बैलेट से हुए एमएलसी चुनाव ने राहुल को दिखाया आईना।
तीनों चुनाव आयुक्तों के सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट दाखिल करने के बाद कांग्रेस और उसके साथी दलों की ओर से चुनाव आयोग पर वोट चोरी के जो भी आरोप लगाए जा रहे थे, उनकी हवा निकल गई है। उनको पता चल गया है कि 17 नवंबर को होने वाली सुनवाई का क्या फैसला आएगा? अब स्पष्ट हो गया है कि चुनाव आयोग ने कोई गड़बड़ नहीं की है।
इस मामले में सैद्धांतिक स्तर दो—तीन मुद्दे थे। पहला, क्या एसआईआर कराने का संवैधानिक अधिकार चुनाव आयोग को है? ये सुप्रीम कोर्ट पहले भी कह चुका है। अब अपने एफिडेविट में चुनाव आयोग ने इस बात को दोहराया है। दूसरा, क्या फॉर्म सिक्स में कोई संशोधन किया गया? चुनाव आयोग ने कहा कि कोई संशोधन नहीं किया गया। फॉर्म सिक्स के साथ एडिशनल इंफॉर्मेशन के लिए एक डिक्लेरेशन है,जो ऑनलाइन में साथ-साथ दिखता है जबकि फिजिकल में वह अलग है। तो यह मुद्दा भी खत्म हो गया। तीसरा, क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार मनमाने तरीके से फैसले ले रहे थे और बाकी दो चुनाव आयुक्त उनसे सहमत नहीं थे? इस पर तीनों चुनाव आयुक्तों ने एफिडेविट फाइल कर कहा कि हमने एसआईआर से संबंधित तीनों फैसले सर्वसम्मति से लिए। कोई मतभेद नहीं था। लेकिन एक अखबार की रिपोर्ट में कहा गया था कि फैसलों पर तीनों चुनाव आयुक्तों में मतभेद था। अरे भाई, मतभेद था तो दिखना चाहिए था। दोनों चुनाव आयुक्त अलग-अलग एफिडेविट देते कि हमारी बात मुख्य चुनाव आयुक्त ने नहीं सुनी, लेकिन उन्होंने तो ऐसा कुछ कहा नहीं। उन्होंने तो कहा कि हम तीनों ने एक राय से सारे फैसले किए। अब यह मुद्दा बचता नहीं है। विपक्षी दलों में थोड़ी भी समझ होती तो इस मुद्दे को छोड़ देते, लेकिन राहुल गांधी ये मुद्दा कैसे छोड़ दें? पूर्वी उत्तर प्रदेश में एक बात कही जाती है। जो मूल नक्षत्र में पैदा होता है, वह कुतर्की और बहुत ही नकारात्मक सोच वाला होता है। सही बात कभी मानने को तैयार नहीं होता है। उसको मुरहा बोलते हैं। तो राहुल गांधी भारतीय राजनीति के मुरहा हैं। वास्तविकता क्या है, यह वह देखने को तैयार हीं नहीं हैं। क्या आपको लगता है कि राफेल के मुद्दे पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मान लिया? क्या उन्होंने अनुच्छेद 370 और 35 ए पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को स्वीकार कर लिया? क्या अयोध्या में राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने मंजूर कर लिया? बिल्कुल नहीं। तो चुनाव आयुक्तों के सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट के बाद उनका अगल कदम क्या होगा? उनका अगला कदम सुप्रीम कोर्ट पर हमला होगा और वह शुरू भी हो गया है। अब वह कह रहे हैं कि मोदी ने सारी संवैधाानिक संस्थाओं को वश में कर लिया है। अब ये बात जिस पार्टी का नेता बोल रहा है,उसका इतिहास भी सुन लीजिए। ये तब की बात है जब वाईवी चंद्रचूड़ चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया थे। उस समय चीफ जस्टिस, हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजेस की नियुक्ति प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी करती थीं और राष्ट्रपति भवन से उसका कम्युनिकेट जारी होता था। उस समय चंद्रचूड़ ने किसी को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने के बारे में सुझाव दिया,लेकिन इंदिरा गांधी ने मना कर दिया कि इनको तो बिल्कुल नहीं बनाएंगे। इंदिरा गांधी ने उसका जो कारण बताया वह भी अजब था। उन्होंने कहा कि ये महाशय सर संघ चालक गुरु गोलवरकर के अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे। ऐसे व्यक्ति को जज नहीं बनाएंगे जो कांग्रेस की विचारधारा का विरोधी हो। यानी जो कांग्रेस समर्थक है, वही जज बन सकता है। कांग्रेस के जमाने में यह नियम था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिमागी