#santoshtiwariडॉ. संतोष कुमार तिवारी 
हेनरी डेविड थोरो (Henry David Thoreau 12 जुलाई 1817 – 6 मई 1862) एक अमेरिकी प्रकृतिवादी, निबंधकार, कवि और दार्शनिक थे। महात्मा गांधी (1869-1948) उनसे बहुत प्रभावित थे। थोरो का स्वयं भगवद्गीता से बड़ा प्रेम था। थोरो ने बहुत कुछ पढ़ा-लिखा, परन्तु विशेषत: उनकी पुस्तक ‘वाल्डेन’ (Walden) और उनके निबन्ध ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ (Civil Disobedience) ने महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, लेव तोलस्तोय, आदि अनेक विश्व नेताओं को प्रभावित किया है। थोरो की पुस्तक ‘वाल्डेन’ आत्म निर्भर जीवन की एक गाइड-बुक की तरह है। थोरो अपनी डायरी भी लिखते थे, जिसे उस समय जर्नल (Journal) कहा जाता था। जर्नल में वह प्रकृति, धर्म आदि पर अपने दैनिक विचार लिखा करते थे। थोरो के निधन के बाद उनका जर्नल चौदह खण्डों में प्रकाशित हुआ। इसमें साढ़े छह हजार से अधिक पृष्ठ हैं। जर्नल में लिखे गए उनके विचार भी ‘वाल्डेन’ और ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ की तरह अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं। थोरो का जर्नल-लेखन 22 अक्तूबर 1837 से 14 मई 1861 तक चला। उनका जर्नल एक तरह की हस्तलिखित नोटबुक होता था। उसमें वह रोज कुछ न कुछ लिखते थे। 
उन्होंने अपने जर्नल में लिखा: In the Hindoo scripture the idea of man is quite illimitable and sublime. There is nowhere a loftier conception of his destiny . He is at length lost in Brahma himself, “the divine male.” … The veneration in which the Vedas are held is itself a remarkable fact .
भावार्थ: हिन्दू धर्मग्रंथों में मनुष्यों में ब्रह्म तक बनने की असीम और उत्कृष्ट संभावनाएं देखी गईं हैं। … वेदों को जो सम्मान और श्रद्धा प्राप्त है वह स्वयं में ‘एक अद्भुत तथ्य’ हैं। (जर्नल, खण्ड एक, पृष्ठ 275, 28 अगस्त 1848)
उन्होंने आगे लिखा: The simple life herein (Hindu scriptures) described confers on us a degree of freedom even in the perusal.
भावार्थ: हिन्दू शास्त्रों में जो सीधा-सादा जीवन वर्णित है वह मनुष्य को एक प्रकार की स्वतन्त्रता प्रदान करता है। (जर्नल, खण्ड एक, पृष्ठ 277, 30 अगस्त 1848)

