भाजपा के कोर वोट बैंक में घुसने की कोशिश सपा का और बंटाधार करेगी ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
एक बहुत बड़े हकीम हुए। उनका नाम था लुकमान। उनके बारे में कहा जाता था कि उनके पास हर मर्ज की दवा है, लेकिन एक मर्ज की दवा वह अपने पूरे जीवन में नहीं खोज पाए। वह मर्ज है गलतफहमी। इसीलिए उदाहरण दिया जाता है कि गलतफहमी की दवा तो हकीम लुकमान के पास भी नहीं थी। यह बात मुझे क्यों याद आई? बुधवार को किसी कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पीडीए की एक नई परिभाषा दी है। उन्होंने कहा कि पीडीए में पीडी का मतलब है पंडित।
अखिलेश यादव ने जब से पीडीए का शगूफा छोड़ा है तब से थोड़े-थोड़े समय पर वह उसकी परिभाषा बदलते रहते हैं। देखिए आदमी का जो मूल स्वभाव होता है वह कहीं जाता नहीं है। कानपुर का एक माफिया था जिसने पुलिस वालों की हत्या की। अखिलेश यादव को उसमें ब्राह्मण नजर आया। लेकिन जिन पुलिस वालों को उसने मारा वे भी ब्राह्मण थे। अखिलेश यादव ये भूल चुके हैं कि उस माफिया ने सबसे ज्यादा हत्या ब्राह्मणों की ही की। यूपी पुलिस जब उसे पकड़कर ला रही थी तब उसकी गाड़ी पलट गई। उसने भागने की कोशिश की तो उसका एनकाउंटर हो गया। अब उसी माफिया के जरिए अखिलेश उत्तर प्रदेश के ब्राह्मणों को अपने साथ लाने की कोशिश कर रहे हैं। अखिलेश मानते हैं कि इस माफिया के एनकाउंटर से सारे ब्राह्मण भाजपा से नाराज हो गए हैं। उनकी बातें सुनिए तो आपको लगेगा कि ये कोई गंभीर नेता हैं। वह कह रहे हैं कि सेटेलाइट की पिक्चर आएगी तो मालूम हो जाएगा कि किसने गाड़ी पलटाई थी। आप अगर उस माफिया का नाम भूल गए हों तो याद दिला दूं, उसका नाम था विकास दुबे। अखिलेश यादव विकास दुबे को ब्राह्मणों का नायक बनाकर पेश कर रहे हैं। कितनी हैरत की बात है कि ब्राह्मणों को जोड़ने के लिए उन्हें माफिया और हत्यारे विकास दुबे का ही नाम याद आया। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण नायकों की कोई कमी नहीं है। आप एक खोजेंगे 100 मिलेंगे। लेकिन अखिलेश यादव को याद है तो सिर्फ विकास दुबे। असल में अखिलेश यादव को समझ में नहीं आ रहा है कि भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ कौन से मुद्दे पर चुनाव लड़ें। तो कभी विकास दुबे को लाते हैं। आजकल उनके लिए राम मंदिर में चढ़ावा चोरी भी मुद्दा बना हुआ है, लेकिन इसका नतीजा यह हो रहा है कि उससे उनको लाभ होने की बजाय नुकसान ज्यादा हो रहा है। जिस तरह का नाटक पप्पू यादव को लेकर संसद परिसर में कराया गया। उसमें अखिलेश के चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव शामिल हुईं। वह दरअसल साधु-संतों का अपमान था। वहां पर भगवान श्री राम का अपमान हुआ। इससे अगर अखिलेश यादव को लगता है कि हिंदू बहुत खुश हो जाएंगे और भाजपा को छोड़कर उनके साथ आ जाएंगे तो इसे आप गलतफहमी नहीं तो क्या कहेंगे?
अखिलेश ने शुरुआत में पीडीए की परिभाषा दी थी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। जरा वह यूपी के किसी गांव में चले जाएं और पता कर लें कि दलितों को सबसे ज्यादा परेशानी किससे है? दलितों को सबसे ज्यादा परेशानी यादव समाज के लोगों से है। किसी थाने में चले जाइए। दलितों ने जो तहरीर लिखवाई होगी,उसमें सबसे ज्यादा आरोपी यादव समाज का ही व्यक्ति होगा। तो इस तरह के समीकरण खड़ा करने की कोशिश और फार्मूलों से राजनीति नहीं चलती है। राजनीति जमीन पर काम करने से चलती है। लेकिन अखिलेश यादव को लगता है कि जमीन पर काम करना बेकार है। इतना परिश्रम क्यों करें,जब सोशल मीडिया पर ट्वीट करने या पार्टी दफ्तर में प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से काम चल जाएगा। अखिलेश को अगर वास्तव में जानना है कि उत्तर प्रदेश के मतदाताओं का रुख क्या है तो जरा अपनी पार्टी के लोगों से कहें कि किसी गांव में जाकर महिलाओं से पूछें कि वे योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ज्यादा सुरक्षित महसूस करती हैं या जब समाजवादी पार्टी का राज था तब। उनको जवाब मिल जाएगा। अखिलेश दरअसल सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहते हैं। कार सेवकों पर गोली चलवाने के लिए समाजवादी पार्टी के किसी नेता, चाहे मुलायम सिंह यादव रहे हों और चाहे अखिलेश यादव, ने आज तक माफी नहीं मांगी