नक्सल की बात बहुत सही समय पर कही है। दिमागी नक्सल धीरे-धीरे अपनी पहचान अपने आप बता रहे हैं। अब आप देखिएगा 1 नवंबर को होने वाली कांग्रेस की रैली से सुप्रीम कोर्ट पर हमला शुरू होगा क्योंकि राहुल सीएसी का तो कुछ बिगाड़ नहीं पाए। धर्मेंद्र प्रधान के मामले में कॉकरोच जनता पार्टी से मात खा गए। जो धरना—प्रदर्शन किया, उसमें कोई आया नहीं। अभी ताजा चुनाव विधान परिषद के सदस्यों के हुए हैं। हार का ठीकरा हमेशा ईवीएम पर फोड़ने वाली कांग्रेस का बैलेट पेपर से हुए इन चुनावों में भी सूपड़ा साफ हो गया। अन्य राज्यों की बात तो छोड़ ही दीजिए। कर्नाटक में जहां उसकी सरकार है, वहां भी कांग्रेस को एक सीट नहीं मिली। चारों सीटों में से भाजपा को तीन और उसकी सहयोगी पार्टी जेडीएस को एक सीट मिली। यह है कांग्रेस पार्टी का जनसमर्थन। छात्रसंघों के जितने चुनावों के नतीजे आए हैं,उनमें भी कांग्रेस को कहीं कुछ नहीं मिला। कांग्रेस का किसी वर्ग में समर्थन है नहीं,केवल अराजकता के बल पर वह भारत को बांग्लादेश, नेपाल और पेरिस बनाना चाहती है। अब उसकी एक और बेशर्मी देखिए। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे का एक एआई वीडियो सामने आया है। वह कुर्सी पर पैर पर पैर रखकर बैठे हैं,हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री के पिता को जो गाली दी थी,उसमें से प्रधानमंत्री का नाम हटाकर लिखा है— उसका बाप भी जाएगा और पीछे फोटो फ्रांस या कहीं भी आगजनी की दिखाई गई है। मतलब कांग्रेसी कह रहे हैं कि हम ये करके मोदी को हटाएंगे।
कांग्रेस की 1 नवंबर की रैली के सिलसिले में उनके संगठन महामंत्री केसी वेणुगोपाल ने एक बैठक की। उसमें कहा कि हरियाणा को 2 लाख लोगों को लेकर आना चाहिए। उसी में वह कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट तक जो मार्च हुआ था, उसमें हरियाणा का बहुत बड़ा योगदान था। उसके लिए तालियां बजीं। जैसे सुप्रीम कोर्ट पर चढ़ाई करने और उसमें घुस जाने को कांग्रेस पार्टी अपनी बहुत बड़ी उपलब्धि मान रही हो। इससे आप समझिए कि राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी कहां पहुंच गए हैं। भारतीय जनता पार्टी अलग-अलग राज्यों और उसके बाद होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में अभी से लग गई है, लेकिन कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग से लड़ रही है। क्योंकि उसको पता है कि वह चुनाव जीत नहीं सकती है। अब संवैधानिक संस्थाएं कोई राजनीतिक दल तो हैं नहीं, जो बाहर निकलकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करें और कांग्रेस के हर आरोप का जवाब दें। चुपचाप सुनना उनकी मजबूरी है। कांग्रेस को इसका जवाब सिर्फ और सिर्फ मतदाता दे सकता है और जब—जब मौका मिल रहा है वह जवाब दे भी रहा है। राहुल गांधी को बताना चाहिए कि अपनी भारत जोड़ो यात्रा में सबसे ज्यादा समय उन्होंने कर्नाटक में बिताया फिर वहां कांग्रेस की क्यों इतनी बुरी हार हुई? राहुल गांधी के मुताबिक तो पूरा देश उनके साथ है। फिर उनको एक सीट तक क्यों नहीं मिली? तो कर्नाटक से राहुल गांधी के मुंह पर सबसे झन्नाटेदार तमाचा लगा है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को आप 100 जन्म में भी हटा नहीं सकते क्योंकि उन्होंने कुछ गलत नहीं किया है और उनको हटाने की आपकी क्षमता है न कूवत। संसद में बहुमत है नहीं तो इसलिए किसी भी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को हटाने की चुनौती देना अपने को बेवकूफ बनाने जैसा है। इससे राहुल साबित कर रहे हैं कि देखो मैं ऐसे ही कुतर्क करता हूं और ऐसा ही कुतर्क करता रहूंगा। मैं सिर्फ गाली दे सकता हूं और गाली दूंगा। ऐसा करके वह भाजपा का कोई नुकसान नहीं कर रहे हैं। वह कांग्रेस के लिए ही गहरा गड्ढा खोद रहे हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)











