भाजपा को सुनना ही होगा बांकीपुर से निकला संदेश ।
मतदाता हमेशा नेताओं और राजनीतिक दलों को एक चेतावनी देता है। बिना चेतावनी दिए वह कोई बड़ा कदम नहीं उठाता। बांकीपुर ने भाजपा को ऐसी ही चेतावनी दी है। भाजपा ने अगर इसे गंभीरता से नहीं लिया तो आने वाले समय में उसे भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा।
बिहार का बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र लंबे समय से भाजपा का गढ़ रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन यहां से लगातार पांच बार विधायक रहे। उससे पहले उनके पिता विधायक रहे। लगभग तीन दशकों से भाजपा का कोई उम्मीदवार यहां से हारा नहीं। नितिन नवीन के इस्तीफे से खाली हुई इस सीट पर उपचुनाव हुआ और भाजपा हार गई। चुनाव जीतने वाले जनसुराज पार्टी के प्रशांत किशोर मीडिया मैनेजमेंट के उस्ताद हैं। छोटी सी चीज को बड़ा बनाना उनको आता है। साथ ही उनकी मदद के लिए भाजपा और संघ विरोधी इको सिस्टम तैयार बैठा है। अब आपको बांकीपुर के उपचुनाव की चर्चा इतनी सुनाई देगी, जितनी पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे की भी नहीं सुनाई दी होगी। लेकिन क्या इसी आधार पर भाजपा को इस उपचुनाव नतीजे को अनदेखा कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं। क्योंकि यह एक बीमारी का लक्षण है,जो दूसरी बार दिखाई दिया है। भाजपा को समझना पड़ेगा कि वह यह सीट क्यों हारी? कोई भी सीट किसी भी पार्टी या नेता का सुरक्षित किला तभी तक कहलाता है जब तक उसकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम हों। सुरक्षा में ढील पड़ते ही किला ढहने की आशंका बढ़ जाती है। वही बांकीपुर में हुआ। मेरा मानना है कि 2014 के बाद से यह भाजपा के लिए दूसरी चेतावनी है। देश के मतदाता ने प्रधानमंत्री और उनके साथियों को पहली चेतावनी 2024 के लोकसभा चुनाव में दी थी। हालांकि लोकसभा चुनाव में भाजपा की उस तरह से हार नहीं हुई थी, लेकिन सीटें कम हो गई थीं। यह अलग बात है कि भाजपा लगातार तीसरी बार सरकार बनाने में सफल रही। 2024 में भाजपा की सीटें कम क्यों हुई और बांकीपुर का उपचुनाव भाजपा क्यों हारी, इन दोनों का कारण मेरी नजर में एक है। देखिए यूं तो चुनाव में हारजीत का कोई एक कारण नहीं होता। कई कारण होते हैं, लेकिन कई ऐसे चुनाव होते हैं जिनमें कोई एक कारण प्रस्थान बिंदु बनता है। जैसे मैच में हम कहते हैं कि टर्निंग पॉइंट क्या था? कोई एक घटना पूरे मैच के नतीजे को बदल देती है। वैसे ही राजनीति में होता है। मैंने बांकीपुर से एक सामान्य मतदाता का एक वीडियो देखा। उससे पूछा गया कि आप तो भाजपा के वोटर थे। आपने उसे वोट क्यों नहीं दिया? उसने जवाब दिया कि तीन बार मोदी जी के कहने पर वोट दिया। मोदी जी से हमारी कोई नाराजगी नहीं है, लेकिन यह नहीं होगा कि वह चाहे जिसको उम्मीदवार बना देंगे और हम वोट देंगे। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए खतरे का बहुत बड़ा संकेत है।

