देश में अराजकता पैदा करने की कोशिश में लगे दीपके एंड कंपनी का इलाज शुरू।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
10 अक्टूबर 2026 को मोदी सरकार ने एक बहुत बड़ा ऐलान किया। वह ऐलान था कि अराजकता को आम माफी की स्कीम बंद हो गई और इसी के साथ देश में अराजकता करने वालों का इलाज शुरू हो गया।
मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर कॉकरोच जनता पार्टी ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शन का ऐलान किया था। ये कॉकरोच कई दिनों से घोषणा कर रहे थे कि जंतरमंतर टू शुरू होने वाला है। हम आ रहे हैं। जैसे पता नहीं कौन से अवतारी पुरुष आ रहे हों। अभिजीत दीपके और उसके साथी पिछली बार जब दिल्ली आए तो उनका स्वागत हुआ था। पुलिए स्कॉट करके उनको जंतरमंतर तक ले आई थी और बिना परमिशन मांगे धरने की परमिशन की चिट्ठी हाथ में पकड़ा दी थी। उन्हें लग रहा था कि इसबार भी वैसा ही होगा,लेकिन उनकी फ्लाइट में ही दिल्ली पुलिस पहुंच गई और दो बातें कहीं। पहली, आपका पिछला ट्रैक रिकॉर्ड है कि प्रदर्शन की परमिशन के दौरान आपने जो अंडरटेकिंग दी थी, उसको पूरा नहीं किया। दूसरी, प्रदर्शन के लिए परमिशन 10 दिन पहले मांगी जाती है। लेकिन ये साहब लोग तो कह रहे थे कि हम परमिशन क्यों मांगें? हमने तो केवल सूचना दे दी है कि हम आ रहे हैं। स्वागत की तैयारी करो। तो स्वागत की तैयारी में दिल्ली पुलिस इस बार पूरी चौकस थी और वह हुआ जो पहली बार ही होना चाहिए था। यानी कानून के राज की स्थापना। पुलिस ने एयरक्राफ्ट में ही अभिजीत दीपके, आशुतोष रांका, सौरभ दास और उनके साथियों को हिरासत में ले लिया। उनकी गिरफ्तारी के दौरान एयरक्राफ्ट में जो हुआ, उससे अभिजीत दीपके को समझ में आ जाना चाहिए कि देश में माहौल क्या है? एयरक्राफ्ट में जो लोग थे उन्होंने दिल्ली पुलिस जैसे ही एयरक्राफ्ट में दाखिल हुई तालियां बजाकर उसका स्वागत किया और इन लोगों की गिरफ्तारी पर कहा कि इस कचरे की सफाई होनी चाहिए। इस दौरान भारत माता की जय के नारे लगे। कोई भी आंदोलन करने वाले के लिए यह संकेत होता है कि जनता उनके खिलाफ है या साथ है, लेकिन समझदार लोग ही ऐसे संकेत समझते हैं। जो मूर्ख या जो विदेशी एजेंडे पर काम कर रहे होते हैं, उनको समझ में नहीं आता क्योंकि उनको तो टास्क दिया गया है। तो 10 अक्टूबर को सीजेपी के मास्टर्स ने उनको टास्क दिया था कि तुम राजनीतिक आत्महत्या कर लो और वही उन्होंने किया। पुलिस ने इस बार जितने कॉकरोच दिल्ली पहुंचे उनकी सेवा कायदे से की। सबसे मजेदार बात तो यह रही कि आम लोगों ने भी इनकी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। अरविंद केजरीवाल अपने को बहुत बड़ा क्रांतिकारी समझते हैं। उन्होंने एक दिन पहले कहा था कि मैं भी परिवार के साथ जंतरमंतर आऊंगा। उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से भी बड़ी संख्या में पहुंचने की अपील की थी, कोई पहुंचा हो ऐसा दिखा नहीं। केजरीवाल खुद जंतरमंतर नहीं पहुंच पाए। इस बार पुलिस की तैयारी से वह पहले ही डिफेंसिव हो गए थे। उन्होंने अपील की कि जहां पुलिस रोके उसी को जंतरमंतर बना लीजिए। यानी सरेंडर कर दीजिए। उनको तो कॉकरोचों को केवल यह दिखाना था कि हम भी साथ हैं क्योंकि यह दीपके एंड कंपनी उन्हीं की उपज है। पुलिस ने बिना कोई सीमा लांघे इस बार