सोशल मीडिया के भरोसे देख रहे सत्ता में आने का सपना ।
प्रदीप सिंह।उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव नजदीक आ गया है। 2027 के फरवरी-मार्च में चुनाव होगा और उसके लिए सभी दलों ने तैयारी शुरू कर दी है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव आजकल बहुत एक्टिव हैं। कोई नेता जब बहुत सक्रिय होता है तो वह जमीन पर दिखाई देता है। वह लोगों के बीच जाता है, गांवो-शहरों-कस्बों में सभाएं करता है,लेकिन अखिलेश यादव की सक्रियता सिर्फ लखनऊ के पार्टी मुख्यालय और सोशल मीडिया पर दिख रही है। सोशल मीडिया की बदौलत आज तक कम से कम भारत में तो कोई पार्टी चुनाव जीती नहीं है।
अखिलेश यादव को लगता है कि सोशल मीडिया उनको चुनाव जिता देगा। अब देखिए कई लोग होते हैं जो दूसरों की गलतियों से सबक सीखते हैं और कुछ लोग अपनी ही गलती से सबक सीखते हैं। आप अखिलेश यादव का 2022 से राजनीतिक कार्यकलाप देखिए। जनता के बीच में जाना उनको बेइज्जती लगता है। उनको लगता है कि जनता के बीच में छोटे नेता जाते हैं, बड़े नेता नहीं। सवाल यह है कि 2022 का विधानसभा चुनाव हारने के बाद उन्होंने किया क्या? अपनी पार्टी का जनाधार बढ़ाने के लिए क्या किया? यह तो उनका अपने अनुभव से सीखने का मौका था। वह बिहार, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, हरियाणा के विधानसभा चुनावों में प्रचार करने गए। क्या उनके प्रचार से किसी को एक वोट भी मिला, लेकिन उससे उन्होंने सबक नहीं सीखा। उन्होंने यह समझने की भी कोशिश नहीं की कि इन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी कैसे जीत गई। कम से कम हरियाणा में तो लग रहा था कि कांग्रेस आ ही रही है फिर भी नहीं आई। अगर इसकी तुलना 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से करते जब उनके समर्थकों को लग रहा था कि समाजवादी पार्टी की सरकार तो आ ही रही है, लेकिन वह बहुत पीछे रह गई। उस पर वह चिंतन मंथन करते कि आखिर हम सत्ता में आने वाले थे,क्यों चूक गए? लेकिन उन्होंने कोई विचार नहीं किया।
अखिलेश यादव को लगता है कि वह पीडीए-पीडीए बोलते रहेंगे और जनता उनको चुनाव जिताकर सत्ता में पहुंचा देगी। ऐसा किसी पार्टी के साथ होता नहीं है। आप राजनीति कर रहे हैं जाति की और रणनीति बना रहे हैं वर्ग की। पिछड़ा कोई जाति नहीं है। पिछड़ा वर्ग है और अखिलेश यादव एवं समाजवादी पार्टी के साथ पिछड़ा वर्ग नहीं है। उनके साथ यादव हैं। मुलायम सिंह यादव कभी पूरे पिछड़े वर्ग के नेता नहीं बन पाए। अखिलेश की तो शुरुआत ही यादव नेता के रूप में हुई है। दूसरा अल्पसंख्यक स्थाई रूप से किसी के साथ नहीं रहता। अगर अखिलेश को यह गलतफहमी है कि अल्पसंख्यक यानी मुसलमान समाजवादी पार्टी को पसंद करते हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। समाजवादी पार्टी से बहुत पहले मुसलमान कांग्रेस के साथ होता था। फिर उसके बाद जनता दल के साथ गया और फिर समाजवादी पार्टी के साथ आया। अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि 2009 में मुसलमानों ने सपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन पकड़ लिया था। कांग्रेस की यूपी में 21 लोकसभा सीटें आ गई थी। मुसलमान सिर्फ यह देखता है कि बीजेपी को कौन हरा सकता है। हर कॉन्स्टिट्यूएंसी के हिसाब से मुस्लिम वोटर की रणनीति तय होती है। वह यादवों की तरह वोटर नहीं है कि कोई भी जीत-हार रहा हो,वोट तो हम समाजवादी पार्टी