थोरो की संक्षिप्त जीवनी

हेनरी डेविड थोरो पिताजी का पेंसिल बनाने का व्यापार था। पिताजी के निधन के बाद उन्होंने भी कुछ समय तक इस व्यापार में हाथ बंटाया। कुछ समय उन्होंने शिक्षण कार्य भी किया। उनके जीवन में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब उनकी मित्रता प्रसिद्ध अमेरिकी कवि और निबन्धकार राल्फ वाल्डो एमर्सन (1803-1882) से हुई। थोरो और एमर्सन दोनों ही हारवर्ड डिवाइनिटी स्कूल के छात्र रहे थे।
थोरो ने अपने शहरी जीवन की सुख सुविधाएं छोड़ कर अमेरिका में ‘वाल्डेन’ तालाब के तट पर स्वयं श्रम करके एक कुटी बनाई थी। ‘वाल्डेन’ बहुत बड़ा तालाब है और वहाँ वह सन् 1845-47 के बीच दो वर्ष दो महीने और दो दिन तक रहे थे। वह जमीन जहां उन्होंने कुटी बनाई थी एक जंगल के बीच थी और उस जमीन के स्वामी थे राल्फ वाल्डो एमर्सन। वहाँ प्रवास के दौरान जुलाई 1946 में एक रात उन्हें जेल में भी काटनी पड़ी थी, क्योंकि उन्होंने पोल टैक्स नहीं जमा किया था। वह इस पोल टैक्स को अन्यायपूर्ण मानते थे।
थोरो एमर्सन के ऋषितुल्य जीवन से बहुत प्रभावित थे। मायावी सुखों का त्याग इनका स्वभाव बन गया था। भोग पदार्थ उन्हें आकृष्ट नहीं कर सके। उनका कहना था की एकांत से बढ़ कर मनुष्य का कोई सुहृदय और पवित्र मित्र नहीं है। ‘वाल्डेन’ प्रवास के दौरान उन्होंने प्रकृति, पशु पक्षियों और वन्यजीवों से बहुत कुछ सीखा था। प्रकृति का मधुर संगीत और सुगन्ध उन्हें भाती थी। थोरो ने सीखा कि अपने काम अपने हाथ से काम करना बड़े सम्मान की बात है। वहाँ वह जो अन्न खाते थे उसे स्वयं पैदा करते थे। थोरो वाल्डेन तालाब के तट पर बैठ कर या नौका विहार करते समय कभी-कभी बांसुरी भी बजाते थे। उनकी बांसुरी अमेरिका में कानकार्ड के संग्रहालय में आज भी रखी हुई है। थोरो ने सदा कठिन श्रम करके अपना जीवन निर्वाह किया। उनकी पुस्तक ‘वाल्डेन’ उनके इसी प्रवास में हुए अद्भुत अनुभवों की कहानी है।
थोरो को जर्नल लिखने की प्रेरणा एमर्सन से ही मिली थी। एमर्सन स्वयं भी अपना जर्नल लिखते थे, जोकि बाद में सोलह खण्डों में प्रकाशित हुआ।
थोरो अन्तर्ज्ञानवादी अर्थात ट्रान्सेंडैंटलिस्ट लेखक थे। उनकी पुस्तक ‘वाल्डेन’ आत्मनिर्भर जीवन की एक गाइड-बुक की तरह है। थोरो नागरिक अधिकार आंदोलन में सक्रिय थे। उनका निबन्ध ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ इसी विषय पर है।
चवालीस वर्ष की अपेक्षाकृत अल्पायु में थोरो का निधन हो गया। शायद वह क्षय रोग से ग्रसित थे। इस रोग का उस समय कोई इलाज नहीं था। उनके जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब उनका विवाह होने को था, परन्तु लड़की के माता-पिता ने उसे नहीं होने दिया। थोरो आजीवन अविवाहित रहे।

