असहमति जताने वालों को पार्टी और सरकार से बाहर कर दिया।
भारत ने आजादी के बाद पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी का जो सिस्टम चुना कैबिनेट प्रणाली उसका महत्वपूर्ण हिस्सा थी, लेकिन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू मंत्रिमंडल में अपनी स्थिति को लेकर बहुत असहज थे। उसका कारण था कि उनको सत्ता के बंटवारे में विश्वास नहीं था। वह चाहते थे कि सब कुछ उनके हाथ में रहे। कैबिनेट उनके नियंत्रण में रहे पर ऐसा हो नहीं रहा था। नेहरू को लगता था कि जितने महत्वपूर्ण मामले कैबिनेट में आते थे, उन पर कैबिनेट की राय सरदार पटेल के साथ होती थी। नेहरू इससे बहुत परेशान रहते थे।
इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक पूर्व अधिकारी आरएनपी सिंह ने अपनी किताब नेहरू: ए ट्रबल्ड लिगेसी में इसका विस्तार से जिक्र किया है कि कब-कब उन्होंने कैबिनेट की उपेक्षा की। सरदार पटेल के निधन के बाद तो नेहरू को रोकने वाला कोई रह ही नहीं गया था इसलिए वह बड़े मुद्दे कैबिनेट में लेकर आते ही नहीं थे। बाहर फैसला करके फिर कैबिनेट को सूचित करते थे। इसी रास्ते पर इंदिरा गांधी भी चलीं क्योंकि जब उन्होंने देश में इमरजेंसी लगाई थी तो उसकी घोषणा पहले राष्ट्रपति के यहां से हो गई और कैबिनेट में प्रस्ताव अगले दिन सुबह आया। आजादी के बाद जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह का मुद्दा बेहद अहम था,लेकिन इस मामले में नेहरू ने कैबिनेट की कोई सलाह नहीं ली। इसके बारे में कांग्रेस के बड़े नेता और यूनाइटेड प्रोविंस के गृह मंत्री रहे डीपी मिश्रा ने लिखा है। वह बाद में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री भी बने। मिश्रा ने लिखा है कि 26 अक्टूबर 1947 को जब भारत ने कश्मीर के विलय को स्वीकार किया तब उनकी दिल्ली में सरदार पटेल से मुलाकात हुई। सरदार पटेल ने उन्हें बताया कि सुबह से जम्मू कश्मीर के विलय के मुद्दे पर बैठकें चल रही थीं, उसी में वह व्यस्त थे। मिश्रा जब दूसरे दिन नागपुर पहुंचे तो उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो पर जो खबर सुनी तो वह चौंक गए। रेडियो पर जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि वह जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह के लिए प्रतिबद्ध हैं। जबकि उनकी सरदार पटेल से जो मुलाकात हुई थी, उसमें पटेल ने ऐसा कोई जिक्र नहीं किया था। मिश्रा के अनुसार बाद में दिल्ली लौटकर उन्होंने सरदार पटेल से पूछा था कि जनमत संग्रह का मुद्दा क्या कैबिनेट में आया था। इस पर सरदार पटेल ने गहरी सांस लेते हुए कहा ‘नहीं।’ मिश्रा लिखते हैं कि इससे स्पष्ट था कि नेहरू ने अपने साथियों की बजाय माउंटबेटन की बात को स्वीकार किया।
डीपी मिश्रा लिखते हैं- नेहरू चाहते थे कि धर्मनिरपेक्षता का पालन सिर्फ हिंदू करें और हैदराबाद मामले में मुसलमानों को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए क्योंकि वह हिंदू बहुल इलाका है। लेकिन नेहरू यही बात जम्मू कश्मीर के मामले में भूल गए, जो मुस्लिम बहुल इलाका था। नेहरू हैदराबाद में तो मुसलमानों की चिंता कर रहे थे, लेकिन जम्मू कश्मीर में हिंदुओं की चिंता नहीं की और उनके अधिकारों को भूल गए। नेहरू ने यह सब जम्मू कश्मीर में अपने दोस्त शेख अब्दुल्ला को खुश करने के लिए किया। नेहरू हैदराबाद में फोर्स के इस्तेमाल के भी खिलाफ थे। इसका जिक्र डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया है। कैबिनेट की बैठक में जब ये प्रस्ताव पास हो गया कि हैदराबाद फोर्स भेजी जाएगी तो नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को बुलाया और चेतावनी दी कि कैबिनेट में इस मुद्दे पर तुम लोग सरदार पटेल के साथ हो गए। याद रखो कि पाकिस्तान जल्दी ही कोलकाता पर बम गिराएगा। इस पर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने नेहरू से कहा कि कोलकाता और बंगाल के लोगों में राष्ट्रभक्ति इतनी ज्यादा है कि वे कोई भी बलिदान देने को तैयार हैं।
