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– भारतीय कला धरोहर में बांसुरी की परम्परा पर विशेष व्याख्यान का आयोजन

इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र (आईजीएनसीए) के कलादर्शन विभाग द्वारा “भारतीय कला, सौंदर्य शास्त्र एवं सांस्कृतिक धरोहर” व्याख्यानमाला के अंतर्गत “भारतीय कला धरोहर : बाँसुरी के विशेष संदर्भ में” विषय पर एक विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।  व्याख्यान के मुख्य वक्ता थे प्रख्यात बांसुरी वादक एवं संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित श्री चेतन जोशी। कार्यक्रम की अध्यक्षता आईजीएनसीए के डीन एवं कलानिधि विभाग के अध्यक्ष प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने की। प्रसिद्ध ध्रुपद गायक उस्ताद फ़ैयाज़ वसीफ़ुद्दीन डागर और प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पं. विद्याधर व्यास की भी गरिमामय उपस्थिति रही।

भारतीय शास्त्रीय संगीत की परम्परा में बांसुरी के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और कलात्मक आयामों पर केंद्रित इस व्याख्यान ने भारतीय संगीत विरासत की गहराइयों को समझने का अवसर प्रदान किया। पं. चेतन जोशी ने भारतीय कला परम्परा में बांसुरी के महत्व, उसकी सांगीतिक यात्रा तथा भारतीय सौंदर्यबोध में उसकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा, पश्चिम में कला की अवधारणा ‘आर्ट फॉर द सेक ऑफ आर्ट’ (कला केवल कला के लिए) है, लेकिन भारत में ऐसा नहीं है। भारत में कला कभी निरुद्देश्य नहीं होती। यहां कला का उद्देश्य है- सत्यम्, शिवम, सुंदरम्। उन्होंने कहा कि बांसुरी मानवनिर्मित प्राचीनतम वाद्यों में से एक है। इसका तीनों प्रकार की कलाओं- परफॉर्मिंग आर्ट, विजुअल आर्ट और साहित्यिक कला, तीनों में प्रमुख स्थान है। इतिहास और अध्यात्म, दोनों में इसकी प्रमुखता है। अत्यंत प्राचीन काल से लेकर आधुनिक युग तक इसकी निरंतरता बनी हुई है। यह कभी लुप्त नहीं हुई। हिन्दुस्तानी, कर्नाटक संगीत से लेकर लोक संगीत तक, इसका प्रयोग सभी परम्पराओं में होता है। बांसुरी केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, हमारी श्वास है। इसे बनाए रखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम के प्रारम्भ में कलादर्शन विभाग की संयोजक एवं विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) ऋचा काम्बोज स्वागत उद्बोधन एवं कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत की। आईजीएनसीए द्वारा आयोजित यह व्याख्यान भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत के विविध आयामों पर संवाद की निरंतर प्रक्रिया का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्परा और कलात्मक चेतना को व्यापक समाज तक पहुंचाना है। इस व्याख्यान में कला, संगीत और भारतीय सांस्कृतिक परम्पराओं में रुचि रखने वाले विद्वान, विद्यार्थी, कलाकार एवं संगीतप्रेमियों ने उत्साहजनक भागीदारी की।