जैसी कार्रवाई की उसकी जितनी प्रशंसा की जाए उतनी कम है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने पिछली बार जब उन पर हमला हुआ था तब भी बहुत धैर्य दिखाया था। इस बार पुलिस की तैयारी ऐसी थी कि ये कॉकरोच गुंडों को बुला नहीं पाए क्योंकि गुंडों को पिछली बार ही चिन्हित कर लिया गया था। अगर उनमें से कोई भी इस बार आता तो उसकी बहुत दुर्दशा होती इसलिए उनकी हिम्मत नहीं हुई। टेक्नोलॉजी की दृष्टि से भी इस बार दिल्ली पुलिस ज्यादा चौकस थी।
कोई भी आंदोलन सफल तब होता है जब उसे जनसमर्थन हो। जनसमर्थन होता है तो कितनी भी पुलिस लगा दीजिए,लेकिन आंदोलन रुकता नहीं है। मैं अपनी आंखों देखी हुई बात आपको बता रहा हूं। वह 30 अक्टूबर 1990 का दिन था। मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री थे। उन्होंने घोषणा की थी कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। तत्कालीन फैजाबाद जिले की सीमा जहां से शुरू होती है, वहीं से पुलिस का बंदोबस्त शुरू हो गया था। उत्तर प्रदेश में मंडी परिषद के जितने प्रांगण थे, सबको टेंपरेरी जेल में बदल दिया गया था। कारसेवा के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे लोगों को लखनऊ में ही हिरासत में ले लिया गया था। मैंने अपनी आंखों से देखा कई—कई मर्सिडीज और बीएमडब्ल्यू कारें रास्ते में खड़ी थीं। उनसे जो लोग आए थे जब उनको आगे जाने से रोक दिया गया तो वे पैदल ही अयोध्या की ओर चल पड़े। छाले पड़ने पर कई लोग पत्ते बांधकर चल रहे थे। रास्ते में कोई ऐसा गांव नहीं था, जहां पूरी सब्जी न बन रहा हो। आंदोलन की तैयारी तब हो पाती है जब आपके पास संगठन हो। 29 अक्टूबर तक अयोध्या में कोई नजर नहीं आ रहा था। दिल्ली और लखनऊ से पहुंचे कई पत्रकार 30 अक्टूबर की सुबह 4—5 बजे तक होटल लौट कर आ गए और सबने मान लिया कि कोई नहीं पहुंच पाया है, न ही कोई पहुंच पाएगा। सबने तय किया कि नाश्ता करो और यहां से निकलो। हम नाश्ता कर रहे थे तभी खबर आई कि लोग गलियों से निकल रहे हैं। सबने सोचा कि अफवाह फैलाई जा रही है। ऐसा हो नहीं सकता। फिर दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी खबर आई तो ये तय हुआ चल कर देखना चाहिए। हम लोग जब बाहर निकले तो दृश्य ऐसा था कि जैसे चूहे बिल से निकलते हैं, बड़ी संख्या में लोग घरों से निकल रहे थे। उनमें महिलाएं, पुरुष सब शामिल थे। सबके सब कहां थे, कहां से आए थे, किसी को पता नहीं। 10—11 बजते बजते हनुमानगढ़ी के पास तिल रखने की जगह नहीं थी तभी अशोक सिंघल वहां पहुंच गए। सारी योजना संघ और विश्व हिंदू परिषद ने बनाई थी। कई महीने पहले से देश के अलग-अलग हिस्सों से कार सेवक अयोध्या लाए जा रहे थे। वे वहां घरों में रुकवाए गए। वे परिवारों के बीच में रह रहे थे। सरकार को कोई हवा नहीं लगी। कारसेवकों पर जब गोली चली तो दो लोगों को गिरते हुए देखा। उस समय मुझे मालूम नहीं था कि वह कौन हैं। अगले दिन अखबार में पढ़ा कि वे कोठारी बंधु थे। गोली चलने पर भी लोग वहां से हटे नहीं। सरकार कहती है केवल पांच लोग मारे गए, लेकिन आंदोलनकारी कहते हैं कि बहुत से लोग मारे गए। लोगों को रेत की बोरी बांधकर नदी में डुबो दिया गया। मुलायम सिंह का सारा सुरक्षा बंदोबस्त ध्वस्त हो गया। लोग अपनी जान देने तक को तैयार थे क्योंकि भगवान राम के प्रति आस्था थी। इन कारसेवकों में उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं था क्योंकि वे किसी के एजेंडे पर काम नहीं कर रहे थे। वे अपनी आस्था के आधार पर वहां आए थे और किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। तो आंदोलन को जब जनसमर्थन होता है तो यह स्वरूप सामने आता है और अगर आंदोलन को जनसमर्थन न हो तो वह होता है जो 10 अक्टूबर को दिल्ली में हुआ।
