#pradepsinghप्रदीप सिंह।
किसी पेड़ की जड़ अगर सूख जाए तो तने पर पानी डालने से पेड़ हरा नहीं होता और वह तना भी बहुत दिन तक खड़ा नहीं रहता। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के साथ यही हो रहा है। लेकिन जब से इंडी गठबंधन की बैठक हुई है तब से एक्टिव हुआ उनका इको सिस्टम ऐसी खबरें फैला रहा है कि आपकी हंसी छूट जाएगी। उनके लोगों का कहना है कि ममता बनर्जी अब नेशनल पॉलिटिक्स करना चाहती हैं, हालांकि अभी वह प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल नहीं होना चाहतीं। अरे भाई,जो विधायक तक नहीं है, बुरी तरह से विधानसभा चुनाव हार गईं, जनआक्रोश के कारण अपने घर के बाहर सड़क पर अकेले निकल नहीं सकतीं, वह अपने को राष्ट्रीय भूमिका में देख रही हैं और उनके लोग उनके प्रधानमंत्री बनने का सपना देख रहे हैं।
हालांकि उनके प्रधानमंत्री बनने का सपना तो 4 मई से पहले भी देखा जा रहा था। तब तो फिर भी कुछ बात समझ में आती थी। बुद्धिजीवियों का एक बड़ा वर्ग इस कल्पना में डूबा रहता था कि 15 अगस्त को जब ममता बनर्जी लाल किले से भाषण देंगी तब कैसा लगेगा। उस समय वह बांग्ला में बोलेंगी या हिंदी में बोलेंगी। हिंदी में बोलेंगी तो सुनकर कैसा लगेगा। ऐसे लोगों को 4 मई को इतना बड़ा झटका लगा कि अभी तक उससे उबर नहीं पाए हैं। अब उनकी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा की बात चलाकर दरअसल यह पता चल गया है कि पश्चिम बंगाल में उनकी राजनीति खत्म हो चुकी है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का जो हाल 1977 में हुआ और लेफ्ट फ्रंट का जो हाल 2011 में हुआ, उससे बुरा हाल तृणमूल कांग्रेस का होने वाला है। इन दोनों दलों की सरकार से लोग नाराज थे लेकिन ममता बनर्जी,अभिषेक बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस से लोग घृणा कर रहे हैं। 15 साल में उन्होंने जो कुछ किया उसका दूसरा उदाहरण किसी प्रदेश में आपको नहीं मिलेगा। तो अब ममता बनर्जी की राष्ट्रीय भूमिका ढूंढी जा रही है कि वह बाकी दलों को एकजुट करने की कोशिश करेंगी। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि पराजित योद्धा का तो अपने घर में भी सम्मान नहीं होता।
ममता बनर्जी के लिए तो पश्चिम बंगाल की राजनीति तक में कोई भूमिका नहीं बची है। उनके खुद के 59 विधायक और 19 सांसद टूट चुके हैं। वह किस विपक्ष को एकजुट करना चाहती हैं जो खुद खंड-खंड हो रहा है। पश्चिम बंगाल में वह अपनी पार्टी का हाल देख ही रही हैं। इंडी गठबंधन में शामिल रहा डीएमके हाल ही में अलग हो गया। लोकसभा में उसके सदस्य कांग्रेस के सदस्यों के साथ बैठने तक को तैयार नहीं हैं। लोकसभा स्पीकर को चिट्ठी लिखकर कहा है कि हमारे बैठने की व्यवस्था अलग कीजिए। इस तरह से देखते जाइए कि क्षेत्रीय दलों की स्थिति क्या है? बिहार में दो क्षेत्रीय दल हैं आरजेडी और जेडीयू। जेडीयू एनडीए के साथ है और आरजेडी के पास तीन या चार एमपी हैं, जिनकी कोई आवाज संसद में नहीं है। 37 सीटें लेकर भी समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव पिछले दो साल में अपनी कोई राष्ट्रीय पहचान नहीं बना पाए हैं और अपने प्रदेश में भी उनकी राजनीति लगातार नीचे जा रही है। तो ममता बनर्जी किन पार्टियों को एक करने की बात कर रही हैं?