महात्मा गांधी पर थोरो का प्रभाव

महात्मा गांधी कभी थोरो से नहीं मिले थे। थोरो के निधन के सात वर्ष बाद गांधीजी का जन्म सन् 1869 में हुआ था।
महात्मा गांधी थोरो के निबन्ध ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ से बहुत प्रभावित थे। लगभग साढ़े नौ हजार शब्दों वाला यह निबन्ध पहली बार अमेरिका में ‘एस्थेटिक पपेर्स’ (Aesthetic Papers ) नामक एक छोटी सी पत्रिका में वर्ष 1849 में छपा। इस पत्रिका का प्रकाशन थोड़े समय ही चल पाया, फिर बंद हो गई। उस समय इस निबन्ध को बहुत कम लोगों ने पढ़ा। लेकिन अगली शताब्दी में इसे सैकड़ों विद्वानों ने पढ़ा और लाखों लोग इससे प्रभावित हुए। दक्षिण अफ्रीका में महात्मा गांधी ने इस निबन्ध को अपने अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ में पुन: प्रकाशित किया और इसका गुजराती अनुवाद भी छापा। बाद में इस पर ‘इंडियन ओपिनियन’ की ओर से निबन्ध प्रतियोगिता भी दक्षिण अफ्रीका में आयोजित की गई। महात्मा गांधी ने थोरो के ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ को सविनय अवज्ञा आंदोलन अर्थात सत्याग्रह की संज्ञा दी। (बुक्स दैट चेंज द वर्ल्ड, लेखक: राबर्ट बी. डाउन्स; प्रकाशक: ए मेंटर बुक न्यू अमेरिकन लाइब्रेरी, 1956, पृष्ठ 73)
‘सिविल डिसओबिडिएंस’ निबन्ध में थोरो ने एक स्थान पर लिखा है:
Some years ago, the State met me in behalf of the Church, and commanded me to pay a certain sum toward the support of a clergyman whose preaching my father attended, but never I myself. ” Pay,” it said, ” or be locked up in the jail .” I declined to pay. But, unfortunately, another man saw fit to pay it . I did not see why the schoolmaster should be taxed to support the priest, and not the priest the school master ; for I was not the State’s schoolmaster, but I supported myself by voluntary subscription. However, at the request of the selectmen, I condescended to make some such statement as this in writing :– Know all men by these presents, that I, Henry Thoreau. do not wish to be regarded as a member of any incorporated society which I have not joined,’ This I gave to the town cleric ; and he has it . The State, having thus learned that I did not wish to be regarded as a member of that church, has never made a like demand on me since…
भावार्थ: कुछ वर्ष पहले चर्च की ओर से राजकीय शासन ने मुझे यह आदेश दिया गया कि मैं पादरी की सहायता के लिए अमुक राशि जमा करूँ, नहीं तो मुझे जेल में डाल दिया जाएगा। इस आदेश का आधार यह बनाया गया था कि मेरे पिताजी ने कभी उस पादरी के उपदेश सुने थे। मैंने धनराशि जमा करने से इनकार कर दिया। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह थी कि एक अन्य व्यक्ति ने इस तरह की धनराशि को जमा करना उचित समझा। मेरे यह समझ में नहीं आता कि एक पादरी की मदद करने के लिए एक स्कूल मास्टर पर टैक्स क्यों लगाया जाए। इसी निबन्ध में थोरो ने आगे लिखा कि जब शासन को यह पता चल गया कि मैं उस चर्च का सदस्य नहीं बनना चाहता हूँ, तो धन राशि जमा करने की मांग फिर कभी नहीं उठी।

