सीजेपी नेताओं से बंद कमरे में मुलाकात के कई मायने निकाले जा रहे।
उत्तर प्रदेश में 2027 के फरवरी-मार्च में विधानसभा चुनाव होने वाला है। ऐसे में वहां की राजनीति में कई तरह की घटनाएं हो रही हैं। हाल ही में एक नई घटना हुई। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कॉकरोच जनता पार्टी के नेता आशुतोष रांका से लगभग डेढ़ घंटे तक बंद कमरे में मुलाकात की। अब आप देखिए कि स्थिति क्या हो गई है? कॉकरोच जनता पार्टी, जिसका यूपी में कोई आधार नहीं है,के नेता से यूपी का मुख्यमंत्री बनने की चाह रखने वाले अखिलेश यादव बंद कमरे में बात कर रहे हैं। यह बताता है कि या तो कॉकरोच जनता पार्टी की ताकत बहुत ज्यादा बढ़ गई है या अखिलेश यादव की ताकत बहुत ज्यादा घट गई है।
इस मुलाकात पर सुभासपा नेता ओम प्रकाश राजभर ने एक्स पर बड़ी मजेदार टिप्पणी की है। उन्होंने कहा है कि लाल वाला स्प्रे तिलचट्टों को खत्म करने के लिए होता है। यहां तो लाल वाले खुद ही तिलचट्टों की मदद मांग रहे हैं। अब इससे तीखा कटाक्ष अखिलेश पर हो नहीं सकता। लेकिन इस मुलाकात पर मेरा सवाल दूसरा है। कहीं अखिलेश यादव कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को झटका देने की तैयारी तो नहीं कर रहे हैं। आशुतोष रांका और अरविंद केजरीवाल में कोई फर्क नहीं है। केजरीवाल पर्दे के पीछे से काम कर रहे हैं और तिलचट्टा पार्टी आगे से काम कर रही है। यूपी में आम आदमी पार्टी या कॉकरोच जनता पार्टी का जनाधार क्या है? तो दूसरा प्रश्न उसी से निकलता है। फिर इस लंबी मुलाकात का क्या आधार है? जो पार्टी अभी तक रजिस्टर्ड भी नहीं है उसे अखिलेश यादव इतना महत्व क्यों दे रहे हैं। क्या वह राहुल गांधी को संदेश दे रहे हैं कि हम तुम्हारे भरोसे नहीं हैं। अखिलेश ने यह जो खेल शुरू किया है,वह सीधे-सीधे कांग्रेस पार्टी को चुनौती है। फिलहाल कॉकरोच जनता पार्टी, चंद्रशेखर रावण और राहुल गांधी में होड़ लगी हुई है कि कौन कितनी ज्यादा अराजकता और समाज में विद्वेष पैदा कर सकता है। उस रेस में अखिलेश यादव बहुत पीछे हैं। लेकिन अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में राहुल गांधी की तुलना में बहुत मजबूत हैं। यूपी में कांग्रेस अखिलेश यादव पर निर्भर है। वैसे कुछ हद तक अखिलेश यादव भी कांग्रेस पर भी निर्भर हैं क्योंकि उनको डर है कि अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन न किया तो मुस्लिम वोट बंट न जाए। दूसरा, 37 लोकसभा सदस्यों के बावजूद अखिलेश यादव राजनीति में कोई नेशनल नैरेटिव नहीं बना पाए हैं। अगर उन्हें नेशनल नैरेटिव बनाना है कि उन्हें कांग्रेस के पीछे खड़ा होना होगा। उसके अलावा कोई ऑप्शन नहीं है और इसी के बल पर वह चाहते हैं कि राहुल गांधी उनसे गठबंधन करें जिससे मुस्लिम वोटों के बंटने का खतरा खत्म हो जाए। लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है। अभी बहुजन समाज पार्टी की नेता मायावती ने अपने पत्ते नहीं खोले नहीं है। चर्चा है कि वह ओवैसी की पार्टी से गठबंधन कर सकती हैं। दोनों के अपने-अपने लक्ष्य हैं। मायावती चंद्रशेखर रावण की पार्टी आजाद समाज पार्टी को राजनीतिक रूप से खत्म करना चाहती हैं जबकि असदुद्दीन ओवैसी का लक्ष्य मुस्लिम वोट तोड़कर अखिलेश यादव को सबक सिखाना है। दोनों में अगर समझौता हो जाता है तो पश्चिमी यूपी में अखिलेश यादव के साथ न तो मुसलमान होगा और न ही जाटव। जाट और अति पिछड़ी जातियों का बहुमत पहले ही भाजपा के साथ है। ऐसे में अखिलेश बिल्कुल खाली हाथ रह जाएंगे।
कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं के साथ बातचीत से अखिलेश यादव को सियासी रूप से कोई फायदा होने वाला नहीं है। फिर सवाल है कि वह ऐसा क्यों कर रहे हैं? सिर्फ इसलिए ताकि नेशनल पॉलिटिकल नैरेटिव में उनका नाम ऊपर आ सके। दूसरा वे राहुल गांधी से अपना पिंड छुड़ा सकते हैं। उनको मालूम है कि राहुल गांधी या कांग्रेस पार्टी का उत्तर प्रदेश में कुछ नहीं है। केवल उनके मन में एक डर बिठाया हुआ है कि कांग्रेस अलग लड़ गई तो मुस्लिम वोट काट देगी। देखना है कि अखिलेश यादव इस खतरे को कितनी गंभीरता से लेते हैं। क्या उनको लगता है कि सीजेपी या आम आदमी पार्टी से गठबंधन करके उनको कुछ फायदा मिल सकता है। या उनको लगता है कि राहुल गांधी को मजबूर होकर उनकी शरण में आना पड़ेगा। कोशिश तो वह कर रहे हैं। 2027 के लिए अखिलेश यादव को ममता बनर्जी से बड़ी उम्मीद थी। लेकिन पश्चिम बंगाल में ममता की हार और उसके बाद उनकी पार्टी का जो हाल हुआ, उसने अखिलेश यादव को अंदर से तोड़ दिया है। उनका आत्मविश्वास हिल गया है। अब वह जैसे तिनके का सहारा खोज रहे हैं। आशुतोष रांका से उनकी मुलाकात इसी प्रयास का नतीजा है। अखिलेश के पास भाजपा को तो छोड़िए,ओम प्रकाश राजभर के सवालों का भी जवाब नहीं है। वह राजभर के राजनीतिक तीरों से घायल हो रहे हैं,लेकिन कुछ कर नहीं पा रहे हैं। उसकी बड़ी वजह भी है। अगर ओम प्रकाश राजभर अति पिछड़ा समाज से न होते तो अखिलेश के लिए उन पर हमला करना बड़ा आसान हो जाता। अखिलेश यादव में अगर थोड़ी भी राजनीतिक समझ होगी तो पछता रहे होंगे कि राजभर की पार्टी से 2022 का गठबंधन क्यों तोड़ा? उन्होंने इस गठबंधन को तोड़कर सिर्फ अपना नुकसान और भाजपा का फायदा कराया है। जब 2027 के विधानसभा चुनाव का नतीजा आएगा तो उनको अहसास होगा कि उन्होंने 2022 के चुनाव के बाद सबसे बड़ी गलती क्या की थी।
आशुतोष रांका, अभिजीत दीपके और अरविंद केजरीवाल सात जन्म में भी अखिलेश यादव को सत्ता में नहीं पहुंचा सकते हैं। यह तो स्पष्ट हो गया है कि यह मुलाकात यूपी विधानसभा का चुनाव जीतने के लिए नहीं हो रही है। इसका एक ही निष्कर्ष निकलता है। यह राहुल गांधी की राजनीति के गुब्बारे को पंक्चर करने के लिए है। क्या अखिलेश यादव पीछे से राहुल गांधी पर हमला करने के लिए तैयार हो गए हैं? इसके कारण यह गठबंधन का सवाल खुल गया है। हालांकि मुझे लगता नहीं कि दोनों के पास गठबंधन न करने का कोई विकल्प है। इसके बावजूद राजनीति संभावनाओं का खेल है। अखिलेश यादव कौन सी संभावना तलाश रहे हैं,यह कम से कम अभी समझ में आना मुश्किल है। आशुतोष रांका और अरविंद केजरीवाल के पास यूपी में वोट भले न हो, लेकिन उनके पास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो उनके पक्ष में राष्ट्रीय स्तर का नैरेटिव खड़ा कर सकें। वह नैरेटिव तभी खड़ा होगा जब वे राहुल गांधी को गिराएंगे। वैसे अखिलेश रोज सुबह उठकर एक कुल्हाड़ी अपने पैर पर मार लेते हैं। क्या अब वह राहुल गांधी के पैर पर भी कुल्हाड़ी मारने को तैयार हो गए हैं। इस सवाल का जवाब आने वाले कुछ दिनों में मिलेगा।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)













