इंदिरा गांधी ने तो सारे विपक्ष को जेल में डालकर कई संविधान संशोधन विधेयक पास कराए थे ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारत की संसद इस समय एक तमाशा बन गई है और जनता के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल भी तमाशा बन गया है। मेरा मानना है कि भारत के संसदीय इतिहास में पहली बार हो रहा है जब सत्तारूढ़ दल और विपक्ष दोनों विफल हो गए हैं। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि संसद चले, इसकी जिम्मेदारी हमारे संविधान निर्माताओं ने सत्तारूढ़ दल पर डाली थी, लेकिन जब वे संविधान बना रहे थे तब उनको कतई यह कल्पना नहीं रही होगी कि कभी ऐसा विपक्ष होगा जो घर से तय करके आएगा कि सदन की कार्यवाही चलने ही नहीं देनी है।
सवाल है कि ऐसे पथ भ्रष्ट विपक्ष के साथ क्या किया जाए? उसका जवाब है कि अब कड़ा कदम उठाने की जरूरत है और कड़ा कदम उठाने के लिए इच्छाशक्ति की जरूरत होती है। आपको एक उदाहरण दे रहा हूं। चंद्रशेखर उस समय कार्यवाहक प्रधानमंत्री थे क्योंकि उनकी सरकार गिर चुकी थी। चुनाव कराने के लिए एक प्रस्ताव उन्होंने राष्ट्रपति के पास भेजा। उस समय असम, पंजाब और जम्मू कश्मीर में आतंकवाद अपने चरम पर था। चंद्रशेखर सरकार ने जो प्रस्ताव भेजा उसमें कहा गया कि पंजाब और जम्मू कश्मीर में भी चुनाव होना चाहिए। टीएन शेषन उस समय मुख्य चुनाव आयुक्त थे। उनको जब राष्ट्रपति भवन से यह खबर मिली तो वह सीधे राजीव गांधी के पास गए और उनसे कहा कि चंद्रशेखर जी ने अगर पंजाब और जम्मू कश्मीर में चुनाव करवा लिया तो उन्हें इसका बहुत बड़ा श्रेय मिलेगा और इसका सीधा नुकसान आपको होगा। राजीव गांधी ने उसी समय तत्कालीन राष्ट्रपति वेंकटरमण के पास अपने एक नेता को भेजा और कहा कि पंजाब और जम्मू कश्मीर का नाम चुनाव वाले राज्यों की सूची से निकल जाना चाहिए। राष्ट्रपति की ओर से एक लिखित संदेश सरकार भेजा गया कि इन दो राज्यों को सूची से निकाल दिया जाए और साथ में एक तरह की चेतावनी दी कि अपने प्रधानमंत्री को बता दीजिएगा कि अभी मैंने कार्यवाहक प्रधानमंत्री के बारे में कोई अंतिम फैसला नहीं किया है। प्रधानमंत्री को राष्ट्रपति की ओर से यह सीधी धमकी थी कि मैं किसी और को भी कार्यवाहक प्रधानमंत्री बना सकता हूं। यह खबर चंद्रशेखर जी के पास पहुंची तो उन्होंने कैबिनेट सेक्रेटरी को यह कह कर राष्ट्रपति भवन भेजा कि राष्ट्रपति अगर कर्तव्य भ्रष्ट हो जाए तो उस समय क्या किया जाए, इसके संविधान में काफी प्रावधान हैं और उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। आज शाम 5:00 बजे तक अगर फाइल पर राष्ट्रपति के दस्तखत होकर नहीं आए तो उसके बाद जो होगा, उसके लिए सिर्फ वे ही जिम्मेदार होंगे। इसके बाद 4:00 बजे तक फाइल दस्तखत होकर आ गई। यह अलग बात है कि चुनाव नहीं हो पाया क्योंकि राजीव गांधी की हत्या हो गई और इलेक्शन नोटिफिकेशन क्योंकि जारी हो चुका था तो सब कुछ चुनाव आयोग के हाथ में चला गया था और शेषन ने चुनाव रुकवा दिए। लेकिन देखिए चंद्रशेखर केयर टेकर प्राइम मिनिस्टर थे उनको मालूम था कि उनके पास न तो संसद में बहुमत है और न ही उनकी पार्टी का संगठन ऐसा था कि वह लौट कर सत्ता में फिर आते। इसके बावजूद उन्होंने कितनी मजबूती से कदम उठाया। इसके अलावा एक और उदाहरण है। इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान संविधान में आमूल परिवर्तन कर दिया जबकि उस समय समूचा विपक्ष जेल में था। पूरे विपक्ष की अनुपस्थिति में कई संविधान संशोधन विधेयक पास हुए और उनमें से ज्यादातर आज भी संविधान का हिस्सा हैं। किसी ने कहा कि बिना विपक्ष के कैसे संविधान संशोधन पास हो गया?
