हिंदुओं को जाति में बांटने की कोशिश में जुटे दलों को दिखाया आईना।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
उपचुनाव का वैसे तो ज्यादा महत्व नहीं होता है। अक्सर यह होता है कि जो पार्टी प्रभावी या सत्ता में हो, वही उपचुनाव जीतती है। लेकिन कुछ उपचुनाव हुए हैं, जिन्होंने देश की राजनीति की दिशा बदली है।
1974-75 का जबलपुर लोकसभा सीट का बाय इलेक्शन कुछ ऐसा ही था। उस समय तक जनता पार्टी बनी नहीं थी। जेपी का आंदोलन चल रहा था और कुछ विपक्षी पार्टियों ने मिलकर जनमोर्चा बनाया था। जन मोर्चा के उम्मीदवार शरद यादव थे और उन्होंने कांग्रेस के एक दिग्गज नेता को हरा दिया। जेपी मूवमेंट का चुनावी प्रभाव यहीं से शुरू हुआ। बाद में इमरजेंसी लगी। जनता पार्टी बनी। क्या-क्या हुआ वह इतिहास सबको मालूम है।
1988 में इलाहाबाद लोकसभा सीट पर हुआ उपचुनाव भी देश की सियासी तस्वीर बदलने वाला था। अमिताभ बच्चन के इस्तीफा देने से खाली हुई इस सीट पर उपचुनाव में वीपी सिंह उतरे थे। हालांकि वह लड़ना नहीं चाहते थे। उनको डर लग रहा था कि हार जाएंगे तो उनकी शुरुआत ही गड़बड़ हो जाएगी। कांग्रेस छोड़कर वह जन मोर्चा बना चुके थे। लेकिन चौधरी देवीलाल और उनके साथियों ने उन्हें लड़ाया और वीपी सिंह जीत गए। यूपी के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने कांग्रेस प्रत्याशी के लिए पूरी ताकत लगा दी लेकिन वह वीपी सिंह को चुनाव हरा नहीं पाए। इस उपचुनाव के नतीजे ने बता दिया कि कांग्रेस पोली जमीन पर खड़ी है। एक और उपचुनाव हुआ था, उससे देश की राजनीति में तुरंत तो कोई बदलाव नहीं आया लेकिन उसने बता दिया कि बड़ा बदलाव होने वाला है। वह था 1982 का गढ़वाल लोकसभा सीट का उपचुनाव। हेमवती नंदन बहुगुणा 1980 में कांग्रेस के टिकट पर वहां से जीते थे। बाद में उन्होंने कांग्रेस पार्टी छोड़ी तो इस सीट से भी इस्तीफा दे दिया। बाय इलेक्शन हुआ। इंदिरा गांधी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। वह खुद प्रचार करने गईं। डेढ़ दो महीने तक कांग्रेस के छह चीफ मिनिस्टर भी स्टेट हेलीकॉप्टर लेकर प्रचार करते रहे,लेकिन फिर भी बहुगुणा निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उपचुनाव जीत गए। इस उपचुनाव ने संदेश दिया कि इंदिरा गांधी का वह प्रभाव नहीं रहा, जो इमरजेंसी से पहले तक था। हालांकि इस बाय इलेक्शन का असर तुरंत नहीं हुआ। 1984 में इंदिरा गांधी जीवित रहतीं और चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया होता तो उसका असर दिखाई देता, लेकिन उनकी हत्या हो गई और सहानुभूति की लहर में राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस 84 में भारी बहुमत से जीत गई। लेकिन 1989 में उसका असर दिखाई दिया।
अब मैं जिस उपचुनाव की बात करने जा रहा हूं, वह मेरा मानना है कि इस देश की राजनीति में एक मौलिक परिवर्तन आने की घोषणा कर रहा है और वह है पश्चिम बंगाल की फलता विधानसभा सीट का चुनाव। फलता विधानसभा सीट डायमंड हार्बर लोकसभा सीट के तहत आती है। डायमंड हार्बर से अभिषेक बनर्जी सांसद हैं।
फलता से अभिषेक बनर्जी के खासम खास जहांगीर खान चुनाव लड़ रहे थे, जिन्होंने दावा किया था कि मैं पुष्पा हूं और पुष्पा झुकता नहीं, लेकिन वह पुष्पा ऐसा झुका और झुक कर किस बिल में गया कि खोजे नहीं मिल रहा है। मतदान से दो दिन पहले उसने घोषणा कर दी कि मैं चुनाव से हट रहा हूं। मैदान छोड़ने का उसने जो तर्क दिया,वह भी बड़ा मजेदार है। उसने कहा कि मैं तो फलता के विकास के लिए चुनाव लड़ रहा था लेकिन मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि वह फलता का विकास करेंगे तो अब मेरा उद्देश्य पूरा हो गया। मुझे चुनाव लड़ने की जरूरत नहीं है। इसको लेकर टीएमसी के अंदर बड़ा घमासान