अपनी ही पार्टी के ओल्ड गार्ड को सबक सिखाने के चक्कर में एक राज्यसभा सीट गंवा दी।
हार राहुल गांधी की जैसे नियति बन गई है। मैं लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की हार की बात नहीं कर रहा हूं। राज्यसभा चुनाव की जो सीट आसानी से जीत सकते थे, उसे भी गंवा देने की बात कर रहा हूं।
राज्यसभा के द्विवार्षिक चुनाव में मध्य प्रदेश से तीन सीटें खाली थीं। वहां विधानसभा में जो सदस्य संख्या है, उसके मुताबिक भाजपा दो सीटें और कांग्रेस पार्टी एक सीट आसानी से जीत सकती थी। एक उम्मीदवार को 58 वोटों की जरूरत थी जबकि कांग्रेस के पास करीब 64 वोट थे। लेकिन कांग्रेस पार्टी ने क्या किया? उसने टिकट दिया मीनाक्षी नटराजन को और उन्हें टिकट देने के पीछे उद्देश्य यह संदेश देना था कि उन्हीं लोगों को पुरस्कार मिलेगा जो राहुल गांधी के करीबी और उनकी कोर टीम में हैं। राहुल गांधी की कोर टीम में मीनाक्षी नटराजन उस समय से हैं जब राहुल यूथ कांग्रेस के प्रमुख थे और मीनाक्षी एनएसयूआई की अध्यक्ष थीं। बाद में वह मध्य प्रदेश यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष बनाई गईं और 2009 में उनको लोकसभा चुनाव का टिकट दिया गया और वह चुनाव जीत गईं। हालांकि इसके बाद से मोदी लहर में वह कोई चुनाव जीत नहीं पाईं। मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा चुनाव का टिकट देने का एक कारण यह भी था कि राहुल गांधी अपनी ही पार्टी के ओल्ड गार्ड को संदेश देना चाहते थे। इस टिकट के प्रबल दावेदार पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ थे,लेकिन राहुल उनको टिकट देना नहीं चाहते थे। वह कमलनाथ को बताना चाहते थे कि पार्टी अब मैं चलाता हूं। यानी ओल्ड गार्ड का जमाना चला गया। अब पार्टी राहुल गांधी के मुताबिक चलेगी। हालांकि इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि उसके लिए उस तरह की रणनीतिक तैयारी भी करनी पड़ती है। पॉलिटिकल मैनेजमेंट करना होता है। तो मीनाक्षी नटराजन का जो फॉर्म था उसे भरने में एक बड़ी चूक हो गई। तेलंगाना की एक कोर्ट से उनको समन आया था। जिसकी उनको जानकारी थी, लेकिन अपने इलेक्शन एफिडेविट में उसका जिक्र उन्होंने नहीं किया। इस कारण उनका फार्म रिजेक्ट हो गया। कांग्रेस के वकीलों का कहना है कि वह जरूरी नहीं था। सवाल यह है कि मीनाक्षी नटराजन अगर अपने इलेक्शन एफिडेविट में इसका जिक्र कर देतीं तो नुकसान क्या होता? बीजेपी को यह मौका नहीं मिलता। साथ ही कमलनाथ को भी राहुल गांधी को सबक सिखाने का मौका नहीं मिलता। तो राहुल गांधी को सबक सिखाने का काम दो लोग कर रहे थे भाजपा और कमलनाथ, जो कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं। तकनीकी आधार पर रिजेक्ट किए गए फार्म के मुद्दे को लेकर राहुल गांधी की टीम इलेक्शन कमीशन के पास गई पर कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट गई। कोर्ट में पार्टी की ओर से पेश वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि रिटर्निंग ऑफिसर का फार्म रिजेक्ट करने का जो फैसला है उसको स्टे कर दिया जाए या रद्द कर दिया जाए। साथ ही चुनाव आयोग को रिजल्ट की घोषणा करने से रोका जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसे मानने से इनकार कर दिया और कहा कि 12 जून को इस मामले पर सुनवाई होगी। इसके बाद चुनाव आयोग ने भाजपा के तीनों उम्मीदवारों को विजयी घोषित कर दिया। 12 जून को इस मामले पर सुनवाई में कोर्ट में मीनाक्षी की याचिका को खारिज कर दिया। तो एक तरह से जीती हुई राज्यसभा की सीट राहुल गांधी की हठधर्मी के कारण चली गई।