है। बल्कि मुलायम सिंह यादव तो अपने जीवित रहते कहते थे कि फिर ऐसा मौका आया तो फिर गोली चलवाएंगे। अखिलेश समझ नहीं रहे हैं कि अयोध्या के मुद्दे पर जितना जाएंगे उतना उनकी जड़ खुदेगी। दरअसल बीजेपी को उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के लिए ज्यादा कुछ करने की जरूरत नहीं है। बस याद दिलाना है कि समाजवादी पार्टी का राज कैसा था। प्रदेश में करीब 13 साल यादव परिवार का शासन रहा। अखिलेश कोई एक कार्यकाल बताएं जिसमें लोगों ने सुरक्षित महसूस किया हो। उनकी पार्टी जितनी बार हारी कानून व्यवस्था खराब होने के मुद्दे पर हारी। अखिलेश यादव बताएं कि पिछले  9 साल में अपनी पार्टी की इस छवि को सुधारने के लिए उन्होंने क्या किया? बुधवार के कार्यक्रम में बोले भी तो विकास यादव के बारे में बोले। वैसे मैंने पाया है कि कई पत्रकारों की नजर में भी विकास दुबे और चंद्रशेखर आजाद में कोई फर्क नहीं है। ऐसा लगता है कि अखिलेश किसी पत्रकार की सलाह पर बोल रहे हैं और जो पार्टी पत्रकारों की सलाह पर चलती है आप उसका डूबना तय मानिए।
राहुल गांधी और अखिलेश यादव को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा या हिंदुत्व का मुद्दा उनका मुद्दा नहीं है। यह भाजपा का मुद्दा है। भाजपा को इससे ज्यादा खुशी और क्या होगी कि उनका सबसे बड़ा विरोधी गठबंधन इसी पिच पर खेलता रहे। अखिलेश यादव और राहुल गांधी की छवि हिंदू विरोधी नेता की है और वे उम्मीद करते हैं कि हिंदू उनको वोट देने लगेंगे। यह ऐसा ही है जैसे बकरा कसाई का समर्थन करने लगेगा तो गलतफहमी में जीने से कोई किसी को कैसे रोक सकता है। अखिलेश यादव को अगर सत्ता में वापसी करनी थी तो 10 साल में उन्हें अपनी पार्टी की छवि सुधारनी चाहिए थी। कोई भी जब लगातार हारता है तो उसकी समीक्षा करता है। अखिलेश यादव ने कोई ऐसी समीक्षा की क्या? और राहुल गांधी की तो बात ही मत कीजिए। वह तो समीक्षा को कूड़ेदान में फेंक देते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में हार के बाद समीक्षा के लिए कांग्रेस ने एके एंटनी की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि कांग्रेस पार्टी की छवि मुस्लिम परस्त पार्टी की बन गई है। तो राहुल गांधी ने कहा कि अब मैं पार्टी की और मुस्लिम परस्त छवि बनाऊंगा। तब से लगातार तीन बार केंद्र में भाजपा की सरकार बन चुकी है। एक के बाद एक राज्यों में भाजपा की सरकार बनती जा रही है और दोबारा-तिबारा बन रही है। लेकिन राहुल गांधी अपना रवैया बदलने को तैयार नहीं हैं।
यूपी के चुनाव के लिए अभी तक अखिलेश यादव की तो कोई रणनीति है ही नहीं। उनको लगता है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए अपशब्द बोलने से उनकी लोकप्रियता बढ़ जाएगी। पिछले साढ़े नौ साल से वह यही कर रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में एक तुक्का लग जाने से उनकी पार्टी को 37 लोकसभा सीटें मिल गईं तो उनको लग रहा है कि अब ये अक्षय पात्र है। ये खत्म नहीं होने वाला है। राजनीति में कभी ऐसा होता नहीं है। लोकसभा चुनाव की सीटों से वह मुख्यमंत्री नहीं बन जाएंगे। उत्तर प्रदेश में सत्ता में आने के लिए उनको 403 में से 202 विधानसभा सीटों पर जीतना होगा। इसलिए उनको देखना होगा कि उनका जो कोर इशू है,जो कोर वोट बैंक है,उसके लिए काम कर रहे हैं या विरोधी का जो कोर वोट बैंक है,उसमें घुसने की कोशिश कर रहे हैं जहां आपकी एंट्री पहले से बैन है। अयोध्या में भव्य राम मंदिर बनने के बाद आप आज तक वहां नहीं गए। निमंत्रण मिला तब भी नहीं गए और अब आप अपने को बीजेपी से बड़ा हिंदू साबित करने की कोशिश कर रहे हैं। चढ़ावा चोरी एक शर्मनाक घटना है, लेकिन उसकी वजह से हिंदू सपा या कांग्रेस को वोट दे देगा, ऐसा वही सोच सकता है जो गलतफहमी में जी रहा हो। इस पूरे प्रकरण में अखिलेश यादव ने अपने को हंसी का पात्र बना लिया है। वह ऐसी बातें करते हैं जो कोई गंभीर नेता नहीं करेगा। इससे समाजवादी पार्टी के समर्थक भी परेशान होंगे। इसीलिए मैं कह रहा हूं कि उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव भले ही फरवरी-मार्च 2027 में होना हो, लेकिन उसके नतीजे की घोषणा अभी से हो चुकी है। बस किस पार्टी को कितनी सीटें मिलीं, इसी की घोषणा होना बाकी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)