को ही देंगे। मुस्लिम वोट कब, कहां, किस हालत में टूट जाएगा कुछ भरोसा नहीं है। इसके अलावा दलित भी सपा के साथ कभी नहीं रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण का मुद्दा चल गया इसलिए दलितों का एक वर्ग उनके साथ आ गया। अखिलेश कभी जमीन पर जाते, गांवों में जाते तो पता चलता कि दलितों को सबसे ज्यादा अगर कोई प्रताड़ित करता है तो वह यादव समाज है। इसका कारण है कि यादव शक्तिशाली भी हैं और आर्थिक रूप से संपन्न भी। जबकि गांवों में सबसे कमजोर समाज दलितों का है। अखिलेश यादव को यह समझना चाहिए कि दलितों का एक वर्ग किसी नाराजगी में और बसपा की तटस्थता के कारण एक चुनाव में उनके साथ आ गया। वह उनका वोटर है नहीं और 2027 में उनके साथ नहीं जाएगा। अखिलेश अगर अपने अनुभव से सीखने की कोशिश करते तो देखते कि 2019 में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ फिर भी दलितों ने सपा को वोट नहीं दिया। तो अगर कोई व्यक्ति जो सामने दिख रहा हो, उसको भी देखने को तैयार न हो तो ऐसे आदमी को कौन समझा सकता है।
अखिलेश यादव को लगता है कि वह पीडीए-पीडीए बोलते रहेंगे और जनता उनको चुनाव जिताकर सत्ता में पहुंचा देगी। ऐसा किसी पार्टी के साथ होता नहीं है। आप राजनीति कर रहे हैं जाति की और रणनीति बना रहे हैं वर्ग की। पिछड़ा कोई जाति नहीं है। पिछड़ा वर्ग है और अखिलेश यादव एवं समाजवादी पार्टी के साथ पिछड़ा वर्ग नहीं है। उनके साथ यादव हैं। मुलायम सिंह यादव कभी पूरे पिछड़े वर्ग के नेता नहीं बन पाए। अखिलेश की तो शुरुआत ही यादव नेता के रूप में हुई है। दूसरा अल्पसंख्यक स्थाई रूप से किसी के साथ नहीं रहता। अगर अखिलेश को यह गलतफहमी है कि अल्पसंख्यक यानी मुसलमान समाजवादी पार्टी को पसंद करते हैं तो यह उनकी सबसे बड़ी भूल होगी। समाजवादी पार्टी से बहुत पहले मुसलमान कांग्रेस के साथ होता था। फिर उसके बाद जनता दल के साथ गया और फिर समाजवादी पार्टी के साथ आया। अखिलेश यादव को याद रखना चाहिए कि 2009 में मुसलमानों ने सपा का साथ छोड़कर कांग्रेस का दामन पकड़ लिया था। कांग्रेस की यूपी में 21 लोकसभा सीटें आ गई थी। मुसलमान सिर्फ यह देखता है कि बीजेपी को कौन हरा सकता है। हर कॉन्स्टिट्यूएंसी के हिसाब से मुस्लिम वोटर की रणनीति तय होती है। वह यादवों की तरह वोटर नहीं है कि कोई भी जीत-हार रहा हो,वोट तो हम समाजवादी पार्टी को ही देंगे। मुस्लिम वोट कब, कहां, किस हालत में टूट जाएगा कुछ भरोसा नहीं है। इसके अलावा दलित भी सपा के साथ कभी नहीं रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव में संविधान और आरक्षण का मुद्दा चल गया इसलिए दलितों का एक वर्ग उनके साथ आ गया। अखिलेश कभी जमीन पर जाते, गांवों में जाते तो पता चलता कि दलितों को सबसे ज्यादा अगर कोई प्रताड़ित करता है तो वह यादव समाज है। इसका कारण है कि यादव शक्तिशाली भी हैं और आर्थिक रूप से संपन्न भी। जबकि गांवों में सबसे कमजोर समाज दलितों का है। अखिलेश यादव को यह समझना चाहिए कि दलितों का एक वर्ग किसी नाराजगी में और बसपा की तटस्थता के कारण एक चुनाव में उनके साथ आ गया। वह उनका वोटर है नहीं और 2027 में उनके साथ नहीं जाएगा। अखिलेश अगर अपने अनुभव से सीखने की कोशिश करते तो देखते कि 2019 में बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ फिर भी दलितों ने सपा को वोट नहीं दिया। तो अगर कोई व्यक्ति जो सामने दिख रहा हो, उसको भी देखने को तैयार न हो तो ऐसे आदमी को कौन समझा सकता है।