थोरो और भगवद्गीता

‘वाल्डेन’ पहली बार सन् 1854 में प्रकाशित हुई। बाद में अमेरिकी प्रकाशक पेंगुइन बुक्स ने इसे ‘सिविल डिसओबिडिएंस’ निबन्ध के साथ प्रकाशित किया। इस पुस्तक का नाम है – ‘‘वाल्डेन’ एण्ड सिविल डिसओबिडिएंस’। इसका पुनर्मुद्रण सन् 1986 में प्रकाशित हुआ। इस लेख में जहां कहीं भी ‘वाल्डेन’ से उद्धरण किया गया है, तो वह इसी पुनर्मुद्रित पुस्तक से है।
अपनी पुस्तक ‘वाल्डेन’ (पृष्ठ संख्या 100) में भगवद्गीता की उत्कृष्टता की चर्चा करते हुए थोरो लिखते हैं:
How much more admirable the Bhagvat-Geeta than all the ruins of the East! … A simple and independent mind does not toil at the bidding of any prince. Genius is not a retainer to any emperor …
भावार्थ: पूर्वी विश्व … की प्रशंसा करें, तो भगवद्गीता ही सर्वाधिक प्रशंसनीय है! … एक सरल और स्वतंत्र मस्तिष्क किसी राजकुमार के हाथ नहीं बिक सकता। प्रतिभावान व्यक्ति किसी सम्राट का अनुचर नहीं हो सकता…
पृष्ठ 346 पर वह लिखते हैं:
In the morning I bathe my intellect in the stupendous and cosmogonal philosophy of the Bhagvat Geeta …
भावार्थ: सुबह-सुबह मैं अपनी बुद्धि को भगवद्गीता की अतिविशाल ब्रह्माण्डविद्या की दार्शनिकता से स्नान कराता हूँ।
पृष्ठ 346 पर थोरो ने विष्णु, इन्द्र, गंगा नदी आदि की भी चर्चा की है।
पृष्ठ 131-132 पर उन्होंने दामोदर को उद्धृत करते हुए लिखा:
“There are none happy in the world but beings who enjoy freely a vast
horizon,”—said Damodara …
भावार्थ: उससे अतिरिक्त कोई भी जीव प्रसन्न नहीं हो सकता जिसे विशाल क्षितिज में विचिरण का आनन्द लेने का अवसर मिला है … (भारत के प्राचीन महाकाव्य ‘हरिवंश’ में दामोदर कृष्ण का दूसरा नाम है।)
अपनी पुस्तक ‘वाल्डेन’ के पृष्ठ 134 पर थोरो ने लिखा है:
The Vedas say, “All intelligences awake with the morning.”
भावार्थ: वेदों में कहा गया है कि भोर में अर्थात प्रात:काल में ही प्रज्ञा जागृत होती है।
पृष्ठ 134, 265,267 पर भी थोरो ने फिर वेदों और वेदान्त की चर्चा की है। पृष्ठ 140 पर उन्होंने इन्द्र की चर्चा की है।
पृष्ठ संख्या 268-269 पर उन्होंने हिन्दू खान-पान और रहन-सहन की सराहना की है।
पृष्ठ 317 पर थोरो लिखते हैं:
The Vishnu Purana says, “The house-holder is to remain at eventide in his court-yard as long as it takes to milk a cow …” I often performed this duty …
भावार्थ: विष्णु पुराण में कहा गया है कि संध्या काल में गृह-स्वामी को अपने प्रांगण में गाय के दूध देने तक रुकना है … मैंने बहुधा यह कर्तव्य निभाया है…
(एच.एच. विल्सन ने विष्णु पुराण का अंग्रेजी में अनवाद किया था जोकि वर्ष 1840 में प्रकाशित हुआ था। थोरो ने उपर्युक्त उद्धरण उसी अनुवाद से लिया है।)
पृष्ठ सख्या 330 पर थोरो ने महाभारत से उद्धृत किया:
“O Prince, our eyes contemplate with admiration and transmit to the soul the wonderful and varied spectacle of this universe. The night veils without doubt a part of this glorious creation; but day comes to reveal to us this great work, which extends from earth even into the plains of the ether.”
भावार्थ: ओ राजकुमार, हम इस अद्भुत और नानारूपीय लीला वाले ब्रम्हांड की आत्मा का श्र्द्धा के साथ मनन-चिंतन करते हैं। हम बगैर किसी संदेह के कह सकते हैं कि रात्रि का अंधकार इस श्रेष्ठ सृष्टि के एक भाग को ढक देता है, लेकिन दिन का प्रकाश इस महान संरचना का रहस्य खोल देता है। यह संरचना इस रणभूमि से लेकर ईथर-विश्व तक फैली हुई है।
पृष्ठ संख्या 367 पर थोरो ने पाँचवी शताब्दी के महाकवि कालिदास के नाटक शकुन्तला की इस प्रकार चर्चा की है:
“Even in Calidas’ drama of Sacontala, we read of “rills dyed yellow with the golden dust of the lotus.”
भावार्थ: यहाँ तक कि कालिदास की नाट्य रचना शकुन्तला में हम पढ़ते हैं कि “कमल की स्वर्णिम धूलि से नदिकाएँ सुनहरी-पीली हो जाती हैं।“
‘वाल्डेन’ के पृष्ठ संख्या 266-267 में थोरो ने लिखा है:
“A command over our passions, and over the external senses of the body, and good acts, are declared by the Ved to be indispensable in the mind’s approximation to God.”
भावार्थ: वेद में कहा गया है कि ईश्वर के निकट पहुँचने की अनिवार्य शर्त यह है कि मनुष्य सुकर्म करे और अपनी वासनाओं व वाह्य इंद्रियों पर नियंत्रण रखे।
पृष्ठ 140 पर थोरो ने एक हिन्दू कहानी की चर्चा की है। इसमें कहा गया कि एक राजा का पुत्र बचपन में ही अपने नगर से बाहर कर दिया गया और एक वनवासी ने उसे पाला-पोसा। जब वह बड़ा हो गया तब भी वह यह समझता रहा कि वह असभ्य-बर्बर जाति का है। एक बार उसके पिता के एक मंत्री ने उसे पहचान लिया और उसको उसकी असलियत बताई। तब उसे पता चला कि वह एक राजकुमार है। इसी प्रकार आत्मा का भी ऐसा ही होता है कि वह जब तक मायावी परिस्थितियों से घिरी होती है, तब तक वह स्वयं को माया का अंग समझती है। ऐसा तब तक चलता रहता है जब तक कि कोई पवित्र गुरु उसको यह सच्चाई नहीं बताता है कि वास्तव में वह तो ब्रह्म है।

