जिस नेता को कार्यकर्ताओं पर विश्वास न हो उसका क्या हाल होगा?

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव के कंधे पर 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद से कोई न कोई बेताल सवार रहता है और उनसे प्रश्न पूछता है, जिसका उनके पास जवाब नहीं होता और वह भागने लगते हैं।
अखिलेश को हर समय डर सताता रहता है। उनको लगता है कि उनके खिलाफ षड्यंत्र हो रहा है। हाल ही में सपा के जिला और शहर अध्यक्षों की बैठक में उन्होंने कहा कि बूथ लेवल से चुनाव प्रचार शुरू कर दो। उनको आशंका है कि भाजपा चुनाव आयोग के जरिए एसआईआर के बाद एसएआर (स्पेशल एनुअल रिवीजन) करा सकती है। चुनाव आयोग हर साल जनवरी में जो लोग 18 साल के हो जाते हैं, उनको वोटर बनाने और अशुद्धियां सुधारने के लिए एसएआर कराता है। यह नॉर्मल प्रैक्टिस है और 1952 से चली आ रही है। यह हर प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर पर लोकसभा चुनाव में भी होती है। यह बात अखिलेश यादव को अच्छी तरह से मालूम है,लेकिन उन्हें तो भाजपा और चुनाव आयोग को बदनाम करना है इसलिए उन्होंने यह नया शिगूफा छोड़ा है। अखिलेश ने कहा कि भाजपा इसके जरिए छत्तीसगढ़ और बिहार से लोगों को लाकर यूपी में वोटर बनवाएगी। अब जो आदमी इतने चुनाव लड़ चुका हो और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य का मुख्यमंत्री रह चुका हो, उसे इतनी तो बेसिक जानकारी होनी चाहिए कि मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए क्या किया जाता है? कोई दूसरे राज्य का व्यक्ति उत्तर प्रदेश में मतदाता बनने के लिए क्यों आएगा? उसको उसमें क्या फायदा होने वाला है और मान लीजिए ऐसा हो भी तो कितने लोग आकर अपना नाम जुड़वाएंगे। उनका नाम जैसे ही यहां जुड़ेगा तो उनके अपने शहर की मतदाता सूची से उनका नाम अपने आप कट जाएगा, यह रिस्क कौन लेगा? अब ये सामान्य सी बातें समझने के लिए जो समझ चाहिए उसका अखिलेश में नितांत अभाव नजर आता है।
अखिलेश यादव को एक दूसरा डर भी है। वह भाजपा के आईटी सेल से परेशान हैं। जिस तरह उनकी सरकार के समय के कारनामों के वीडियो डाले जा रहे हैं,उससे उनकी नींद उड़ गई है। उनका मानना था कि चुनाव सिर्फ सोशल मीडिया के जरिए लड़ा जा सकता है तो वे पिछले नौ साल से सोशल मीडिया पर ही सक्रिय हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा को कुछ सफलता मिल गई तो उनको लगा कि यही जीत का मूल मंत्र है। कहीं जाने की जरूरत नहीं है। इसीलिए वह घर से नहीं निकलते। पार्टी दफ्तर या घर,इन्हीं दो जगह पर आपको अखिलेश यादव मिलेंगे। उनको लगता है कि जनता से संपर्क या संवाद करने की कोई जरूरत नहीं है। अगर उनको ही जाना पड़ेगा तो कार्यकर्ता क्या करेंगे? वह कार्यकर्ताओं को उनके परिवार की पालकी ढोने वाला समझते हैं। वैसे भी वह वंशवादी राजनीति में विश्वास करते हैं और परिवार के लोगों को सांसद व विधायक बनाते हैं। उनको ही राज्यसभा में भेजते हैं। पिछले दिनों उन्होंने बयान भी दिया था कि उनकी पार्टी इसलिए नहीं टूटी क्योंकि पांच सांसद तो उनके परिवार से ही हैं। अब जिस राज्य में 10 साल की सरकार की एंटी इनकंबेंसी हो, वहां सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी का सर्वेसर्वा इस तरह से डरा हुआ हो उससे आप अंदाजा लगा लीजिए कि पार्टी की स्थिति क्या है। यूपी की राजनीति एक तरह से बायपोलर हो गई है। सीधा मुकाबला भाजपा और समाजवादी पार्टी का है, लेकिन अखिलेश यादव तो अखाड़े में उतरने को ही तैयार नहीं है। वह अखाड़े से बाहर खड़े होकर ताल ठोक रहे हैं और उनको लगता है कि इसी से उनकी जीत हो जाएगी। अरे भाई, चुनाव जीतने के लिए चुनाव मैदान में उतरना पड़ेगा। लोगों के बीच जाना पड़ेगा। लेकिन अखिलेश यादव की जो नई राजनीतिक शैली है,उसमें ये सब बातें प्रतिबंधित हैं।
अखिलेश के पास सरकार के काम का कोई जवाब नहीं है। वह पिछले 9-10 साल में उत्तर प्रदेश के लोगों को यह नहीं बता पाए हैं कि लोग उनको क्यों चुनें? उनको शायद मालूम नहीं है कि उत्तर प्रदेश का मतदाता हमेशा इस आशंका से डरा रहता है कि कहीं समाजवादी पार्टी सत्ता में न आ जाए। इसलिए अखिलेश चाहे पीडीए बना लें या कुछ और, उससे कुछ होने वाला नहीं है। चुनाव जनता के विश्वास और भरोसे से जीते जाते हैं, लेकिन मतदाता आपसे डरा हुआ है। अखिलेश केवल कोर वोट मुस्लिम और यादव के भरोसे हैं, लेकिन आप देखिएगा कि 2027 का चुनाव सपा के लिए आखिरी है जिसमें उसका यह कोर वोट पक्का है। 2027 के बाद इसमें इतनी बड़ी टूट आएगी कि अखिलेश यादव उसका अंदाजा भी नहीं लगा पाएंगे क्योंकि तब उनकी उम्मीद अखिलेश यादव से खत्म हो जाएगी। अखिलेश के नेतृत्व में यूपी में पांच चुनाव लड़े गए हैं। इनमें से चार वह हारे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में परिस्थितियों के कारण सपा को सफलता मिली। लेकिन अगर उस एक अपवाद को वह नियम समझ रहे हैं तो मुझे लगता है कि वह बहुत बड़ी गलतफहमी में हैं। हाल ही में एक हरियाणवी गायक की हत्या के बाद उन्होंने कानून व्यवस्था को मुद्दा बनाने की बजाय जाति का मुद्दा बनाया और वह उल्टा पड़ गया। उन्होंने जयंत चौधरी के खिलाफ मोर्चा क्यों खोला, यह कोई नहीं बता सकता। इससे उन्होंने अपना कितना बड़ा नुकसान कर लिया है, उनको अंदाजा भी नहीं है। उनको शायद मालूम नहीं है कि पश्चिमी यूपी में यादव हैं ही नहीं। जाट को उन्होंने नाराज कर लिया। ऐसे में मुस्लिम अकेले क्यों उनके साथ रहेगा? वह मायावती के साथ क्यों नहीं जाएगा, जिनके पास पक्के 13-14% जाटव वोट हैं। जाटव और मुस्लिम का वहां बहुत सॉलिड कॉम्बिनेशन बनता है। वहां मुसलमानों के पास सिवाय बसपा के साथ जाने के कोई विकल्प ही नहीं है।
अखिलेश यादव का डर बता रहा है कि उनको अपनी हार अभी से दिखाई दे रही है। अभी तो चुनाव की अधिसूचना भी जारी नहीं हुई है और मुख्य विपक्षी टीम का कैप्टन भागने की तैयारी कर रहा है। वह रोज नए-नए डर खोज कर लाते हैं कि बीजेपी ऐसा कर देगी। जिस एसएआर का वह डर दिखा रहे हैं, उसमें आपके कार्यकर्ता क्या करेंगे? अगर बीजेपी अपने लोगों का वोट बनवा लेगी तो आप क्यों नहीं बनवाएंगे? क्या आपको अपने कार्यकर्ताओं पर विश्वास नहीं है? जिस नेता को अपने कार्यकर्ताओं पर विश्वास नहीं हो उसका क्या हाल होगा, यह आप यूपी के 2027 के विधानसभा चुनाव का जब नतीजा आएगा तब देखिएगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)