इंडी गठबंधन में शामिल दलों में कितनी एका रही है,उसे इसी से समझा जा सकता है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को 42 में से एक सीट ऑफर की थी। अब वह उम्मीद कर रही हैं कि कांग्रेस पार्टी उनको राष्ट्रीय नेता मान लेगी और उनके पीछे खड़ी हो जाएगी। सोनिया गांधी से उनके पुराने संबंध हैं तो वह उनसे मिलने गई थीं। इस मुलाकात में जो भी हुआ हो, लेकिन सोनिया गांधी को याद होगा कि ममता बनर्जी और मुलायम सिंह यादव ही वह दो नेता थे, जिन्होंने उनकी सारी योजना पर पानी फेर दिया था। वह हामिद अंसारी को राष्ट्रपति बनाना चाहती थीं और इन दोनों नेताओं ने नहीं बनने दिया। मजबूरी में कांग्रेस को प्रणव मुखर्जी को राष्ट्रपति बनाना पड़ा। सोनिया कैसे भूल सकती हैं कि पश्चिम बंगाल में चाहे लोकसभा का चुनाव रहा हो या विधानसभा का, ममता बनर्जी ने कैसा व्यवहार कांग्रेस पार्टी के साथ किया। अब ममता उम्मीद कर रही हैं कि कांग्रेसी उनको गले लगा लेंगे। अब एक यह भी अभियान चल रहा है कि जो लोग कांग्रेस से निकल कर गए थे और अलग पार्टी बनाई थी, वे एक हो जाएं। यह बात खासतौर से टीएमसी, एनसीपी और जगन मोहन रेड्डी की पार्टी वाईएसआर कांग्रेस के लिए कही जा रही है, लेकिन ऐसा होने वाला नहीं है। आप याद कीजिए कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद जनता दल के अलग हुए गुटों की एक बैठक हुई थी। उसमें फैसला हुआ कि नया दल बनेगा और उसका नाम समाजवादी पार्टी ही रहेगा। मुलायम सिंह यादव उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे। लेकिन एक दिन बाद ही सब मामला बिखर गया और यह बिखराव संसाधनों के बंटवारे को लेकर हुआ। ये पार्टियां किसी न किसी समय अपने-अपने राज्यों में सत्ता में रह चुकी थीं तो उन्होंने अपनी संपत्तियां खड़ी कर लीं। सवाल आया कि वह संपत्ति किसके हिस्से में जाएगी? तो कोई आम राय नहीं बन पाई और इसलिए एकता भी नहीं हो पाई। वही स्थिति कांग्रेस पार्टी से अलग हुए दलों की है। टीएमसी, एनसीपी या जगन मोहन रेड्डी की पार्टी की जो संपत्तियां हैं उसको छोड़ने के लिए कोई तैयार नहीं है। और फिर एकता की बात उस नेता की सुनी जाती है, जिसके पास ताकत हो। आज ममता बनर्जी पराजित और धूल धूसरित होकर पश्चिम बंगाल से दिल्ली आई हैं। शरद पवार की राजनीति खत्म हो चुकी है। वह बैसाखी पर राज्यसभा पहुंचे हैं। जगन मोहन रेड्डी बुरी तरह से हार चुके हैं और चंद्रबाबू नायडू की सरकार जिस तरह काम कर रही है,उससे लगता नहीं कि अगले चुनाव में भी जगन मोहन के लौटने की दूर-दूर तक कोई संभावना है। इन तीनों पार्टियों के नेताओं का अपना राजनीतिक अस्तित्व खतरे में है तो ये एक होकर क्या करेंगे? आप दो जीरो को मिलाइए या 200 जीरो मिलाइए,वह जीरो ही रहेगा।
इंडी गठबंधन की बैठक में आम आदमी पार्टी और झारखंड में कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार चला रही झारखंड मुक्ति मोर्चा शामिल ही नहीं हुईं। ऐसी परिस्थितियों में इन पार्टियों को जोड़ने की बात करने से ज्यादा हास्यास्पद और क्या हो सकता है। दरअसल समस्या यह है कि ममता बनर्जी बेरोजगार हो गई हैं। उनको कुछ काम चाहिए। पश्चिम बंगाल में उनके लिए कोई काम बचा नहीं है। उनको अपने भतीजे को जेल जाने और लोगों के गुस्से से बचाना है। उनको लगता है कि वह तभी हो सकता है जब राष्ट्रीय राजनीति में उनको कोई भूमिका या काम मिल जाए। सवाल यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में पहले से जो नेता हैं, वह उनको क्यों जगह देंगे? 4 मई से पहले ममता बनर्जी इसकी कोशिश करतीं तब उनकी स्थिति दूसरी होती। अब वह हारे हुए जुआरी की तरह सब कुछ लुटाकर आई हैं। आज वह मांगने की हालत में हैं। कुछ देने की स्थिति में नहीं हैं। वह एक भी विधायक पश्चिम बंगाल में इस समय जिताने की स्थिति में नहीं हैं और देश के बाकी राज्यों में तो उनका कोई जनाधार है ही नहीं। तो इसलिए जिसकी अपने राज्य में कोई भूमिका नहीं बची, उसकी राष्ट्रीय राजनीति में भूमिका होगी, इससे ज्यादा हास्यास्पद बात क्या हो सकती है। तो इसलिए ममता बनर्जी का इको सिस्टम कुछ भी कहे, कोई भी नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करे, उनकी राजनीति अब फिर से खड़ी नहीं होने वाली है। जो अपने प्रदेश, अपने शहर और अपनी कॉन्स्टिट्यूएंसी में नहीं सर्वाइव कर सकता, वह देश में और कहीं भी राजनीतिक रूप से कैसे सर्वाइव कर सकता है? इसलिए ममता बनर्जी का फिलहाल तो कोई राजनीतिक भविष्य नहीं दिख रहा है। ये वंशवादी पार्टियां सबसे बड़ा पाप यह करती हैं कि सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप नहीं तैयार करतीं। जो सेकंड लाइन ऑफ लीडरशिप होती भी है, वह परिवार से ही होती है। आज अभिषेक बनर्जी की कोई हैसियत नहीं है। उनकी सारी ताकत तभी तक थी जब तक म%