#pradepsinghप्रदीप सिंह।
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश से अपने राज्यसभा उम्मीदवारों की लिस्ट के जरिए अखिलेश यादव के खिलाफ एक बड़ा खेल कर दिया। यह सूची बताती है कि अखिलेश यादव तो पीडीए—पीडीए बोलते ही रह गए, लेकिन भाजपा ने करके दिखा दिया।
समाजवादी पार्टी के राज्यसभा उम्मीदवारों की सूची में केवल परिवार और पैसा दिखता है, लेकिन भाजपा ने जो आठ नाम घोषित किए हैं, उनमें से तीन पिछड़ा वर्ग, दो दलित समाज और तीन अगड़े समाज से दो ब्राह्मण व एक ठाकुर हैं। चाहे मंत्रिमंडल का गठन हो, चाहे संगठन में पद दिए जा रहे हों और चाहे राज्यसभा या विधान परिषद में किसी को भेजा जाना हो, आम तौर पर उम्मीदवार जाति देखकर तय किए जाते हैं, लेकिन इन आठ नामों के बारे में आप यह नहीं कह सकते कि ये केवल अपनी जाति के कारण आए। ये अपनी योग्यता के कारण आए हैं, जाति बस इनके लिए सहायक बनी है। दूसरी बात यह कि अनुभव और युवा का सामंजस्य बिठाने की कोशिश हुई है। दलित समाज से जो तीन लोग उम्मीदवार बनाए गए हैं, उनमें सबसे वरिष्ठ विद्यासागर सोनकर हैं, जो विधान परिषद के उपसभापति और सांसद रह चुके हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के रहने वाले हैं और खटिक समाज से आते हैं। खटिक समाज जनसंघ के समय से पार्टी का समर्थक रहा है। तो विद्यासागर सोनकर को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने यह बताया है कि दलित समाज में उसका जो सबसे पुराना समर्थक वर्ग था, उसको वह भूली नहीं है। ये बहुत बड़ा मैसेज है। इधर कुछ सालों से भाजपा तो पता नहीं क्या हो गया था कि वह दलित समाज में जाटवों से प्रेम दिखाने लगी थी। जाटव समाज के लोगों को टिकट दिए गए, मंत्री बनाए गए, अलग-अलग अन्य पद दिए गए,लेकिन उसका कोई फायदा भाजपा को नहीं हुआ। उस चक्कर में अपने परंपरागत वोट बैंक को भाजपा भूल गई थी। अब इसको याद करने की कोशिश हुई है और यह एक अच्छा संकेत है। दूसरी बात, दलित समाज के एक वर्ग में एक खास तरह की कमी है कि जैसे ही वे बड़े पद पर पहुंचते हैं सबसे पहले अपने ही समाज से नाता तोड़ लेते हैं,लेकिन विद्यासागर सोनकर ऐसे व्यक्ति हैं, जो लगातार सक्रिय राजनीति में होते हुए भी अपने समाज से कटे नहीं हैं और उनके मन में किसी दूसरे समाज के लिए कोई कटुता नहीं है। दलित समाज से आने वाली दूसरी प्रत्याशी प्रियंका रावत बाराबंकी से सांसद रह चुकी हैं। वह पिछला चुनाव हार गई थीं। वह युवा और पढ़ी—लिखी हैं। भाजपा को ऐसे लोगों की बड़ी जरूरत है। उनका भी चयन केवल जाति के कारण नहीं हुआ है।
पिछड़ा वर्ग से भाजपा ने धर्मपाल को राज्यसभा का प्रत्याशी बनाया है। वह अभी राज्य सरकार में मंत्री हैं। पिछड़ा वर्ग से ही प्रत्याशी बनीं श्रुति गंगवार के पिता भाजपा से लंबे समय तक सांसद और केंद्रीय मंत्री रहे हैं। इस समय झारखंड के गवर्नर हैं। आप कह सकते हैं कि श्रुति परिवार के कारण आई हैं, लेकिन वह आईआईटीयन हैं और बरेली ग्रामीण बैंक से जुड़ी हुई हैं। इन लोगों की बात मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि पहले होता यह था कि केवल सामाजिक समीकरण का ध्यान रखा जाता था,योग्यता और पार्टी के लिए उपयोगिता नहीं देखी जाती थी। अब ऐसा नहीं है। दो मंत्रियों हरदीप सिंह पुरी और बीएल वर्मा का टिकट कट गया है। कुछ लोगों का कहना है कि हरदीप पुरी को कहीं और से लाया जाएगा। उत्तर प्रदेश में चूंकि विधानसभा चुनाव होने हैं इसलिए यहां के सामाजिक समीकरण में वह फिट नहीं बैठते थे। बीएल वर्मा लोध समाज से आते हैं। उन्होंने कल्याण सिंह के परिवार से उनकी न पटने की कीमत चुकाई है।
ब्राह्मण समाज से राधाकांत ओझा को प्रत्याशी बनाना बताता है कि योग्यता को अब ज्यादा तरजीह दी जा रही है। वरना केवल जाति के नाम पर जो लोग आते हैं, वह बोझ बन जाते हैं। राधाकांत ओझा इलाहाबाद हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील हैं और भाजपा को ऐसे लोगों की बड़ी जरूरत है जो कानून के विशेषज्ञ हों। पार्टी संगठन और संघ से भी उनका पुराना नाता रहा है। यूपी से हरीश द्विवेदी, स्मृति ईरानी और अमित मालवीय को भी राज्यसभा भेजे जाने की चर्चा चल रही थी,लेकिन किसी को टिकट नहीं दिया गया। अमित मालवीय प्रयागराज के रहने वाले हैं और लंबे समय तक भाजपा आईटी सेल के इंचार्ज रहे। आईटी सेल में ही कई लोग उनके काम से खुश नहीं थे। स्मृति ईरानी 2024 में लोकसभा का चुनाव हारी हैं। उसके बाद उनको पार्टी का राष्ट्रीय महामंत्री बना दिया गया। राज्यसभा में उनको जगह मिलेगी,इसकी उम्मीद कम थी। हालांकि वह जिस तरह की वक्ता हैं, उसको देखते हुए अगर वह राज्यसभा में पहुंचतीं तो पार्टी के लिए अच्छा ही होता। तीसरे नाम हरीश द्विवेदी की तीन पहचान हैं। पहला,वह घोर योगी विरोधी हैं, दूसरा पूर्वी उत्तर प्रदेश में ठाकुर—ब्राह्मणों के बीच जो दरार है,उसको चौड़ा करने का वह हर समय प्रयास करते रहते हैं और तीसरा पार्टी में उनकी पालकी ढोने वाले बहुत हैं। राजस्थान में हुए निकाय चुनावों में उन्हें प्रभारी बनाकर भेजा गया था। इन चुनावों में भाजपा ने बहुत खराब प्रदर्शन किया, लेकिन नैरेटिव यह बनाया गया कि उनकी वजह से पार्टी जीत पाई। उनको राज्यसभा न भेजकर भी भाजपा ने एक खास संदेश दिया है। पार्टी ने राज्यसभा के लिए यूपी से जिन आठ लोगों को प्रत्याशी बनाया है, मेरा मानना है कि सालों बाद पूरी तरह से संतुलित टीम बनाने की कोशिश की गई है। केंद्र में जब भी मंत्रिमंडल का विस्तार होगा, मुझे लगता है कि इनमें से कम से कम चार लोगों को उसमें होना चाहिए।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)