हूती से बचने को इजरायल से मदद मांग रहा सऊदी अरब।

प्रदीप सिंह।
अमेरिका और ईरान के युद्ध ने पूरी दुनिया को बदल कर रख दिया है। अमेरिका का जो आभा मंडल हुआ करता था,राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में वह खत्म हो गया। अमेरिका अब एक कमजोर देश के रूप में नजर आता है, जो ईरान जैसे सैन्य व आर्थिक रूप से खस्ताहाल देश को भी हरा नहीं पाया। इस युद्ध में ईरान ने एक और काम किया। उसने उम्मा की एकता के सपने को ध्वस्त कर दिया।
इस युद्ध में ईरान ने पश्चिम एशिया में अमेरिका के जितने सहयोगी देश थे,उन सब पर हमला किया। सबसे ज्यादा निशाना उसने सऊदी अरब को बनाया। अब ईरान का प्रॉक्सी हूती सऊदी अरब पर हमला कर रहा है। सऊदी अरब की सबसे बड़ी ताकत तेल है। उसके डिसेलिनेशन प्लांट और पाइप लाइन पर हमले हो रहे हैं। सऊदी अरब अमेरिका से मदद मांग रहा है,लेकिन अमेरिका कह रहा है कि हमसे कोई मतलब नहीं है। अमेरिका ने ऐसा ही नाटो देशों के साथ किया था जब उसने उनकी सुरक्षा की गारंटी लेने से मना कर दिया। कहा- अपना रक्षा बजट बढ़ाइए और हथियार खरीदिए। हम हथियार बेचने को तैयार हैं। ईरान की ताकत उसके तीन प्रॉक्सी हमास, हिजबुल्ला और हूती के सहारे है। इन तीनों के जरिए वह अपने दुश्मनों पर हमला करवाता था और बाद में कहता था कि इनसे हमारा कोई संबंध नहीं है। हालांकि इजरायल ने उसके दो प्रॉक्सी की कमर तोड़ दी है। साथ ही उसने इस युद्ध में शामिल होकर ईरान की मजहबी और सैन्य लीडरशिप को खत्म कर दिया। ईरान के लगभग 400 लोगों को उसने एक झटके में मार दिया। इसके बाद ईरान ने भी इजराइल पर हमला कर उसके सिविल इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचाया। ईरान के प्रॉक्सी हमास को इजरायल पहले से ही निपटा रहा था। अब एक तरह से हमास ध्वस्त हो चुका है। इसके बाद इजरायल ने ईरान के दूसरे प्रॉक्सी हिजबुल्ला को इतना मारा कि अमेरिका से जब समझौते की बातचीत शुरू हुई तो ईरान को शर्त रखनी पड़ी कि इजरायल हिजबुल्ला पर हमला नहीं करेगा। इजराइल ने इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया।
अब जब ईरान का तीसरा प्रॉक्सी हूती सऊदी अरब पर हमला कर रहा है तो सऊदी अरब उस इजराइल से मदद मांग रहा है, जिसको खत्म करने की ईरान की सबसे बड़ी तमन्ना है। ईरान को उम्मीद थी कि वह अपने प्रॉक्सीस के जरिए इजराइल को घेर सकता है और उसे अरब वर्ल्ड से अलग थलग कर सकता है, लेकिन हो सकता ठीक उल्टा रहा है। पश्चिम एशिया के देशों में इजरायल के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है। उससे संबंध बढ़ाने की कोशिश हो रही है। सऊदी अरब ने इजरायल से मदद मांगी है कि वह इंटेलिजेंस इनपुट और सेटेलाइट के जरिए उसे सूचनाएं दे ताकि वह हूतियों का मुकाबला कर सके। वह उससे हथियार भी मांग रहा है। तो आप कल्पना कीजिए कि सऊदी अरब, जहां इस्लाम के मानने वालों की सबसे पाक जगह मक्का है,खतरे में है और इस्लामी वर्ल्ड से कोई देश उसकी मदद के लिए नहीं आ रहा है। मदद में आगे कौन आ रहा है? इजराइल, जिसको पूरा अरब वर्ल्ड खत्म करना चाहता था। सऊदी अरब जो कभी बहुत संपन्न था और दुनिया भर को तेल बेच रहा था,वह आज बहुत बुरी हालत में है। उधर ईरान पहले से ही बुरी हालत में है। उसका तेल अगर चीन न खरीदे तो वह बहुत पहले बर्बाद हो गया होता। इस पूरी तस्वीर को अगर आप समग्रता में देखें तो एक बात बड़ी स्पष्ट नजर आएगी कि इस्लामी