिकार हो रहे हैं। नेहरू की नीतियों के कारण नॉर्थ ईस्ट से शुरू हुआ हिंदुओं के धर्मांतरण का सिलसिला देश के ट्राइबल इलाकों में पहुंचा। बाद में शेड्यूल कास्ट के लोगों, गरीब और अशिक्षितों को शिकार बनाया गया। इस्लामी और ईसाई मजहब की कई एजेंसियां देश में धर्म परिवर्तन कराने में जुटी हैं। उनको विदेशों से पैसा मिल रहा है। यहां तक तो फिर भी बात समझ में आती है। इससे आप लड़ सकते हैं, लेकिन इनका समर्थन अगर घर के ही लोग करें तो फिर आप क्या करेंगे? याद रखिए आस्तीन के सांपों से लड़ना सबसे मुश्किल काम है।
तो पहला कदम यह होना चाहिए हम जागरूक रहें। हमारे साथ क्या हो रहा है, इसे तो समझें। किस तरह से हमारी सनातन संस्कृति, हमारे धर्म और हमारी सभ्यता को खत्म करने की कोशिश हो रही है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर से चल रहा है और देश में बैठी कई ताकतें उनका सहयोग कर रही हैं। मैं बार-बार कहता हूं कि इस लड़ाई के खिलाफ हमारा पहला कदम विरोध में बोलना होना चाहिए। गलत को गलत कहना ही पड़ेगा। नासिक के बीपीओ में जितने कर्मचारी थे,उनमें बहुसंख्यक हिंदू थे फिर भी धर्मांतरण कराने वालों के खिलाफ कितने खड़े हुए। लेंसकार्ट के हिंदू कर्मचारी इसके विरोध में खड़े हो जाते तो क्या यह हो सकता था? हम चुप रहने की कीमत चुका रहे हैं और याद रखिए यह कीमत सिर्फ हम आप नहीं चुकाएंगे। यह हमारी आने वाली पीढ़ियां भी चुकाएंगी। यह आपको तय करना है कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बर्बाद करना है या बचाना है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)