नेहरू किस तरह से अपनी मनमानी चलाते थे, यह नानावटी केस से भी पता चलता है। केएम नानावटी को हत्या के आरोप में बॉम्बे हाईकोर्ट से आजीवन कारावास की सजा हुई थी। हाईकोर्ट का फैसला आने के कुछ ही घंटे के अंदर बॉम्बे के गवर्नर ने आर्टिकल 161 के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते इस फैसले पर तब तक के लिए रोक लगा दी, जब तक नानावटी की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला नहीं आ जाता। इस पर अटर्नी जनरल सीतलवाड़ ने कहा कि यह फैसला गवर्नर ने नेहरू का फोन आने के बाद किया। सुप्रीम कोर्ट में जब यह मामला गया तो उसने गवर्नर के फैसले को इनवैलिड करार दिया, लेकिन नेहरू पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। वह सर्वशक्तिमान होना चाहते थे। सरदार पटेल के निधन के बाद तो कैबिनेट शो पीस बनकर रह गई थी। बंगाल के बेरूबारी का एक हिस्सा पाकिस्तान को देने से पहले नेहरू ने कैबिनेट या वहां के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय की सलाह तक लेना जरूरी नहीं समझा। राज्यों के बीच नदी जल बंटवारे को लेकर नेहरू कोई फैसला नही करवा पाए और उसका खामियाजा आज भी कई राज्य भुगत रहे हैं। इसी तरह मैक्सवेल ने लिखा है कि चीन के साथ सीमा विवाद के मुद्दे को नेहरू ने कैबिनेट, डिफेंस की कमेटी और यहां तक कि संसद से तब तक छिपाया जब तक भारत-चीन के बीच युद्ध नहीं छिड़ गया। नेहरू की नीतियों को लेकर उनके कई मंत्रियों ने साथ छोड़ दिया था। पाकिस्तान की नीति के विरोध में श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस्तीफा दिया। फिर केसी नियोगी ने इस्तीफा दिया और बाद में डॉक्टर अंबेडकर ने भी यह आरोप लगाते हुए इस्तीफा दे दिया कि नेहरू को उन पर विश्वास नहीं है। जॉन मथाई ने नेहरू के कामकाज के तरीके के विरोध में कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया था। इसका नतीजा यह हुआ कि कैबिनेट में नेहरू का विरोध करने वाला कोई नहीं रह गया। डीपी मिश्रा ने तो इस्तीफा देते हुए जो बात लिखी वह जरूर याद रखी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर नेहरू को अधिनायक के रूप में स्थापित करने की कोशिश हुई तो पूरी एशिया से डेमोक्रेसी खत्म हो जाएगी। नेहरू की नजर में उनसे ज्यादा योग्य कोई नहीं था। इसीलिए वह किसी से सलाह नहीं लेते थे। जब तक सरदार पटेल जीवित रहे,सिर्फ वही अकेले ऐसे थे जो नेहरू की कोई परवाह नहीं करते थे। उन्हें जो सही लगता था, वह करते थे और कैबिनेट में सारे लोग उनका साथ भी देते थे, लेकिन नेहरू को यह कभी पसंद नहीं आया। इसीलिए सरदार पटेल के निधन के बाद नेहरू ने ऐसे सभी लोगों को कैबिनेट और यहां तक कि पार्टी से बाहर कर दिया जो उनकी बात से असहमति जताते थे। जयप्रकाश नारायण, आचार्य कृपलानी, राजगोपालाचारी और केएम मुंशी तक को पार्टी से अलग होना पड़ा।
तो नेहरू को जो कहा जाता है कि बहुत बड़े डेमोक्रेट थे, उनकी असलियत कुछ और थी। वह दरअसल डेमोक्रेट के भेष में एक डिक्टेटर थे। उन्होंने डेमोक्रेसी को डिक्टेटरशिप की तरह चलाया। किसी की नहीं सुनी और इसीलिए उनके फैसलों का परिणाम देश आज तक भुगत रहा है। इसके बारे में कांग्रेसी इतिहासकार आपको नहीं बताते। आज भी बहुत से लोग चर्चा करते हैं कि अगर सरदार पटेल प्रधानमंत्री बन गए होते तो देश की तस्वीर दूसरी होती,यह बिल्कुल सही बात है। तब देश में डेमोक्रेसी का एक अलग ही स्वरूप होता।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