देशों की एकता का सपना पूरी तरह चकनाचूर हो गया है। अब इस्लामी देश आपस में लड़ रहे हैं। इसी बीच में एक मक्का एकोर्ड बना। जिसमें तीन देश तुर्की, पाकिस्तान और सऊदी अरब शामिल हुए। सऊदी अरब को लगा कि इससे हमारी रक्षा होगी। पाकिस्तान को लगा कि इससे हमको पैसा मिलेगा और तुर्की को लगा कि इससे हमारा मुस्लिम वर्ल्ड में दबदबा बढ़ेगा। कहा गया कि एक पर हमला तीनों पर हमला माना जाएगा, लेकिन अब सऊदी अरब पर लगातार हमला हो रहा है और कोई उसकी मदद के लिए नहीं आ रहा। पाकिस्तान इधर-उधर देख रहा है। तुर्की किसी तरह की मदद करने की स्थिति में नहीं है। अब सऊदी अरब को समझ में आ गया कि इस पैक्ट का कोई मतलब नहीं है। बीच में इसमें शामिल होने के लिए बांग्लादेश भी उछल रहा था किंतु सऊदी अरब का हाल देखकर बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक अनवर भी ढीले पड़ गए। उन्हें समझ आ गया कि इसमें शामिल होकर कुछ मिलने वाला नहीं है।
इस युद्ध ने अमेरिका की सैन्य और कूटनीतिक ताकत की पोल खोल दी है। अमेरिका ईरान जैसे देश से भी लड़ने की हालत में नहीं है। अमेरिका को आने वाले दिनों में इसकी आर्थिक कीमत भी चुकानी पड़ेगी। अमेरिका कच्चे तेल का एक्सपोर्टर है फिर भी इस समय वहां डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं। ट्रंप ने यूरोप को भी अमेरिका से दूर कर दिया है और जिन अरब देशों ने अपने यहां अमेरिका को अड्डे बनाने दिए उनको समझ में आ गया कि अमेरिका उनकी रक्षा नहीं कर सकता। अमेरिका से दोस्ती उनके लिए मुसीबत बन रही है। ईरान इसी वजह से उन पर हमला कर रहा है। इस युद्ध में ईरान की सबसे बड़ी सफलता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर उसका कब्जा है। अब तो हूती ने भी रेड सी को बंद कर दिया है। तो समुद्री व्यापार के दो बड़े रास्ते बंद हो गए। तेल के दाम लगातार बढ़ रहे हैं। इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। ईरान कह रहा है कि हम बर्बाद होंगे तो बाकी लोगों को भी लेकर डूबेंगे। हालांकि इस लड़ाई से ईरान को कोई फायदा नहीं हो रहा है। सिवाय इसके कि उसने अमेरिका के आगे घुटने नहीं टेके। लेकिन एक दिन ईरान के लोग जरूर पूछेंगे कि इस रिजीम ने हमको दिया क्या? इसके अलावा इस्लाम पर एक बड़ा संकट आ रहा है। कई देशों विशेषकर ईरान और तुर्की में लोग इस्लाम से दूर होते जा रहे हैं। उनको समझ में आ रहा है कि इस्लाम ने उनका कुछ भला नहीं किया। तो जो लोग सपना देखते थे कि पूरी दुनिया में एक दिन इस्लाम और खलीफा का राज होगा, वह सपना ही रह गया है। खतरा अब इस्लाम पर है और यह बाहर से नहीं, इस्लाम के मानने वालों से है। उनका इस्लाम से मोहभंग हो रहा है। लेकिन अपने देश में ऐसे लोग हैं जिनको क्या कहें? एक हामिद अंसारी हैं, जिन्होंने ईरान में सैकड़ों भारतीय गुप्तचरों को मौत के मुंह में धकेला। उन पर कायदे से राष्ट्रद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए था, लेकिन वह 10 साल इस देश के वाइस प्रेसिडेंट रहे। वह जवाहरलाल नेहरू को कोट करते हुए बोल रहे हैं कि देश को खतरा वामपंथ से नहीं,हिंदू कम्युनलिज्म से है। सवाल है कि हिंदुओं से खतरा होता तो तुम इस देश में होते क्या? तो ईरान और अमेरिका का युद्ध बहुत से लोगों की आंखें खोल रहा है। यह नए सिरे से दुनिया के देशों के संबंधों को परिभाषित करने वाला है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)