झालमुड़ी के बाद दुनिया में छा गई भारत की मेलोडी

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
कम्युनिकेशन अपने आप में एक बहुत बड़ी स्किल है और जो लोग सार्वजनिक जीवन में हैं, उनके लिए तो एक जरूरी शर्त है कि इस स्किल में वे मास्टर हों। इस स्किल के बिना आप अपनी बात लोगों तक पहुंचा नहीं पाते हैं। यह स्किल जिस नेता में है, उसके सफल होने की उम्मीद सबसे ज्यादा होती है। इस स्किल में इस समय देश में कोई नेता सबसे आगे और सबसे प्रभावशाली है तो वह हैं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।
आप उनमें बुराई खोजना चाहें या उनकी आलोचना करना चाहें तो उसके लिए आपको बहुत से मुद्दे मिल जाएंगे। लेकिन सवाल है कि बुराई ज्यादा है या अच्छाई? किसी भी व्यक्ति का आकलन इसी आधार पर होता है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी जो कहते हैं, वह बार-बार बहुत सहज ढंग से करके दिखाते भी हैं। उनका कम्युनिकेशन स्किल हाल ही में हमने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में देखा। एक झालमुड़ी की दुकान पर चले गए और वह दुनिया भर में खबर बन गई। आपने देखा होगा कि कई बार राहुल गांधी भी कभी मोची की दुकान पर चले जाते हैं, कभी कुली बन जाते हैं, कभी समोसा खाने चले जाते हैं,लेकिन वह कुछ घंटे की खबर बनती है। उससे ज्यादा नहीं क्योंकि वह सब पूर्व नियोजित ढंग से होता है। हो सकता है कि प्रधानमंत्री का झालमुड़ी खाने जाना भी पहले से नियोजित हो। लेकिन होना ऐसा चाहिए कि नियोजित न लगे। तो प्रधानमंत्री के झालमुड़ी खरीदने का असर ऐसा हुआ कि ममता बनर्जी और उनकी पूरी पार्टी तिलमिला गई। उस एक एक्ट से प्रधानमंत्री ने बाहरी बनाम बंगाली का नैरेटिव ध्वस्त कर दिया और पश्चिम बंगाल के आम आदमी से अपने को जोड़ लिया। और नतीजा यह हुआ कि झालमड़ी की चर्चा अब देश में नहीं पूरी दुनिया में हो रही है। हाल ही में मोदी पांच देशों के दौरे पर गए थे तो उन्होंने पूछा कि यहां भी झालमुड़ी आ गई है क्या? अब आप प्रधानमंत्री का एक नारा याद कीजिए कि लोकल को ग्लोबल बनाइए। तो झालमुड़ी को उन्होंने ग्लोबल बना दिया।
प्रधानमंत्री ने बुधवार को ही एक काम और कर दिया। इटली में वह वहां की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी से मिले और उनको भेंट क्या किया? आमतौर पर एक राष्ट्राध्यक्ष जब दूसरे राष्ट्राध्यक्ष से मिलता है तो उसके लिए कीमती उपहार ले जाता है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी मेलोनी के लिए प्लास्टिक के थैले में पैक की हुई मेलोडी ले गए। यह भारत की एक चॉकलेटी टॉफी है। तो मेलोडी कई लोगों को पच नहीं रही है, खासतौर से मैं भारत की बात कर रहा हूं। उस पर राहुल गांधी का जो रिएक्शन आया है उससे लगता है कि वह अंदर से तिलमिला गए हैं। उनके मुंह से प्रधानमंत्री के लिए गालियों का फव्वारा छूट पड़ा है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने क्या किया। उन्होंने जॉर्जिया मेलोनी को भेंट दी और उसके बाद कुछ बोले नहीं। जॉर्जिया मेलोनी ने कहा कि भारत के प्रधानमंत्री मेरे लिए गिफ्ट के रूप में मेलोडी लाए हैं। अब ये ऐसी बात थी वह न बोलती तो भी चलता। लेकिन यह कुछ सेकंड की वीडियो क्लिप है जो पूरी दुनिया में छा गई है। तो प्रधानमंत्री मोदी ने एक लोकल प्रोडक्ट को ग्लोबल स्टेज दे दिया। दुनियाभर के लोग मेलोडी टॉफी के बारे में जान गए। यह होता है कम्युनिकेशन स्किल का प्रभाव कि आपको अपनी बात कैसे पहुंचानी है। मेलोडी भारत का एक लोकल प्रोडक्ट है और जो कंपनी मेलोडी बनाती है, वह स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड तक नहीं है। तो राहुल गांधी को यह कहने का भी मौका नहीं मिला कि इसका स्टॉक प्राइस बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ने यह किया।