https://apkaakhbar.in/agree-with-love-or-else-yogi-has-set-the-narrative/
आजकल अखिलेश यादव ने एक नया अभियान चलाया है। वह अपने कार्यकर्ताओं को बुलाकर कहते हैं कि हर बूथ पर पांच वोट बढ़ा दो भाजपा साफ हो जाएगी। इसका मतलब वह भाजपा को अभी तक समझे ही नहीं। बूथ प्रबंधन और बूथ पर काम करने का जो अनुभव और जो रणनीति भाजपा की है, देश में किसी पार्टी की नहीं है। बूथ पर भाजपा का जो आदमी काम करता है, उसकी एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता होती है। सपा का जो कार्यकर्ता है, उसकी सत्ता के प्रति प्रतिबद्धता होती है कि अगर भैया सत्ता में आएंगे तो हमको ठेका, नौकरी दिलाएंगे। हमारी मनमानी चलेगी। अगर उसको लगा कि यह नहीं होने वाला है तो ऐसा तो नहीं है कि वह आपके खिलाफ हो जाएगा, लेकिन वह आपके साथ कितना होगा यह अखिलेश यादव को 2017, 2019 और 2022 का नतीजा देखकर समझ जाना चाहिए था। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा ने जिस तरह का कोर्स करेक्शन किया है, संगठन में बदलाव किया है, रणनीति में बदलाव किया है,अखिलेश यादव बताएं कि उन्होंने अपनी पार्टी में क्या किया है। उनको लग रहा है कि 2024 में जो 37 लोकसभा सदस्य आ गए,वह उनका बैंक बैलेंस बन गया है। अब वह खर्च करते रहेंगे, उसमें से कमी नहीं होने वाली। उनको अंदाजा भी नहीं है कि उनकी गाड़ी स्टेशन छोड़ चुकी है। 2027 उनके लिए नहीं है। हां, अगर वह 2032 की तैयारी शुरू करें तो शायद उनके लिए कोई संभावना बन सकती है। लेकिन सवाल यह है कि 2027 हारने के बाद 5 साल पार्टी चलाने की शक्ति क्या अखिलेश यादव में है? इस सवाल का कोई जवाब मुझे नहीं लगता कि अखिलेश यादव के पास है। ऐसे में अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते रहें, जमीन पर उसका कोई असर नहीं होने वाला। योगी आदित्यनाथ सरकार की बीते नौ साल की जो उपलब्धियां हैं, उसका कोई मुकाबला अखिलेश यादव कर ही नहीं सकते। आप कानून व्यवस्था की बात करते हैं आपके राज में तो उत्तर प्रदेश की पुलिस आपके मंत्री की भैंस खोजती थी। आपके पिता के समय में एक पुलिस अधिकारी ने कोशिश की थी कि अयोध्या में हनुमानगढ़ी के सामने नमाज पढ़ी जाए। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने कही है। योगी जी ने नौ सालों में कानून व्यवस्था के मोर्चे पर जो क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, ऑर्गेनाइज्ड माफिया की जिस तरह से कमर तोड़ी है और अपराधियों के मन में जिस तरह से कानून का डर पैदा किया है, उसके बाद उत्तर प्रदेश में ऐसा कौन होगा जो अखिलेश यादव के कानून व्यवस्था के मुद्दे पर कुछ सुनने को तैयार होगा। इसके अलावा भी चाहे विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, किसानों, बिजली सप्लाई, एक्सप्रेसवे निर्माण, एयरपोर्ट निर्माण का मामला हो,हर मोर्चे पर किसी भी पिछली सरकार से योगी सरकार की तुलना नहीं की जा सकती है। तो इसीलिए अखिलेश यादव इन मुद्दों से बचते हैं। वह चुटकुले सुनाते हैं, तंज कसते हैं, व्यंग्य करते हैं, अपमानित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इससे वोट नहीं मिलता। अखिलेश यादव को अगर सचमुच लड़ाई में रहना है, मैं जीतने की तो बात ही नहीं कर रहा हूं, तो उनको अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा और सबसे पहले जमीन पर उतरना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)