2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें कम होने के विश्लेषक कई कारण बताते हैं। जैसे-संविधान बदलने का मुद्दा, आरक्षण खत्म करने का मुद्दा, दलित इधर शिफ्ट हो गया, पिछड़ा उधर चला गया। हम लोग भी उस पर चर्चा करते रहते हैं। ये सब सही बातें हैं। इनमें से कोई गलत बात नहीं है,लेकिन मैच का टर्निंग पॉइंट क्या था बात इसकी है। तो जो टर्निंग पॉइंट 2024 के लोकसभा चुनाव में था, वही बांकीपुर उपचुनाव में भी था। तब भी उम्मीदवारों के चयन में गड़बड़ी हुई थी और अब भी हुई। लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आज भी मुरीद हैं, लेकिन आंख बंद करके किसी भी खड़े गए उम्मीदवार को वोट देने के लिए तैयार नहीं हैं। उनको लग रहा है कि पार्टी उम्मीदवारों के चयन में लापरवाह हो गई है या कहें कि पार्टी में अहंकार आ गया है कि हम चाहे जिसको खड़ा कर दें मतदाता उसको ही वोट देगा। 2024 में गलत उम्मीदवार चयन का भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान उत्तर प्रदेश में हुआ। जिन उम्मीदवारों के बारे में पार्टी का इंटरनल सर्वे कह रहा था कि इनको टिकट नहीं मिलना चाहिए, ये अपने इलाके में अलोकप्रिय हो गए हैं,लेकिन उनको ही टिकट दे दिया गया। टिकट देने का फैसला करने वालों को लगा कि ये सब बेकार की बातें हैं। हम जो भी फैसला लें दूसरों का काम सिर्फ उसको लागू करना है। तुम हमारे समर्थक हो तो हम जिसको भी उम्मीदवार बनाएं उसको वोट दो। पार्टी के इस रवैये ने कार्यकर्ता को चिढ़ाने का काम किया और उम्मीदवारों के गलत चयन ने 2024 में भाजपा को यूपी में झटका दे दिया। वरना अगर संविधान बदलने या आरक्षण खत्म करने का ही मुद्दा था तो वह उत्तर प्रदेश में ही क्यों चला। बगल के राज्य मध्य प्रदेश में क्यों नहीं चला? जबकि मध्य प्रदेश में ज्यादा चलना चाहिए था क्योंकि वहां तो दो ही पार्टियां कांग्रेस और भाजपा हैं। यही बांकीपुर में हुआ। कैंडिडेट अनाउंस करने के बाद पार्टी को पता चल रहा है कि उसके पिता चारा घोटाले में फंसे हुए थे। अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की मशीनरी को यह पता ही नहीं कि जिसको उम्मीदवार बना रहे हैं उसका बैकग्राउंड क्या है। फिर उसे बदलकर ऐसे व्यक्ति को उम्मीदवार बनाया जिसके बारे में कोई जानता नहीं था। उसका फायदा प्रशांत किशोर ने उठाया।
हालांकि बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि भाजपा की राजनीति या कहें सात राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों या फिर 2029 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा की हालत खराब हो जाएगी या वह हारने वाली है, लेकिन उसे सावधानी बरतने की जरूरत है। अपने कामकाज की शैली में सुधार करने की जरूरत है। आप मतदाता को टेकन फॉर ग्रांटेड नहीं ले सकते। जब वह आपको कंधे पर बिठाता है तो कंधे से उतार भी सकता है। लोकसभा चुनाव में मतदाता ने कंधे से पूरा नहीं उतारा बस कहीं-कहीं उतार दिया,लेकिन बांकीपुर में पूरा उतार दिया। 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कोर्स करेक्शन किया, बैक टू बेसिक्स को अपनाते हुए उम्मीदवार उतारे तो उसको सफलता मिली। किसी भी राजनीतिक दल को यह पता होना चाहिए कि वह जीतता है तो किन वजहों से जीतता है और हारता है तो किन कारणों से हारता है। अगर हम जीत के कारणों को मजबूत करेंगे और हार की वजहों को सुधारेंगे तो सफलता मिलना तय है। लेकिन आप अगर इसकी परवाह नहीं करेंगे और आपको लगेगा कि हम मालिक हैं, हम आदेश देते हैं बाकी लोगों का काम सिर्फ उसका पालन करना है तो डेमोक्रेसी में यह नहीं चलता। कितना भी लोकप्रिय नेता हो वह हार सकता है। एक दौर में इंदिरा गांधी से लोकप्रिय कौन नेता था? 