जयंत चौधरी को चवन्नी बताना अखिलेश को यूपी विधानसभा चुनाव में बहुत भारी पड़ेगा ।
चौधरी चरण सिंह उत्तर प्रदेश में जाटों के सबसे बड़े नेता थे। उनके और जाटों के साथ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने जैसा सूलूक किया वैसा शायद ही किसी नेता और सामाजिक समूह के साथ हुआ।
चौधरी चरण सिंह ने अपनी राजनीति कांग्रेस से शुरू की, लेकिन कांग्रेस से उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनने दिया। उन्होंने ही उत्तर प्रदेश में जमींदारी उन्मूलन का कानून बनाया, लेकिन वह कभी जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी को पसंद नहीं आए। वह मुख्यमंत्री तब बन पाए जब कांग्रेस कमजोर हो गई और कई राज्यों में संयुक्त विधायक दल की सरकारें बनीं। वह कांग्रेस के समर्थन बिना पहली बार मुख्यमंत्री 3 अप्रैल 1967 को बने और 17 अप्रैल 1968 तक रहे। दूसरी बार वह फरवरी 1970 से अक्टूबर 1970 तक मुख्यमंत्री रहे। उसके बाद वह कभी मुख्यमंत्री नहीं रहे। जनता पार्टी की सरकार में केंद्र में मंत्री बने और उसी समय प्रधानमंत्री भी बने। उसी समय से जाटों और कांग्रेस के बीच जो दूरी पैदा हुई, वह आज तक पट नहीं पाई। हुआ यूं था कि जब मोरारजी देसाई की सरकार 1979 में गिर गई तो चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। कांग्रेस ने समर्थन का भरोसा दिया, लेकिन जब पहली बार वह प्रधानमंत्री के रूप में लोकसभा जा रहे थे तभी कांग्रेस ने समर्थन वापस ले लिया। उसका कारणा था कि इंदिरा गांधी ने उनके सामने शर्त रखी थी कि उनके और उनके बेटे संजय गांधी के खिलाफ जितने मुकदमे हैं, वे वापस ले लिए जाएं। चौधरी चरण सिंह ने इसे मानने से मना कर दिया और इंदिरा गांधी ने समर्थन वापस ले लिया। उनकी सरकार अपना बहुमत साबित करने से पहले ही गिर गई। यह दूसरा घाव था जो कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह और जाट समाज को दिया। यह दूरी तब भी नहीं मिट पाई जब चरण सिंह के बेटे चौधरी अजीत सिंह कांग्रेस में शामिल हो गए और नरसिम्हा राव की सरकार और उसके बाद यूपीए की सरकार में मंत्री बने। जाटों ने उनके इस फैसले को स्वीकार नहीं किया। यही कारण है कि उसके बाद चौधरी अजीत सिंह राजनीति में कभी ऊपर नहीं चढ़ सके।
जाटों के साथ इसी तरह का व्यवहार मुलायम सिंह यादव के परिवार ने किया। चौधरी चरण सिंह मुलायम सिंह यादव को बहुत मानते थे। उन्होंने अपने बेहद करीबी चौधरी राजेंद्र सिंह को हटाकर मुलायम को अपनी पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया। 1980 में जब मुलायम सिंह यादव विधानसभा का चुनाव हार गए तो चौधरी राजेंद्र सिंह ने अपने सरकारी आवास में उन्हें रखा। दो साल बाद मुलायम विधान परिषद के सदस्य बने। तब तक चौधरी चरण सिंह का निधन हो चुका था। बाद में मुलायम ने उन्हीं चौधरी राजेंद्र सिंह को पार्टी से निकाल दिया, जिन्होंने दो साल तक उन्हें अपने घर में रखा था। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। मुलायम ने चौधरी राजेंद्र सिंह को पार्टी से निकाले जाने का पत्र बाय हैंड उस दिन उनके गांव भिजवाया, जिस दिन उनकी मां की तेरहवीं थी। यह है जाटों के साथ मुलायम सिंह यादव का संबंध। मुलायम यहीं नहीं रुके। उन्होंने चौधरी चरण सिंह के बेटे अजीत सिंह को कभी आगे बढ़ने नहीं दिया। मुलायम को मालूम था कि अगर चौधरी अजीत सिंह चौधरी चरण सिंह के राजनीतिक वारिस बन गए तो फिर उनकी राजनीति खत्म हो जाएगी। वीपी सिंह 1989 में चौधरी अजीत सिंह को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे, लेकिन मुलायम सिंह ने खेल खेला। उन्होंने कांशीराम की मदद से दलित विधायकों को अपने पाले में करके विधायक दल का चुनाव जीत लिया और खुद मुख्यमंत्री बन गए। जाटों से ऐसी ही दुश्मनी मुलायम के बेटे अखिलेश यादव ने निभाई। अखिलेश के मुख्यमंत्रित्व काल में 2017 में मुजफ्फरनगर में मुसलमानों और जाटों के बीच सांप्रदायिक दंगा हुआ। उस समय अखिलेश यादव की सरकार ने मुसलमानों का पक्ष लिया। दंगे के बाद जाटों का एक डेलीगेशन मुलायम सिंह यादव से मिलने गया। उसी डेलीगेशन में शामिल एक सदस्य ने पिछले दिनों एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला। उन्होंने कहा, हम जब मुलायम सिंह यादव से मिले और मांग की कि हमारे बच्चों पर से केस हटवाइए तो मुलायम सिंह यादव ने कहा, जाटों को जाकर बता देना कि मसलकर रख दूंगा। अखिलेश यादव की सरकार ने चुन-चुनकर जाट युवकों पर केस दर्ज करवाए। दंगों के दौरान आजम खान ने क्या-क्या किया,ये सारी कहानी इतिहास बन चुकी है। अखिलेश यादव का जयंत चौधरी पर हाल ही में जो बयान आया है कि मैंने चवन्नी को रुपया बना दिया,उसे इसी कड़ी में देखा जाना चाहिए।