वोट चोरी पर राष्ट्रपति को कोई सबूत तो दे नहीं पाए लेकिन गढ़ दिया झूठा नैरेटिव।
कुछ लोगों की मूर्खता उनके वचन और कर्म से जाहिर हो जाती है, लेकिन कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो अपनी अज्ञानता का ढिंढोरा पीटते हैं। उसे एक मेडल के रूप में लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। राहुल गांधी ऐसे ही नेता बन गए हैं।
राहुल गांधी कहने को तो नेता प्रतिपक्ष हैं, लेकिन उनमें एक भी नेता प्रतिपक्ष वाला गुण नहीं है। उन्हें संसदीय प्रणाली और संवैधानिक व्यवस्था की कोई समझ नहीं है। संवैधाानिक पदों पर बैठे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए,इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं है। लेकिन अब वह नेता प्रतिपक्ष हैं तो सरकार, सारी संस्थाओं और संसद को मानना तो पड़ेगा। 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ था तो पहली बार नेता प्रतिपक्ष बना था,लेकिन तब उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा नहीं मिलता था। यह परंपरा 1977 में जनता पार्टी की सरकार ने शुरू की। मोरारजी की सरकार ने यह व्यवस्था की कि अगर आपके पास लोकसभा की कुल सीटों का 10% है तो नेता प्रतिपक्ष का पद मिलेगा और नेता प्रतिपक्ष को कैबिनेट मंत्री का दर्जा भी मिलेगा। यह शुरुआत नेहरू और इंदिरा गांधी ने नहीं की। इस पद के लिए राहुल गांधी को जनता पार्टी यानी गैर कांग्रेसी दलों का आभारी होना चाहिए। तो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एसआईआर में कथित गड़बड़ी, वोट चोरी और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर एक प्रतिनिधिमंडल के साथ हाल ही में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिले और उनको एक ज्ञापन सौंपा। राष्ट्रपति ने प्रतिनिधिमंडल से पूछा कि वोटी चोरी के आरोपों का आपके पास कोई सबूत है। इतनी बातचीत के बाद जब राहुल गांधी बाहर निकलकर आए तो कहा कि हमने जो वोट चोरी के आरोप लगाए हैं राष्ट्रपति उसे मान गई हैं। अब राहुल गांधी को कोई जिलास्तरीय नेता भी यह बता देगा कि कोई प्रतिनिधिमंडल अगर राष्ट्रपति या किसी से भी मिलने जाता है तो वह सौंपे गए ज्ञापन को ले लेता है। उसका यह मतलब नहीं होता है कि उसमें जो लिखा है उससे वह सहमत हो गया है। राष्ट्रपति को ऐसे हजारों ज्ञापन मिलते हैं, जिनको उचित कार्रवाई के लिए संबंधित विभागों को भेज दिया जाता है। राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को हटा नहीं सकतीं। उन्हें यह अधिकार ही नहीं है। तो राहुल का यह कहना कि राष्ट्रपति हमारे वोट चोरी के आरोपों को मान गई हैं, ये ठीक वैसा ही था जैसा राफेल के समय राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के साथ किया था। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर उन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट ने मान लिया है कि राफेल की डील में घपला हुआ। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति में अधिकार का एक फर्क है। सुप्रीम कोर्ट के पास कंटेंप्ट की पावर है,जो राष्ट्रपति के पास नहीं है। तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया और राहुल को कंटेप्ट ऑफ कोर्ट में नोटिस भेज दिया। उसके बाद राहुल गांधी को अदालत में पेश होकर लिखित रूप से बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस राजनीति में हमको मत घसीटिए। जो राहुल गांधी यह कहते घूमते हैं कि मैं माफी नहीं मांगता,वह सुप्रीम कोर्ट से लिखित में बिना शर्त माफी मांग चुके हैं।