थोरो को भगवद्गीता का इतना ज्ञान कैसे हुआ?

राल्फ वाल्डो एमर्सन (1803-1882) आयु में थोरो से चौदह वर्ष बड़े थे। थोरो के लिए वह मित्र ही नहीं बल्कि गुरुतुल्य थे। एमर्सन प्रसिद्ध निबंधकार, वक्ता तथा कवि थे। वह स्वयं भी भगवद्गीता से प्रभावित थे। उनकी अंग्रेजी की एक कविता का शीर्षक है – ब्रह्मा। इस अंग्रेजी कविता में उन्होंने ‘ब्राह्मण’ शब्द का भी प्रयोग किया है।
एमर्सन के प्रभाव के अतिरिक्त थोरो ने पुस्तकालयों के माध्यम से हिन्दू धर्म और दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। वह जब भी किसी पुस्तकालय में जाते थे, तो उसकी चर्चा अपने जर्नल में करते थे।
थोरो के एक मित्र ने उन्हें इंगलैंड से हिन्दू धर्म और साहित्य की कम से कम 21 पुस्तकें उपहार स्वरूप भेजी थीं। इनमें से एक नौ खण्डों में थी। ये सभी अंग्रेजी अनुवाद थे, परंतु एक पुस्तक संकृत में भी थी। इन पुस्तकों के प्राप्ति की सूचना थोरो ने अपने एक मित्र डैनियल रिकेट्सन को 25 दिसम्बर 1855 को लिखे गए एक पत्र में दी थी।
थोरो और एमर्सन दोनों का ही मानना था कि चर्च द्वारा गढ़े गए कृत्रिम विचारों की तुलना में प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वरीय शक्ति कहीं अधिक है। दोनों ही चर्च के संगठनात्मक स्वरूप के विरूद्ध थे।
थोरो ने अपने जर्नल में लिखा: If a man do not revive with nature in the spring, how shall he revive when a white-collared priest prays for him?
भावार्थ: यदि कोई व्यक्ति प्रकृति के माध्यम से पूर्वरूप में नहीं आ सकता, तो उसको सफ़ेद कालर वाले पादरी की प्रार्थना भी पूर्वरूप में कैसे ला सकती है? (जर्नल, खण्ड दस, पृष्ठ 315, 20 मार्च 1858)