राहुल गांधी और उनकी टीम की यह पिछले एक महीने में दूसरी बड़ी हार है। इससे पहले केरलम में राहुल गांधी ने अपने खास केसी वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनवाने की कोशिश की थी। पूरी ताकत लगा दी। विधायकों का बहुमत भी केसी वेणुगोपाल के पक्ष में था। लेकिन तीन फैक्टर्स को राहुल गांधी ने इग्नोर किया। पहला वीडी सतीशन को जो प्रतिपक्ष के नेता थे और मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार थे। उसके अलावा मुस्लिम लीग, जो 22 सीटें जीती थी और जिसके सतीशन से बहुत अच्छे संबंध हैं। तीसरा प्रियंका गांधी, जो सतीशन के पक्ष में थीं। नतीजा यह हुआ कि लंबे समय तक मामले को लटकाने के बाद भी आखिर में सतीशन को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। केसी वेणुगोपाल को राहुल गांधी मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए और अब मध्य प्रदेश में मीनाक्षी नटराजन को राज्यसभा का सदस्य नहीं बनवा पाए। यह बताता है कि राहुल गांधी को पॉलिटिकल स्ट्रेटजी की समझ नहीं है। राहुल के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने तय कर लिया था कि अब नए सिरे से पार्टी खड़ी करनी है तो ओल्ड गार्ड को किनारे करने के लिए कमलनाथ को टिकट नहीं दिया गया। कहा जा रहा है कि पार्टी को अपने विधायकों पर भरोसा नहीं था। उन्हें चार्टर्ड फ्लाइट से बाहर भेजा जा रहा था। विधायकों को वोटिंग के दिन ही लौटना था। इसीबीच रिटर्निंग ऑफिसर का फैसला आ गया कि मीनाक्षी नटराजन का फार्म रिजेक्ट हो गया है। कांग्रेस अगर कमलनाथ को उम्मीदवार बनाती तो वे अपनी पार्टी के विधायकों को मैनेज कर सकते थे। उसके अलावा वह भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से बात करके उनको मना सकते थे कि वह तीसरा उम्मीदवार न खड़ा करें। इससे कांग्रेस की राज्यसभा में एक सीट बढ़ जाती है। लेकिन उससे राहुल गांधी की हेठी हो जाती। उनके नहीं चाहने से कमलनाथ राज्यसभा में तो नहीं पहुंचे, लेकिन उनके चाहने से मीनाक्षी नटराजन भी राज्यसभा में नहीं पहुंच पाई।
कमोबेश कुछ ऐसी ही स्थिति झारखंड में हुई है। वहां एक सीट पर झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपना उम्मीदवार खड़ा किया जबकि दूसरे पर एक इंडिपेंडेंट उम्मीदवार नाथवानी थे। नाथवानी के नॉमिनेशन पेपर में कांग्रेस को स्पेलिंग मिस्टेक दिखी तो उसने रिटर्निंग ऑफिसर से शिकायत की। रिटर्निंग ऑफिसर ने नाथवानी को 24 घंटे का समय दिया कि आप इसमें सुधार करके दीजिए। उन्होंने करके दे दिया। कांग्रेस ने इसका विरोध किया। इस मामले में कानूनी पैरवी के लिए उसने सलमान खुर्शीद को चार्टर्ड प्लेन से रांची भेजा। अदालत को एक बजे तक फैसला करना था जबकि सलमान खुर्शीद उस समय तक नहीं पहुंच पाए। यह है कांग्रेस का मैनेजमेंट। पैसा बहुत है। चार्टर्ड फ्लाइट से अपने विधायकों को बेंगलुरु भेज सकते हैं। वकील चार्टर्ड फ्लाइट से दिल्ली से रांची भेज सकते हैं। लेकिन जिसको माइक्रो मैनेजमेंट कहते हैं, वह नहीं कर सकते। राहुल गांधी और उनकी कोर टीम के जो लोग हैं, उनको इन बारीकियों का कोई ज्ञान नहीं है। उनको लगता है कि राहुल गांधी ने नॉमिनेशन के लिए हां कर दी है तो अब कौन रोक सकता है?
तो राहुल गांधी के कहने से मतदाता लोकसभा और विधानसभा में वोट नहीं दे रहा है और अब राज्यसभा चुनाव में यह हाल हो रहा है। वैसे आप मान कर चलिए कि अगर नॉमिनेशन रिजेक्ट न होता तब भी इस बात की प्रबल संभावना थी कि मीनाक्षी नटराजन चुनाव हार जातीं। उसका कारण था कि कांग्रेस पार्टी के कुछ विधायक एबस्टेन कर सकते थे। कुछ क्रॉस वोटिंग कर सकते थे। बीजेपी ने पूरी तैयारी कर रखी थी। राज्यसभा का यह चुनाव कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योंकि भाजपा इस समय इस अभियान में लगी हुई है कि राज्यसभा में एनडीए की 2/3 मेजॉरिटी हो जाए। राहुल गांधी ने अपनी ही पार्टी के ओल्ड गार्ड को सबक सिखाने के चक्कर में एक सीट गंवा दी। ऐसे में फिर सवाल उठता है कि क्या राजनीति राहुल गांधी के बस की बात है। जहां आसानी से चीजें मैनेज हो सकती थीं, जो परिस्थिति कांग्रेस के पक्ष में थी, उसे भी राहुल गांधी के तौर तरीके ने कांग्रेस के विपरीत बना दिया। इससे आप समझ सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी किस रास्ते पर जा रही है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












