मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की मांग उठाकर खुद ही हो गए एक्सपोज।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कभी-कभी आदमी बहुत ज्यादा होशियार बनने के चक्कर में फंस जाता है और फिर उसके निकलने का कोई रास्ता नहीं होता। देश की राजनीति में उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं।
बात गुरुवार की है। लोकसभा में महिला आरक्षण संविधान संशोधन विधेयक  पर चर्चा चल रही थी। अखिलेश यादव बोलने के लिए खड़े हुए। उनके पास एक ही मुद्दा है पिछड़ा और मुसलमान। उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण में अगर पिछड़े वर्ग और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं मिला तो फिर इसका क्या मतलब? अखिलेश यादव को मालूम होना चाहिए कि भारत के संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। अगर अखिलेश ऐसा चाहते हैं तो उनकी पहली मांग होनी चाहिए थी कि आप संविधान में संशोधन कीजिए। इसका मतलब वह ऐसी मांग कर रहे हैं, जिसके बारे में उनको पहले से पता है कि यह हो नहीं सकता है। फिर भी वह मांग करते हैं क्योंकि उनको लगता है कि इससे उनका जो कोर वोटर है, उस पर असर पड़ेगा। यानी वह अपने कोर वोटर को मूर्ख समझते हैं। बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चर्चा में हस्तक्षेप किया और उन्होंने एक टिप्पणी अखिलेश यादव पर की। अखिलेश यादव को अगर राजनीति की बारीक समझ होती तो समझते कि जो टिप्पणी प्रधानमंत्री ने की,वह उनके लिए कितना नुकसानदेह साबित हो सकती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि अखिलेश यादव मेरे मित्र हैं और समय-समय पर हमारी मदद करते रहते हैं। तो अब अखिलेश यादव को बताना चाहिए कि वह भाजपा की क्या मदद करते हैं? एक तरफ वह भाजपा को देश विरोधी,समाज विरोधी,सांप्रदायिक और न जाने क्या-क्या कहते हैं, दूसरी तरफ अंदर खाने भाजपा की मदद करते रहते हैं। प्रधानमंत्री की टिप्पणी के बाद अखिलेश ने हाथ जोड़कर कृतज्ञता जाहिर की यानी उन्होंने इसका प्रतिरोध करने की भी कोशिश नहीं की। मुझे लगता है कि अखिलेश यादव को पीएम की यह टिप्पणी 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भारी पड़ेगी।
आप कल्पना कीजिए कि अगर अखिलेश यादव की जगह मुलायम सिंह यादव होते तो क्या इसी तरह का रिएक्शन आता? यह फर्क है अर्जित की हुई राजनीतिक पूंजी और विरासत में मिली हुई राजनीतिक पूंजी में। मुलायम ने अपनी राजनीतिक पूंजी अर्जित की थी, अखिलेश यादव को विरासत में मिली है। उनको मालूम ही नहीं है कि यह पूंजी कैसे कमाई जाती है और इसीलिए मेरा मानना है कि उत्तर प्रदेश में उनके सत्ता में लौटने की कोई संभावना नहीं है। लोकसभा में चर्चा के दौरान शायद अखिलेश को लगा होगा कि हमारी बात पूरी तरह से हमारे वोटर तक पहुंची नहीं तो उन्होंने अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव से भी कहलवाया कि जब तक मुस्लिम और पिछड़े वर्ग की महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलता महिला आरक्षण का कोई मतलब नहीं है। इसका गृह मंत्री अमित शाह ने जवाब दिया और कहा कि यह ख्याल दिमाग से निकाल दीजिए कि धार्मिक आधार पर कोई आरक्षण मिलेगा। फिर अखिलेश यादव का नाम लेकर कहा, अगर वह ऐसा चाहते हैं तो अपनी पार्टी के सारे टिकट मुस्लिम महिलाओं को दे दें। तो शाह ने अखिलेश यादव को एक्सपोज कर दिया कि जो मांग आप सरकार से कर रहे हैं, जहां आपका वश है वहां इस मांग के लिए कुछ नहीं कर रहे। समाजवादी पार्टी कितनी मुस्लिम महिलाओं को टिकट देती है? या अखिलेश यादव के परिवार को चार बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिला,क्या कभी किसी मुस्लिम को डिप्टी चीफ मिनिस्टर बनाया? जिस पीडीए की बात कर रहे हैं उस पीडीए से क्या किसी व्यक्ति को डिप्टी सीएम बनाया? उन्होंने डर और राजनीतिक असुरक्षा के भाव से ऐसा नहीं किया। उनको लगता था कि किसी को डिप्टी सीएम बना दिया तो हो सकता है वह अपना कद बढ़ा ले और चैलेंजर बन जाए। यह समस्या आपको हर उस पार्टी में मिलेगी, जो वंशवादी है। नवीन पटनायक, लालू प्रसाद यादव, यहां तक कि नीतीश कुमार किसी ने सेकेंड लीडरशिप नहीं विकसित होने दी। लालू और कुछ हद तक नीतीश ने आगे बढ़ाया भी तो अपने बेटों को। यह समस्या अखिलेश यादव के भी सामने है। अखिलेश यादव 5 साल मुख्यमंत्री रहे लेकिन किसी और को आगे बढ़ने नहीं दिया। यही हाल कांग्रेस पार्टी में राहुल गांधी का है। कांग्रेस बर्बाद इसीलिए हो रही है कि कोई ऐसा व्यक्ति न उभरने पाए, जो राहुल गांधी के लिए चुनौती बन जाए।
हालांकि जो कैडर बेस पार्टियां होती हैं, उनमें ऐसा नहीं होता है। ज्योति बसु गए तो बुद्धदेव भट्टाचार्य आ गए। अटल जी गए तो नरेंद्र मोदी आ गए। उसके लिए कोई झगड़ा नहीं हुआ। पार्टी में कोई टूट-फूट नहीं हुई। लेकिन आप सारी परिवारवादी पार्टियों या एक नेता वाली पार्टी को देख लें, इस तरह की स्थिति की आप कल्पना नहीं कर सकते। तो इसलिए अखिलेश यादव अपनी राजनीति करें, इससे किसी को कोई ऐतराज नहीं हो सकता। अपने कोर वोटर को हमेशा साथ रखने की कोशिश करें, इसमें भी कोई ऐतराज नहीं हो सकता। लेकिन कम से कम दूसरों को बेवकूफ समझने की कोशिश न करें। वह अपने कोर वोटर को अगर इतना नासमझ समझते हैं कि वह उनकी नीति और नीयत में फर्क नहीं कर पाएगा तो इसका नुकसान उनको धीरे-धीरे उठाना पड़ेगा। क्या वह इसको रोक पाएंगे? इसका जवाब 2027 के विधानसभा चुनाव और उसका नतीजा आने के बाद मिलेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)