जब किसी देश का विपक्ष जनता का भरोसा जीतने में नाकाम हो जाता है, तो उसके पास दो रास्ते होते हैं। पहला रास्ता है – आत्ममंथन करना, अपनी गलतियों को सुधारना, जनता के बीच जाकर फिर से जुड़ना और एक बेहतर सोच के साथ वापस आना। दूसरा रास्ता है – जो संस्थाएं चुनाव कराती हैं, जो लोकतंत्र को संभालती हैं, उन्हीं पर हमला करना, जनता के मन में उनके प्रति अविश्वास भरना और सड़कों पर अराजकता फैलाकर ऐसा दिखाना जैसे पूरे देश में गुस्सा है।
आज देश की राजधानी दिल्ली में जो कुछ हो रहा है, वह दूसरे रास्ते का ही उदाहरण है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने “वोट चोरी” का एक झूठा नैरेटिव गढ़ा है। चुनाव आयोग, अदालतें, जांच एजेंसियां – हर संवैधानिक संस्था को निशाना बनाया जा रहा है। रोज कोई नया तमाशा , रोज सोशल मीडिया पर अभियान, रोज कोई नई रिपोर्ट। इन संस्थाओं की विश्वसनीयता को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।
इसकी वजह क्या है? वजह सीधी है। आप जनता को अपने पक्ष में नहीं कर पा रहे हैं। पिछले दस सालों में जनता ने बार-बार अपना फैसला सुनाया है। लोकसभा हो या विधानसभा, जनता ने स्थिरता, विकास और राष्ट्रवाद को चुना है। जब आप एक के बाद एक चुनाव हारते हैं, जब आपका जमीन से संपर्क टूट जाता है, तो निराशा आती है। लेकिन उस निराशा का इलाज लोकतंत्र की जड़ों पर हमला करना नहीं हो सकता।
और जब सीधी राजनीतिक लड़ाई में जीत नहीं मिलती, तो प्रॉक्सी मॉडल अपनाया जाता है। कुछ राजनीतिक दल अब एक प्रॉक्सी समूह को आगे कर रहे हैं, जिसका नाम कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी।
जरा पैटर्न देखिए। राजधानी की सड़कें बार-बार हाईजैक कर ली जाती हैं। मेट्रो बंद, ट्रेनें रद्द, स्कूलों में एडवाइजरी, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पा रहे, दुकानदारों को शटर गिराने पड़ रहे हैं। इससे तकलीफ किसे होती है? उन नेताओं को नहीं जो एसी स्टूडियो में बैठकर इस पर बहस करते हैं। तकलीफ होती है आम आदमी को, उस व्यापारी को जो रोज कमाता-खाता है, उस नौकरीपेशा व्यक्ति को जिसे ऑफिस पहुंचना है, उस छात्र को जिसे परीक्षा देने जाना है। दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं है, यह देश का दिल है। इसे बंधक बनाना विरोध नहीं, पूरे देश को सजा देना है।
सीजेपी जो कभी छात्रों के मुद्दों के लिए एक प्रेशर ग्रुप के तौर पर उभरी थी, आज इस्तीफे मांगने का कारोबार बन गई है। हर दूसरे दिन किसी न किसी के इस्तीफे की मांग – प्रधानमंत्री इस्तीफा दें, गृहमंत्री इस्तीफा दें, चुनाव आयुक्त इस्तीफा दें, कुलपति इस्तीफा दें। यह जवाबदेही नहीं है, यह अराजक वसूली है। मुद्दों की लड़ाई से हटकर सिर्फ इस्तीफा उद्योग चलाना, इसके असली चरित्र को दिखाता है।
और विपक्ष को अब सड़कों पर फैली यही अराजकता एक मौके की तरह लगने लगी है। जब आप अपने दम पर कुछ कर नहीं पाते, तो अराजकता में आपको अपनी राजनीति दिखने लगती है। आप उन्हें कानूनी मदद देते हैं, मीडिया में हवा देते हैं और राजनीतिक कवच प्रदान करते हैं।
इसका समय भी संयोग नहीं है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू हुए हैं और इसके साथ ही देश का त्योहारी मौसम शुरू हो गया है। दशहरा, दिवाली, छठ – यह वह समय है जब बाजारों में रौनक लौटती है, जब सबसे छोटा रेहड़ी-पटरी वाला भी साल भर की कमाई करता है, जब परिवार सफर करते हैं, जब अर्थव्यवस्था को सबसे बड़ी गति मिलती है। आंदोलन के लिए यही समय चुनना, त्योहारों के रंग में भंग डालने की सोची-समझी कोशिश है। यह पुराना फॉर्मूला है – त्योहारों पर आर्थिक और सामाजिक तकलीफ पैदा करो और फिर उसका ठीकरा सरकार पर फोड़ दो।
यहाँ सबसे बड़ा सवाल उठता है – क्या सड़कों पर अराजकता पैदा करके देश चलेगा?