थोरो के अनमोल वचन

अंग्रेजी साहित्य थोरो के अनमोल वचनों से भरा हुआ है। जब तक इस धरती पर अंग्रेजी का बोलबाला रहेगा, थोरो के दीवाने विश्व के कोने-कोने में बने रहेंगे। उन्होंने अपने लेखन के माध्यम से जो अनमोल विचार प्रकट किए उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
Nothing goes by luck in composition. It allows of no tricks. The best you can write will be the best you are.
लेखन में भाग्य से काम नहीं चलता। इसमें कोई छल कपट नहीं चलता। आप अधिक से अधिक उतना अच्छा ही लिख सकेंगे जितने अच्छे आप हैं।
Goodness is the only investment that never fails.
भलाई करना एक ऐसा निवेश है जो कभी फेल नहीं होता।
The mass of men lead lives of quiet desperation.
अधिकांश मनुष्य अपना जीवन निराशा और मायूसी में व्यतीत कर रहे हैं।
The fault-finder will find faults even in paradise.
छिद्रान्वेषण करने वाले स्वर्ग में भी कोई न कोई न कोई त्रुटि ढूंढ लेंगे।
An early-morning walk is a blessing for the whole day.
सुबह-सुबह टहलना पूरे दिन के लिए एक आशीर्वाद है।
Do not trouble yourself much to get new things, whether clothes or friends.
नई-नई वस्तुएँ इकठ्ठा करने की मुसीबत मोल मत लो, चाहे वो कपड़े हों या मित्र हों।
हेनरी डेविड थोरो की बांसुरी अमेरिका में कानकार्ड के संग्रहालय में आज भी संरक्षित है।
(लेखक सेवानिवृत्त प्रोफेसर हैं।)
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थोरो के गुरु राल्फ वाल्डो इमर्सन

Henry David Thoreau (1817-1862) के गुरु थे राल्फ वाल्डो इमर्सन Ralph Waldo Emerson (1803-1882)। इमर्सन उम्र में थोरो से लगभग 14 वर्ष बड़े थे। इमर्सन की एक प्रसिद्ध कविता है “ब्रह्मा”। इस कविता में उन्होंने ब्राह्मण शब्द का प्रयोग भी किया है। यह कविता अमेरिकन पत्रिका “द अटलांटिक” के नवम्बर 1857 के अंक में प्रकाशित हुई थी।
वह अंग्रेजी कविता और उसका AI हिंदी अनुवाद इस प्रकार है:
Brahma
If the red slayer think he slays,
Or if the slain think he is slain,
They know not well the subtle ways
I keep, and pass, and turn again.
Far or forgot to me is near;
Shadow and sunlight are the same;
The vanished gods to me appear;
And one to me are shame and fame.
They reckon ill who leave me out;
When me they fly, I am the wings;
I am the doubter and the doubt,
I am the hymn the Brahmin sings.
The strong gods pine for my abode,
And pine in vain the sacred Seven;
But thou, meek lover of the good!
Find me, and turn thy back on heaven.
ब्रह्मा
अगर लाल कातिल सोचता है कि उसने मारा है,
या अगर मारा गया सोचता है कि वह मारा गया है,
तो वे अच्छी तरह नहीं जानते कि मैं किन चालाक तरीकों से चलता हूँ, और गुज़रता हूँ, और फिर लौटता हूँ।
मेरे लिए दूर या भुला दिया जाना पास है;
छाया और धूप एक जैसे हैं;
गायब हुए देवता मुझे दिखाई देते हैं;
और मेरे लिए शर्म और शोहरत एक हैं।
जो मुझे छोड़ देते हैं, वे बुरा समझते हैं;
जब वे मुझसे उड़ते हैं, तो मैं पंख हूँ;
मैं शक करने वाला और शक करने वाला हूँ,
मैं वह भजन हूँ जो ब्राह्मण गाता है।
ताकतवर देवता मेरे घर के लिए तरसते हैं,
और पवित्र सातों के लिए बेकार में तरसते हैं;
लेकिन हे अच्छे के दीन प्रेमी!
मुझे ढूंढो, और स्वर्ग से मुंह मोड़ लो।