है। आप इस उपचुनाव के परिणाम का जो गणित है,उस पर ध्यान दीजिए। उससे समझ में आएगा कि देश की राजनीति में कितना बड़ा परिवर्तन आया है। फलता में कुल वोट 204445 हैं। लगभग 88% पोलिंग हुई। आमतौर पर उपचुनाव में इतना पोल नहीं होता है क्योंकि उससे सरकार पर कोई असर नहीं पड़ता। पश्चिम बंगाल में बीजेपी 207 सीटें जीत चुकी थी। यह सीट हार भी जाती तो उसकी सरकार पर कोई असर नहीं आने वाला था। दूसरी ओर टीएमसी यह सीट जीत भी जाती तो उसकी स्थिति में कोई अंतर नहीं आने वाला था। सिवाय इसके कि अभिषेक बनर्जी दावा कर सकते थे कि उनका डायमंड हार्बर फार्मूला बरकरार है। लेकिन वह भी जनता ने नहीं रहने दिया। तो फलता में जो कुल 88% वोट पड़े उसमें से हिंदू वोट 96.9% हैं। मुझे कम से कम याद नहीं है कि किसी भी उपचुनाव छोड़िए, आम चुनाव में भी किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 97% हिंदू मतदाताओं ने निकलकर वोट दिया हो। यह अपने आप में अभूतपूर्व घटना है। लेकिन आगे जो आंकड़ा बताऊंगा वह और चौंकाने वाला है। इस उपचुनाव में 72.9% मुस्लिम वोट पड़ा। परसेंटेज टर्म में आज तक किसी भी चुनाव में मुस्लिम मतदाताओं का वोट प्रतिशत हिंदू मतदाताओं से कम रहा हो, ऐसा मुझे याद नहीं आता। मुसलमान एकमुश्त वोट देते हैं। उनकी 90-95% तक पोलिंग होती है। यह पहला चुनाव मैंने देखा कि उनकी इतनी कम पोलिंग हुई और वोट प्रतिशत में यह अंतर कोई एक या दो प्रतिशत का नहीं हैं,पूरे 24 प्रतिशत का है। इस चुनाव में भाजपा उम्मीदवार को 148999 वोट मिले। जबकि लेफ्ट फ्रंट प्रत्याशी को 40,433, कांग्रेस प्रत्याशी को 1075 और टीएमसी को 7749 वोट मिले। टीएमसी के कैंडिडेट कथित पुष्पा की जमानत जब्त हो गई।
इस चुनाव में पहली बार हिंदुओं ने टैक्टिकल वोटिंग की जबकि हमेशा मुसलमान टैक्टिकल वोटिंग करते थे। आपको फिर याद दिला रहा हूं कि इस चुनाव पर सरकार बनना या गिरना निर्भर नहीं था। इससे केवल एक संदेश देना था, जो फलता के हिंदुओं ने दिया। यह मतदान पूरी तरह से धार्मिक मतदान था। पहली बार हिंदुओं ने अपने वोट की ताकत को पहचाना और पूरे देश को दिखाया कि अगर हम एक हो जाएं तो क्या कर सकते हैं। फलता का उपचुनाव उन दलों के लिए चेतावनी है, जो जाति के आधार पर हिंदुओं को बांटने की कोशिश करते हैं। जो सोचते हैं कि हिंदुओं को बांटकर और मुसलमान को इकट्ठा करके हम चुनाव जीत सकते हैं। हिंदू अब जान गया है कि सनातन धर्म को बचाना है तो उसे क्या करना है। उसे फलता का मॉडल अपनाना है। अधिक से अधिक संख्या में वोट देना है। अगले साल सात राज्यों उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, मणिपुर, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं। अगर हिंदुओं ने फलता के मॉडल को अपनाया तो सनातन विरोधी कौन सी पार्टी बचेगी। पंजाब में भी 70% हिंदू हैं। सोचिए अगर वहां 97% वोट पड़ता है और उसका 70% भी मिल जाए तो भाजपा की सरकार बनने से कौन रोक सकता है? फलता से एक आवाज उठी है कि हिंदुओं एक हो जाओ। मुसलमान एक हो जाएं,सिर के बल खड़े हो जाएं या कुछ भी कर लें, लेकिन एक हुए हिंदुओं को हराने की ताकत उनमें नहीं है। उन नेताओं और पार्टियों में भी नहीं है, जो जाति की राजनीति करते हैं। जाति से ऊपर उठकर हिंदू जैसे ही हिंदुत्व पर आता है तो फिर वह सुनामी की तरह आता है, जो फलता में दिखाई दे रहा है। जो एक बड़े पैमाने पर आपको पश्चिम बंगाल और असम में भी दिखाई दिया। आने वाले समय में देश के अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनाव में और 2029 के लोकसभा चुनाव में भी आपको हिंदुओं की यह टैक्टिकल वोटिंग दिखाई देगी। इसको कोई रोकने वाला नहीं है क्योंकि उनको अपनी ताकत का पता चल गया है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)