तो वही खेल राहुल ने राष्ट्रपति के साथ किया। उनको लगा होगा कि राष्ट्रपति के पास तो कंटेप्ट की पावर है नहीं। वैसे भी राष्ट्रपति ऐसी बातों पर प्रतिक्रिया नहीं देते। लेकिन राष्ट्रपति ने एक सवाल पूछ लिया और उसका जवाब राहुल गांधी के पास नहीं था कि कोई सबूत है। कई महीनों से आप चिल्ला रहे हैं कि वोट चोरी हो रही है, ज्ञानेश कुमार और प्रधानमंत्री इस्तीफा दें, जितने चुनाव भाजपा जीती है,सब रद्द हों, इसका कोई प्रमाण तो होना चाहिए और प्रमाण देने के लिए राष्ट्रपति से बड़ा कौन हो सकता था? कौन सा संवैधानिक पद राष्ट्रपति से बड़ा है? लेकिन सवाल वही है कि प्रमाण हो तब तो देंगे। सिर्फ एक झूठा नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश हो रही है। इसी चक्कर में एक अखबार और एक चैनल फंस गया। पश्चिम बंगाल में रेजी नगर में हाल ही में उपचुनाव हुआ। नतीजे के बाद अभिषेक बनर्जी ने मीडिया से कह दिया कि रेजी नगर में एक बूथ पर जितने रजिस्टर्ड मतदाता हैं, उससे ज्यादा बीजेपी को वोट मिल गए हैं। यह वोट चोरी का प्रमाण है। तुरंत अरविंद केजरीवाल ने भी इसको ट्वीट कर दिया। चुनाव अधिकारी ने जब फैक्ट चेक किया तो असलियत कुछ और निकली। उन्होंने बताया कि भाजपा को 909 वोट मिले हैं, जबकि रजिस्टर्ड वोट 1109 हैं। इसके बाद खबर चलाने वाले चैनल और अखबार ने माफी मांगी कि हमसे गलती हो गई, लेकिन अभी तक अभिषेक बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने माफी नहीं मांगी है।
अब सीजेपी का अभिजीत दीपके कह रहा है कि जो चुनाव ज्ञानेश कुमार के मुख्य चुनाव आयुक्त से बनने से पहले हुए उसमें भी उन्होंने बीजेपी को जिता दिया। अब इसको कौन मानेगा? लेकिन जिसने अपनी अक्ल पर ताला लगा दिया होगा, वह तो मान सकता है। आप राहुल गांधी के पूरे राजनीतिक करियर को देखिए। वह एक मुद्दा कुछ दिन उठाते हैं फिर उसकी बात भी नहीं करते। आजकल उनके मुंह से आप राफेल या पेगासस या हिंडनबर्ग की रिपोर्ट की बात सुनते हैं क्या? कमाल की बात तो यह है कि इस सरकार को सत्ता में 12 साल हो गए। इतने सालों में कांग्रेस और उसके साथी दल मिलकर इस सरकार के खिलाफ एक मामला नहीं खोज पाए हैं। इसीलिए आप देखिए जिन भी चुनाव और उपचुनावों के नतीजे आ रहे हैं,मतदाता पर विपक्ष के आरोपों का कोई असर नहीं हो रहा है। अभी हुए छह सीटों के उपचुनाव में बंगाल व असम में तीन भाजपा जीती, तमिलनाडु में टीवीके दो सीटें जीती, पुदुचेरी में एनडीए जीता। कांग्रेस कहां है? लेकिन कांग्रेस और राहुल गांधी की बात अगर आप सुनें तो देश में लोग इस समय क्रांति के लिए तैयार हैं। कुल मिलाकर यह बड़े दुर्भाग्य की बात है कि राहुल गांधी जैसा नेता प्रतिपक्ष देश को मिला है। वह मानते हैं कि सारे नियम कानून सामान्य लोगों के लिए हैं, हमारे लिए नहीं। चीफ इलेक्शन कमिश्नर से बात करनी है तो उन्हें आना चाहिए। हम क्यों जाएं? यही भाव दीपके और उसके साथियों का था कि हम परमिशन क्यों मांगें, सरकार तुम्हारी है तो सड़क हमारी है। लेकिन अब पुलिस बता रही है कि सरकार किसकी है और सड़क किसकी है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)