आजकल अखिलेश यादव ने एक नया अभियान चलाया है। वह अपने कार्यकर्ताओं को बुलाकर कहते हैं कि हर बूथ पर पांच वोट बढ़ा दो भाजपा साफ हो जाएगी। इसका मतलब वह भाजपा को अभी तक समझे ही नहीं। बूथ प्रबंधन और बूथ पर काम करने का जो अनुभव और जो रणनीति भाजपा की है, देश में किसी पार्टी की नहीं है। बूथ पर भाजपा का जो आदमी काम करता है, उसकी एक विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता होती है। सपा का जो कार्यकर्ता है, उसकी सत्ता के प्रति प्रतिबद्धता होती है कि अगर भैया सत्ता में आएंगे तो हमको ठेका, नौकरी दिलाएंगे। हमारी मनमानी चलेगी। अगर उसको लगा कि यह नहीं होने वाला है तो ऐसा तो नहीं है कि वह आपके खिलाफ हो जाएगा, लेकिन वह आपके साथ कितना होगा यह अखिलेश यादव को 2017, 2019 और 2022 का नतीजा देखकर समझ जाना चाहिए था। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा ने जिस तरह का कोर्स करेक्शन किया है, संगठन में बदलाव किया है, रणनीति में बदलाव किया है,अखिलेश यादव बताएं कि उन्होंने अपनी पार्टी में क्या किया है। उनको लग रहा है कि 2024 में जो 37 लोकसभा सदस्य आ गए,वह उनका बैंक बैलेंस बन गया है। अब वह खर्च करते रहेंगे, उसमें से कमी नहीं होने वाली। उनको अंदाजा भी नहीं है कि उनकी गाड़ी स्टेशन छोड़ चुकी है। 2027 उनके लिए नहीं है। हां, अगर वह 2032 की तैयारी शुरू करें तो शायद उनके लिए कोई संभावना बन सकती है। लेकिन सवाल यह है कि 2027 हारने के बाद 5 साल पार्टी चलाने की शक्ति क्या अखिलेश यादव में है? इस सवाल का कोई जवाब मुझे नहीं लगता कि अखिलेश यादव के पास है। ऐसे में अखिलेश यादव सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट करते रहें, जमीन पर उसका कोई असर नहीं होने वाला। योगी आदित्यनाथ सरकार की बीते नौ साल की जो उपलब्धियां हैं, उसका कोई मुकाबला अखिलेश यादव कर ही नहीं सकते। आप कानून व्यवस्था की बात करते हैं आपके राज में तो उत्तर प्रदेश की पुलिस आपके मंत्री की भैंस खोजती थी। आपके पिता के समय में एक पुलिस अधिकारी ने कोशिश की थी कि अयोध्या में हनुमानगढ़ी के सामने नमाज पढ़ी जाए। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं। उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने कही है। योगी जी ने नौ सालों में कानून व्यवस्था के मोर्चे पर जो क्रांतिकारी परिवर्तन किया है, ऑर्गेनाइज्ड माफिया की जिस तरह से कमर तोड़ी है और अपराधियों के मन में जिस तरह से कानून का डर पैदा किया है, उसके बाद उत्तर प्रदेश में ऐसा कौन होगा जो अखिलेश यादव के कानून व्यवस्था के मुद्दे पर कुछ सुनने को तैयार होगा। इसके अलावा भी चाहे विकास, इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट, किसानों, बिजली सप्लाई, एक्सप्रेसवे निर्माण, एयरपोर्ट निर्माण का मामला हो,हर मोर्चे पर किसी भी पिछली सरकार से योगी सरकार की तुलना नहीं की जा सकती है। तो इसीलिए अखिलेश यादव इन मुद्दों से बचते हैं। वह चुटकुले सुनाते हैं, तंज कसते हैं, व्यंग्य करते हैं, अपमानित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन इससे वोट नहीं मिलता। अखिलेश यादव को अगर सचमुच लड़ाई में रहना है, मैं जीतने की तो बात ही नहीं कर रहा हूं, तो उनको अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा और सबसे पहले जमीन पर उतरना पड़ेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)