प्रधानमंत्री मोदी के यूरोप दौरे पर एक और बात की बहुत चर्चा हुई। नॉर्वे में एक लड़की सवाल कम पूछ रही थी और एजेंडा ज्यादा सेट कर रही थी। वह नॉर्वे के बारे में बता रही थी कि यहां फ्रीएस्ट प्रेस है। जबकि वास्तव में यूरोप में कोई देश ऐसा नहीं है, जहां प्रेस पूरी तरह से फ्री हो। भारत में प्रेस को जो फ्रीडम है,वह बहुत कम देशों में है। यह जो रेटिंग एजेंसियां हैं, इससे बड़ा फ्रॉड कोई नहीं है। सवाल यह है कि नॉर्वे है क्या? हमारे किसी भी टियर टू सिटी के बराबर का देश है। उसकी एक नागरिक एजेंडा सेट करते हुए भारत के प्रधानमंत्री से पूछ रही थी कि आप दुनिया के फ्रीएस्ट प्रेस के सवाल का जवाब क्यों नहीं दे रहे? जबकि वह जवाब देने का मौका ही नहीं था। उस समय दोनों देशों का जॉइंट डिक्लेरेशन जारी हो रहा था। यह परंपरा है कि जॉइंट डिक्लेरेशन जब जारी होता है तो वह केवल पढ़ा जाता है। उसके बाद कोई सवाल जवाब नहीं होता है। दरअसल दुनिया में एक बड़ा वर्ग है जो मोदी, भारत और भारतीय संस्कृति को हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश करता है। आज मोदी हैं कल नहीं रहेंगे, लेकिन भारत और भारतीय संस्कृति हमेशा रहेगी। तो जो भारत और भारतीय संस्कृति को नीचा दिखाने की कोशिश करे उसके समर्थन में हम कैसे खड़े हो सकते हैं? अपने देश की आलोचना हम क्यों बर्दाश्त करें? और वह भी जो झूठी और तथ्यात्मक रूप से गलत हो। नॉर्वे की सिविलाइजेशन क्या है? जबकि भारत एक ऐसी सिविलाइजेशन है, जिसको कोई खत्म नहीं कर पाया। इस तरह की कोशिशें ऐसा नहीं है कि पहली या आखिरी बार हुई हैं। इस तरह की कोशिशें आगे भी होती रहेंगी, लेकिन प्रधानमंत्री का जो रवैया रहा मैं कहता हूं कि इसकी निश्चित रूप से प्रशंसा की जानी चाहिए। बहुत से लोग उस ट्रैप में फंस जाते और जवाब देने की कोशिश करते। हालांकि उसका जवाब हमारे विदेश मंत्रालय के सचिव ने दिया और वह जवाब केवल नॉर्वे की उस तथाकथित जर्नलिस्ट को ही नहीं, पूरी दुनिया को दिया। उन्होंने बताया कि भारत की सिविलाइजेशन क्या है पहले ये तो समझो। उन्होंने पलट कर ये नहीं पूछा कि नॉर्वे क्या है? वह लड़की कह रही थी कि नॉर्वे आप पर भरोसा क्यों करें। अरे भाई कौन कह रहा है कि नॉर्वे भरोसा करे और हम नॉर्वे के भरोसे पर जीवित हैं क्या? लेकिन दुनिया में जो एजेंडा और नैरेटिव सेट करने वाले हैं,वे इसी तरह से काम करते हैं। इसलिए कह रहा हूं कि बात केवल उस लड़की ने जो बोला सिर्फ उसकी नहीं है। उसके बाद दुनिया के कई देशों में जैसे उसको नैरेटिव में बदलने की कोशिश हुई। भारत में जिस तरह से उसका समर्थन हुआ और उसके आधार पर जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना हुई,उसे समझने की जरूरत है। वह सवाल प्रधानमंत्री के लिए नहीं था। वह सवाल हमारे देश और देश की संस्कृति के लिए था। उसने यह नहीं पूछा कि मोदी पर भरोसा क्यों करें? उसने पूछा कि भारत पर नॉर्वे क्यों भरोसा करें? सवाल को समझिए। दरअसल वह सवाल था ही नहीं, वह भारत की संस्कृति और सभ्यता पर हमला था। दुनिया में भारत की जो विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा है,उस पर हमला था। और उस हमले का जैसा जवाब हमारे विदेश मंत्रालय के सचिव ने दिया, उनको सलाम करने को मन करता है। उन्होंने एक दो लाइन बोलकर नहीं,पूरी तरह से जवाब दिया।
तो जो ऐसा नैरेटिव सेट करने वाले और एजेंडा चलाने वाले हैं, उनकी समस्या यह है कि पिछले 12 साल से वे लगातार मात खा रहे हैं। वे भारत में चुनाव दर चुनाव हार रहे हैं। राहुल गांधी की बौखलाहट इस हद तक बढ़ गई है कि वह कुछ दिन में हो सकता है कि अपने कपड़े फाड़ते और बाल नोचते हुए नजर आएं। इस तरह के नैरेटिव पर हमको फर्क करना चाहिए। अगर वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी या उनकी सरकार की आलोचना है तो वह अलग विषय है। लेकिन अगर देश की आलोचना है और देश की संस्कृति और सभ्यता पर हमला है तो वह अलग मामला है। भारत का नागरिक, सनातन संस्कृति का फॉलोअर और भारतीय सभ्यता पर गर्व करने वाला होने के नाते हमारा फर्ज बनता है कि ऐसे नैरेटिव को ध्वस्त करने में अपना योगदान दें। इसके खिलाफ बोलने और खड़े होने की जरूरत है। जो ऐसे नैरेटिव का समर्थन करते हैं,आप मानकर चलिए वे देश के हितैषी नहीं हैं। ऐसे लोगों से सावधान रहने की जरूरत है। ये आस्तीन के सांप हैं,जो अंदर से डसने की कोशिश कर रहे हैं। सामाजिक रूप से ऐसे लोगों का बहिष्कार होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा,यह सिलसिला रुकेगा नहीं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)