आस्था पर चोट को सनातनी भूलता नहीं, जवाब जरूर देता है ।
अयोध्या में ट्रस्ट की बैठक में दो लोगों चंपत राय और अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए गए जबकि गोपाल राव को हटा दिया गया।
फिर भी इस बैठक से जो निकला और जो संदेश गया कि ट्रस्ट और उसके कर्ताधर्ताओं ने चंपत राय को बचाने की कोशिश की। तर्क दिया जाता है कि चंपत राय लंबे समय से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और अयोध्या आंदोलन से जुड़े हुए हैं। व्यक्तिगत रूप से ईमानदार हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी का क्या करें? उनकी निगरानी में इतनी बड़ी चोरी होती रही ऐसे व्यक्ति को ईमानदार कैसे कह सकते हैं? चोर सिर्फ वही नहीं होता जो चोरी का माल ले जाता है। चोर से बड़ा चोर वह होता है, जो चोरी होने देता है। चंपत राय ने वही काम किया है। उन पर न केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बल्कि करोड़ों हिंदुओं ने विश्वास किया था। उन्होंने हिंदुओं की आस्था के साथ विश्वासघात किया है। लेकिन कहा यह गया कि उनसे भूल हुई। दरअसल वह अयोग्य और अक्षम थे। जो जिम्मेदारी उनको दी गई थी उसको निभाने के योग्य नहीं थे।
राम मंदिर की व्यवस्था चंपतराय जैसे व्यक्ति को नहीं सौंपी जानी चाहिए थी, जो अहंकार की अट्टालिका पर खड़ा हो। चंपत राय जैसे लोगों की जगह रावण की लंका में है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की अयोध्या में नहीं है, यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझनी चाहिए थी। चंपत राय को लगा कि अयोध्या और खासतौर से भगवान राम का मंदिर उसकी निजी जागीर बन गए। वह जैसे चाहेगा वैसे चलाएगा। मैं बार-बार कहता हूं कि भूल की माफी होती है लेकिन अपराध की सजा होती है। चंपत राय को कोई सजा न देकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपनी छवि पर बहुत बड़ा दाग लगा लिया है। चंपत राय को क्लीनचिट देकर और बैठक में उनकी प्रशंसा करवाकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इस देश के करोड़ों हिंदुओं को यह संदेश दिया है कि उनकी आस्था की उसे उतनी परवाह नहीं है, जितनी अपने एक स्वयंसेवक की है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी का सौभाग्य है कि उनके विरोध में जो लोग हैं, उनकी अपनी कोई क्रेडिबिलिटी नहीं है। कम से कम अयोध्या मुद्दे पर संघ विरोधियों की कोई विश्वसनीयता नहीं है इसलिए लोग नाराज भी होंगे तो उन लोगों के पास नहीं जाएंगे जो हर कदम पर भगवान राम के मंदिर का विरोध करते रहे हैं। याद कीजिए जिस दिन मंदिर के शिलान्यास का कार्यक्रम हो रहा था, उस दिन संसद का सत्र भी चल रहा था। कांग्रेस पार्टी के सारे सांसद काला कपड़ा पहन कर सदन में आए थे। आज वे लोग आस्था की बात कर रहे हैं। ये कालनेमि हैं। इनको लग रहा है कि यह मौका है और यह मौका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके पदाधिकारियों ने दिया है। जिस तरह से इस पूरे मुद्दे को हैंडल किया गया है। जिस तरह से चंपत राय का बचाव किया गया है। दरअसल इस समय चंपत राय,अनिल मिश्रा और गोपाल राव को जेल में होना चाहिए था। चंपत राय अगर जेल में नहीं हैं तो यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नाकामी है। संघ उनको क्यों बचा रहा है, यह समझ से परे हैं। संघ को लगता है कि अगर चंपत राय को जेल हो गई तो संगठन की बदनामी होगी। अरे चंपत राय ने तो संगठन की छवि पर दाग पहले से लगा ही दिया है। उनको बचाकर आप उस दाग को और गहरा कर रहे हैं। हिंदू अपनी