यह जो कॉकरोच जनता पार्टी का दीपके है, इसको लगा कि यह बहुत बड़ा नायक है और यह चलेगा तो लाखों लोग इसके पीछे चल देंगे। पिछली बार कुछ गुंडों के आ जाने से इसकी गलतफहमी थोड़ी बढ़ गई थी। उस बार मारपीट, हिंसा और पुलिस वालों पर हमले के बाद भी जिस तरह सरकार ने इनसे बात की और मांगें मान लीं। उसके सुप्रीम कोर्ट ने उनको माफी दे दी, उससे इनका हौसला बढ़ गया था। लेकिन इस बार सरकार और पुलिस दोनों चौकन्ने थे। वैसे भी जब भाड़े के टट्टू आते हैं और पुलिस की लाठी घूमती है तो वे वैसे ही भागते हैं जैसा 10 अक्टूबर को हुआ। ये दीपके जब एयरक्राफ्ट में गिरफ्तार हुआ तो बोल रहा था कि अरे भाई चल रहा हूं। मैं गिरफ्तार होने के लिए ही आया हूं। अरे, तुम तो क्रांति करने आए थे। सरकार गिराने आए थे। मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा लेने आए थे। सुप्रीम कोर्ट के जजेस को कह रहे थे कि एसआईआर की सुनवाई से अलग हो जाओ। तुम्हारे फैसले को कौन मानेगा? लेकिन अब तुम्हें पता चलेगा कि किसके फैसले को कौन मानेगा। इन लोगों के ऊपर देशद्रोह की धाराएं लगनी चाहिए। ये देश में हिंसा का तांडव करना चाहते थे। चाहते थे कि सड़क पर खून बहे। एक वामपंथी संगठन की नेता हैं। वह टीशर्ट पहन कर आई थीं, जिस पर पीछे लिखा हुआ था सिंगल पीस। यह वही टीशर्ट थी, जो नेपाल में आंदोलनकारियों द्वारा पहनी गई थी। यही बांग्लादेश में पहनी गई थी। तो आप इससे इनका इरादा समझ लीजिए कि क्या करना चाहते थे। ये खुलकर बोल रहे थे कि भारत में नेपाल और बांग्लादेश जैसी स्थिति बनाना चाहते हैं,लेकिन इनको मालूम नहीं था कि भारत के लोग इस तरह की बातों में नहीं आते। यहां के लोग राजनीतिक, सामाजिक और हर दृष्टि से ज्यादा समझदार हैं। वह समझते हैं कि देश और समाज के हित में क्या है और कौन हैं। कम से कम दीपके, उसके साथी, राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल तो नहीं हैं। तीन—चार दिन तक राहुल गांधी दिल्ली में प्रदर्शन करते रहे, कोई उनके साथ आया क्या? इसलिए सारा कुहासा छंट चुका है। कौन देश के साथ है, कौन देश के खिलाफ है, यह स्पष्ट हो चुका है। ये लड़ाई देश के स्वाभिमान, देश की अखंडता और एकता की है। यह किसी व्यक्ति, किसी पार्टी, किसी विचारधारा की नहीं है। जो भी इस देश को अपना समझते हैं और जो चाहते हैं कि इस देश की एकता व अखंडता बनी रहे, उनको ऐसे तत्वों के खिलाफ खड़े होना चाहिए। ऐसे तत्वों के खिलाफ बोलना चाहिए। दीपके एंड कंपनी की गिरफ्तारी पर एयरक्राफ्ट में मौजूद लोगों ने यही संदेश दिया है। वे चाहते तो चुप रह सकते थे, लेकिन उन्होंने बोलना चुना और दीपके व उनके साथियों को शर्मिंदा किया। उस दौरान एक ही नारा लगा—भारत माता की जय। यह अमेरिका और दुनिया में किसी भी कोने में बैठे ऐसे लोगों के लिए संदेश है,जो भारत को तोड़ना चाहते हैं।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)