1977 में उनकी पार्टी तो हारी ही वह खुद अपनी लोकसभा सीट हार गईं। सबसे ताजा उदाहरण तो ममता बनर्जी का है। 15 साल से लगातार सत्ता में थीं, लेकिन 2026 में अपनी विधानसभा सीट,जहां उनका घर है,नहीं बचा पाईं। तो जनता और आपको अजेय बनाने में जो कार्यकर्ता दिन रात मेहनत करता है,उसकी भावनाओं का सम्मान कीजिए। भाजपा में मैं ऐसे बहुत से लोगों को जानता हूं जो पार्टी के लिए काम करते हैं और अपने घर से पैसा लगाते हैं। उस कार्यकर्ता को और कुछ नहीं केवल सम्मान और संवाद चाहिए। और जब यह नहीं होता है तो बड़े-बड़े किले ढह जाते हैं। तो बांकीपुर में प्रशांत किशोर का जीतना कोई बड़ी घटना नहीं है, लेकिन एक बड़ी घटना की संभावना की आहट जरूर है। लोग परंपरागत पार्टियों से ऊबकर विकल्प की तलाश में हर समय रहते हैं। जिस दिन विकल्प पर भरोसा हो जाता है,उस दिन पासा पलट देते हैं। तमिलनाडु की राजनीति में दशकों से द्रविड़ पार्टियों का कब्जा था। एक नई पार्टी आई। पहली बार चुनाव में उतरी और सरकार बना ली। क्योंकि लोग विकल्प तलाश रहे थे। इसी तरह से बिहार की राजनीति में लंबे समय से आरजेडी बनाम बीजेपी-जेडीयू गठबंधन की लड़ाई चल रही है। आरजेडी जिस तरह से हाशिये पर जा रही है,लोगों की नजर उसके विकल्प की तलाश पर है। तो मतदाता ने कहा कि एक बार जरा प्रशांत किशोर को आजमा कर देख लेते हैं। आरजेडी अब भी अगर नहीं संभलती है तो फिर बिहार का पूरा राजनीतिक समीकरण बदल जाएगा। फिर नए खिलाड़ियों के लिए रास्ता खुल जाएगा।
भाजपा यह सोचकर बेपरवाह नहीं हो सकती कि एक उपचुनाव हारने से क्या हो जाएगा। दो उपचुनावों को याद कर लीजिए। 1974 में जबलपुर सीट के उपचुनाव में शरद यादव ने निर्दलीय लड़कर कांग्रेस के बड़े उम्मीदवार को हरा दिया। उसके बाद जेपी आंदोलन हुआ और 1977 आते-आते केंद्र की सत्ता बदल गई। इसी तरह 1988 में इलाहाबाद का उपचुनाव हुआ। कांग्रेस छोड़ने वाले विश्वनाथ प्रताप सिंह निर्दलीय लड़कर जीत गए। उसके बाद राजीव गांधी की सत्ता चली गई। तो एक उपचुनाव भी राजनीति का टर्निंग पॉइंट हो सकता है। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे का संदेश सबके लिए अलग-अलग है। प्रशांत किशोर के लिए मतदाता का संदेश है कि हम मौका देने को तैयार हैं। सवाल है कि क्या आप मौके का फायदा उठाने के लिए तैयार हैं? भाजपा, जनता दल यूनाइटेड और आरजेडी के लिए संदेश है कि ये मत समझिए कि आप अजेय हैं। आप जो जातियां जोड़ते रहते हैं वह तब तक काम आता है, जब तक हम समर्थन में खड़े हैं। जिस दिन हमारा समर्थन हट जाएगा, उस दिन यह सारा अंगणित बेकार हो जाएगा। मेरी नजर में बांकीपुर भाजपा के लिए दूसरी चेतावनी है कि आप अपने कामकाज की पुरानी शैली पर लौटिए। जिस शैली में आपके सामान्य कार्यकर्ता का सम्मान था। कार्यकर्ता ही भाजपा की रीढ़ृ हैं। किसी व्यक्ति की रीढ़ अगर कमजोर हो जाए तो वह कभी ताकतवर नहीं हो सकता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)