आस्था पर होने वाले प्रहार पर तुरंत कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, लेकिन याद रखिए वह सैकड़ों साल तक भूलता भी नहीं है। मंदिरों में प्रबंधन का एक तरीका था। उसका उदाहरण हमारे सामने है। आप चाहे तिरुपति बालाजी की बात कीजिए या पद्मनाभ मंदिर या अन्य बड़े मंदिरों की। सनातन संस्कृति ने पूरी दुनिया को दिखाया है कि मंदिरों को कैसे चलाया जाता है और उनकी अर्थव्यवस्था को कैसे सुनियोजित किया जाता है। लेकिन चंपत राय ने उस सबसे कोई सीख लेने की जरूरत नहीं समझी। उनके अहंकार ने पूरी सनातन संस्कृति का अपमान किया है। अगर चंपत राय और अनिल मिश्रा को इसकी सजा नहीं मिलती है तो आप मानकर चलिए कि इसकी सजा एक न एक दिन संघ और विश्व हिंदू परिषद को मिलेगी।
500 साल से ज्यादा समय हो गया जब बाबर ने मंदिर गिराकर मस्जिद बनवाई थी लेकिन हिंदू उसको भूले नहीं। भूल गए होते तो बात खत्म हो जाती। हिंदुओं के मन में राम तब भी थे, अब भी हैं और आगे भी रहेंगे। तो अयोध्या में ट्रस्ट की बैठक में जो कुछ हुआ वह एक तरह से पूरे मामले को दबाने और उसकी लीपापोती की कोशिश है। जो किया गया, वह जो न्यूनतम होना चाहिए था, उससे भी कम है। बैठक में चंपत राय के बारे में अच्छे शब्द बोला जाना हिंदू आस्था का बड़ा अपमान है। चंपत राय को कायदे से विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बहिष्कृत किया जाना चाहिए था। चोरी पकड़े जाने के बाद भी वह आदमी पुलिस ले जाकर पैसा बरामद करवाता रहा। कौन से अधिकार से? क्या चंपत राय अयोध्या के डीएम थे, एसएसपी थे,डीआईजी थे,आईजी थे, क्या थे भाई? किस अधिकार से वह पुलिस को लेकर इन चोरों के घर गए? और ये सारे चोर वे हैं जिनकी नियुक्ति चंपत राय ने की है। चंपत राय ने जो पाप किया है उससे वह बच कैसे सकते हैं? उनको उनका संगठन सजा दे न दे, कानून सजा दे न दे,जनता की नजर में वह अपराधी हैं। जनता कानून के फैसले का इंतजार नहीं करती है। आप याद कीजिए 1986 में बोफोर्स का मुद्दा उठा था। आज तक लोगों की नजर में राजीव गांधी दोषी हैं। भले ही अदालत ने उनको सजा न दी हो। तो जिन लोगों को यह गलतफहमी है कि चंपत राय दोषमुक्त हो जाएंगे, वे दरअसल इस बात का प्रबंध कर रहे हैं कि चंपत राय अपने साथ-साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद की छवि को भी धूमिल करें। संघ को सोचना पड़ेगा कि उनके संगठन से ऐसा व्यक्ति कैसे निकला और इस व्यक्ति पर अंकुश क्यों नहीं लगाया? जिस दिन जमीन घोटाले में उनका नाम आया था, उसी दिन उनको दूध की मक्खी की तरह निकालकर फेंक देना चाहिए था तो शायद आज यह दिन न देखना पड़ता। अगर कुछ लोगों को लगता है कि चंपत राय और अनिल मिश्रा को ट्रस्ट से हटा देने से यह बात खत्म हो जाएगी और मामला दब जाएगा तो ऐसा होने वाला नहीं है। अपराधी को जब तक सजा नहीं मिलती, लोगों को संतोष नहीं होता और अपराधी को सजा मिलने का अभी तक संकेत नहीं मिला है। विश्व हिंदू परिषद और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से जिस तरह के बयान आ रहे हैं वे किसी को आश्वस्त करने वाले नहीं हैं। वे कहीं से आहत नहीं दिख रहे हैं। आप यह मानकर चलिए जो आम भक्त है,वह इन चीजों को बहुत अच्छी तरह से समझता है। वह तुरंत प्रतिक्रिया नहीं देता। वह मन में बिठा लेता है और समय आने पर इसका जवाब देता है। जो लोग इन पापियों को बचाने की कोशिश कर रहे हैं, वे सब इस पाप के भागी हैं और उन सबका हिसाब होगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं आपका अखबार’ के संपादक हैं)