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों का कांग्रेस और मुलायम सिंह यादव के परिवार से बैर तब भी सामने आया जब चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत किसान आंदोलन कर रहे थे। उस समय कांग्रेस के वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री थे। टिकैत ने उनसे कोई समझौता नहीं किया। फिर मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तब भी टिकैत उनके खिलाफ रहे। कांग्रेस और मुलायम परिवार के जाटों के साथ बैर में एक निरंतरता है। 2022 में जरूर जयंत चौधरी कुछ समय के लिए अखिलेश यादव के साथ थे लेकिन तब भी जाट पूरी तरह से सपा के साथ नहीं गया। अयोध्या आंदोलन के बाद से जाट समाज में एक स्पष्ट विभाजन रेखा थी। एक बड़ा वर्ग भाजपा के साथ था और दूसरा चौधरी चरण सिंह के परिवार के साथ। अब जब जयंत चौधरी भाजपा के साथ हैं तो अखिलेश यादव का चौधरी परिवार और जाटों को घाव देने का जो शौक है, वह फिर से जाग गया। उन्हें कोई जरूरत नहीं थी कि जयंत चौधरी के बारे में ऐसा बोलते, लेकिन उन्होंने बोला। उनके मन में भड़ास थी कि जयंत चौधरी की हमें छोड़कर भाजपा के साथ जाने की हिम्मत कैसे हुई। जयंत चौधरी पहली बार केंद्र में मंत्री बने हैं तो भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार में बने हैं। राज्य सरकार में उनके मंत्री हैं। जयंत चौधरी को जो भाजपा के साथ रहकर मिल सकता है,वह अखिलेश यादव के साथ रहकर कभी नहीं मिल सकता। अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का पश्चिमी यूपी में कोई बड़ा जनाधार नहीं है। इसलिए आप देखिएगा कि 2027 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अखिलेश यादव का जयंत चौधरी पर दिया गया यह बयान सपा को बहुत भारी पड़ने वाला है। अखिलेश यादव की पार्टी के एक नेता ने ब्राह्मणों को वैश्या कहा। उनके एक सांसद ने राणा सांगा को गद्दार कहा। और उसके बाद अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी के लिए कहा कि चवन्नी को रुपया बना दिया। समाजवादी पार्टी की यह जो अपमान करने की राजनीति है, उसके कारण उसके साथ मुस्लिम-यादव कॉम्बिनेशन को छोड़कर कोई सामाजिक वर्ग नहीं जुड़ता। ओम प्रकाश राजभर इसका उदाहरण हैं। जब से जयंत चौधरी और ओम प्रकाश राजभर सपा को छोड़कर गए कोई नया सामाजिक समूह उसके साथ नहीं जुड़ा है। अखिलेश यादव हाथ-पैर मार रहे हैं। अब इसी तलाश में उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी की ओर हाथ बढ़ाया है। उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के आशुतोष रांका से दो घंटे बंद कमरे में मुलाकात की। कॉकरोच जनता पार्टी उनको उत्तर प्रदेश में अराजकता पैदा करने की कोशिश के अलावा और कुछ नहीं दे सकती है।
अखिलेश यादव की अभी तक की राजनीति तोड़ने की रही है, जोड़ने की नहीं। उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव में बसपा से गठबंधन किया था, लेकिन उनको कोई फायदा नहीं हुआ। बसपा का दलित वोट सपा के साथ नहीं गया। एकमात्र अपवाद 2024 का लोकसभा चुनाव रहा, जब दलितों के एक वर्ग ने सपा-कांग्रेस के गठबंधन को वोट दिया। अखिलेश यादव की सारी उम्मीद उसी पर टिकी है। उनको लगता है कि 2027 में भी यही होगा, लेकिन अब परिस्थितियां काफी बदल गई हैं। कॉकरोच जनता पार्टी से मुलाकात उनकी निराशा को दिखाती है। उनको समझ में आ गया है कि केवल कांग्रेस से गठबंधन से उनकी नैया पार नहीं लगा सकता। उनका जो मुस्लिम-यादव कॉम्बिनेशन है, उसमें मुस्लिम उस तरह से पुख्ता नहीं है जिस तरह से यादव है। उनके सामने यह भी दिक्कत है कि और जनाधार जोड़े कहां से? कांग्रेस से गठबंधन एक ही गारंटी देता है कि मुस्लिम वोट का बंटवारा नहीं होगा, लेकिन कांग्रेस कोई नया वोट नहीं जोड़ती है। इसी निराशा में उन्होंने भाषा की मर्यादा भुला दी है। उन्होंने यह जो जाटों के पुराने घाव को कुरेदा है,यह अब केवल जयंत चौधरी का मामला नहीं रह गया। जाट समाज को चौधरी अजीत सिंह के साथ मुलायम परिवार ने जो किया,वह भी याद आएगा। चौधरी चरण सिंह के साथ कांग्रेस पार्टी ने जो व्यवहार किया, वह भी याद आएगा। अखिलेश अगर ऐसा बयान न देते तो जाटों के मन में बदले और सबक सिखाने की भावना नहीं आती। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की स्थिति पहले भी बहुत मजबूत नहीं थी। अब उन्होंने उसको और कमजोर कर लिया है। कांग्रेस और सपा में कॉमन बात यह है कि दोनों हिंदू विरोधी हैं। हिंदू विरोध के मुद्दे पर उनका यह गठबंधन उन्हें कहां तक ले जाएगा, यह 2027 में पता चलेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