तो सदन चलाने की जिम्मेदारी सरकार की है और संसद की जिम्मेदारी कानून बनाने की है। अगर विपक्ष यह दोनों काम न करने दे तो सरकार को कठोरतम कदम उठाने में संकोच नहीं करना चाहिए। यहीं पर किसी भी सरकार के नेतृत्व और विल पावर की परीक्षा होती है। देश के लिए इतने जरूरी कानून, इतने जरूरी विषय हैं और आप सदन को चलने ही नहीं देंगे। सदन चलाने के लिए आप रोज नई मांग रखेंगे। एक मांग मान ली जाएगी तो नई मांग आ जाएगी। आप तय करेंगे कि गृह मंत्री आकर सदन में क्या बोलेंगे? दुनिया की किसी भी डेमोक्रेसी में ऐसा होता है क्या कि विपक्ष यह तय करे कि कोई भी मंत्री या प्रधानमंत्री क्या और किस विषय पर बोलेगा और जितना वह चाहता है उतना ही बोलेगा। मंत्री अगर पूरे परिदृश्य के बारे में बताना चाहता है तो उसे इसकी इजाजत नहीं होगी। सदन को क्या नेता प्रतिपक्ष चलाते हैं? यह प्रश्न देश के सामने बहुत गंभीर रूप से खड़ा है क्योंकि इस लोकसभा का कार्यकाल अभी लगभग पौने तीन साल बाकी है। अगर थोड़े से लोग यूं ही तय करते रहे कि हमको सदन नहीं चलने देना है तब तो देश में कोई कानून नहीं बनेगा। संसद में किसी विषय पर चर्चा नहीं होगी। तो यह विपक्ष और खासतौर से राहुल गांधी सरकार को मजबूर कर रहे हैं कि वह लोकसभा अध्यक्ष से कहे कि सदन में एक प्रस्ताव लेकर आएं और विपक्ष खासतौर से कांग्रेस के सांसदों को सदन से बाहर निकाल दें। उसके बाद जो भी प्रस्ताव और विधेयक हैं, उन पर चर्चा हो और उन्हें पास कराए जाए। ये कोई अनहोनी बात नहीं है। ठीक है कि इमरजेंसी से उसकी तुलना नहीं होनी चाहिए लेकिन खुद कांग्रेस की नेता ऐसा कर चुकी हैं। और यहां तो विपक्षी दल के किसी नेता को जेल भेजने की बात भी नहीं हो रही है। संसद का यह सत्र तो खत्म हो गया लेकिन अगला सत्र चलेगा, इसकी गारंटी कौन दे सकता है? पूरा देश विपक्ष को संसद में हंगामा करते हुए देख रहा है। देश का मतदाता और आम लोग तो विवश हैं क्योंकि उनके हाथ में मौका पांच साल में सिर्फ एक बार आता है। लेकिन सरकार क्यों विवश है? सरकार एक बार यह कदम उठाए फिर देखिए कैसे हंगामा होता है। जब संकटकालीन समय हो तो संकटकालीन उपायों का इस्तेमाल करना चाहिए। और यहां तो सवाल संख्या बल का भी नहीं है। संविधान संशोधन विधेयकों को छोड़ दें लेकिन सामान्य विधेयकों को पास कराने के लिए सामान्य बहुमत की जरूरत होती है, जो सरकार के पास है। विपक्ष उन पर भी चर्चा नहीं होने दे रहा है। इसका क्या मतलब है? सवाल है कि ऐसा कब तक चलेगा और क्यों चलेगा? इस देश की जनता ने जिस सरकार को कानून बनाने, संसद चलाने, कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए चुना है, वह कब तक मूकदर्शक बनी रहेगी?
विपक्ष में जो समझदार लोग हैं, उनको भी सोचना होगा कि वे कर क्या रहे हैं। देश को किस ओर ले जाना चाहते हैं। उनका यह रवैया संसदीय जनतंत्र को खत्म करने की ओर ले जा रहा है। अगर संसद में चर्चा नहीं होगी,कानून नहीं बनेगा तो फिर संसद की जरूरत क्या है? विपक्ष बार-बार इसी बात की ओर इशारा कर रहा है कि संसद की कोई जरूरत नहीं। उसके जो पालतू लोग हैं वे कह रहे हैं कि अब सड़क से संसद चलेगी। इससे आप समझ लीजिए कि इरादा क्या है? उनकी नीयत है कि न संसद चले,न सरकार चले, सिर्फ अराजकता चले। देश में अराजकता को चलने की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए? जो अराजक तत्व हैं और जो कानून को तोड़ना चाहते हैं,उनसे निपटने के लिए संविधान में पर्याप्त प्रावधान हैं। जरूरत है उनका इस्तेमाल करने की। पानी अब नाक तक आ गया है। अगर सरकार अब भी कोई कड़ा कदम नहीं उठाएगी तो लोगों को लगेगा कि सरकार डरी हुई है। उसमें इच्छाशक्ति नहीं है। डेमोक्रेसी में सरकार किसी पार्टी की हो, वह मूकदशक नहीं रह सकती। उसे तय करना पड़ेगा कि वह कब तक इसको बर्दाश्त करेगी। कौन सा ऐसा क्षण आएगा, जब सरकार कहेगी कि अब बहुत हो गया। यह देश हजारों साल से दो लोगों का साथ देता रहा है। एक संन्यासी का, जो सब कुछ त्यागने को तैयार हो। दूसरा शक्तिशाली का, जिसकी भुजाओं में ताकत हो। ताकतवर की सुनी तब जाती है जब वह ताकत दिखाने का इरादा दिखाए। जरूरी नहीं ताकत का इस्तेमाल करे, उसका इरादा दिखाने से ही काम चल जाता है। सरकार को यह एहसास होना चाहिए कि उसकी ताकत दिखाने का समय आ गया है। अब बर्दाश्त करने का समय चला गया है। धैर्य अच्छी चीज है, लेकिन एक सीमा के बाद धैर्य कमजोरी का लक्षण बन जाता है। अब सरकार तय करे कि वह धैर्य को अपनी ताकत बनाना चाहती है या कमजोरी।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)