अगर आपको वाकई लगता है कि लोग सरकार से नाराज हैं, तो वो आपके साथ सड़क पर क्यों नहीं आ रहे? क्यों हर आंदोलन में वही चेहरे, वही भीड़ नजर आती है? कैमरा घूमता है और देश देखता है – यह जन आंदोलन नहीं, प्रायोजित भीड़ है।
लोकतंत्र में अगर आपको लगता है कि आपके साथ गलत हुआ है, तो आपके पास कई रास्ते हैं। अदालत जाइए। भारत की न्यायपालिका स्वतंत्र है और जब मामला सच्चा होता है तो उसने सरकार के खिलाफ भी फैसले दिए हैं। दूसरा, संसद में अविश्वास प्रस्ताव या महाभियोग लाइए। बहस कीजिए, अपना बहुमत साबित कीजिए। तीसरा और सबसे बड़ा रास्ता, जनता के पास जाइए। उन्हें समझाइए, उनका विश्वास जीतिए। लेकिन आपको इसमें कोई रुचि नहीं है।
आप सही प्रक्रिया अपनाना ही चाहते, क्योंकि इसमें मेहनत लगती है, सब्र लगता है और सच्चाई चाहिए होती है। अराजकता शॉर्टकट है। आप चाहते हैं कि सरकार मजबूर होकर बल प्रयोग करे और फिर आप खुद को पीड़ित बताकर दुनिया भर में प्रचार कर सकें।
दरअसल आप सूरत नहीं बदलना चाहते, आप सिर्फ हंगामा खड़ा करना चाहते हैं। आपकी नीयत में खोट है, इसलिए आप सफल नहीं हो पा रहे।
यह पहली बार नहीं हो रहा है। देश भूला नहीं है।
पांच साल पहले, 2021 की 26 जनवरी का दिन याद कीजिए। जिस दिन पूरा देश अपना गणतंत्र, अपना संविधान, अपना तिरंगा मनाता है। उसी दिन तथाकथित आंदोलनकारियों ने तय रास्ता तोड़ा, तलवारों और लाठियों से पुलिस पर हमला किया और लाल किले पर चढ़ गए। लाल किला, जहां से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं, उसे अपवित्र किया गया। वहां दूसरा झंडा फहराया गया, पुलिसकर्मियों को दीवार से नीचे फेंक दिया गया। क्या यह विरोध था? नहीं, यह भारत की संप्रभुता पर सीधा हमला था। उस दिन के घाव आज भी देश के दिल में हैं।
उससे पहले हमने शाहीन बाग मॉडल देखा। सीएए के विरोध के नाम पर शुरू हुआ धरना महीनों तक दिल्ली की एक अहम सड़क को बंद करके बैठा रहा। एम्बुलेंस फंसी रहीं, बच्चे परीक्षा नहीं दे पाए, व्यापार ठप हो गया। और उसका नतीजा क्या निकला? वही रोड ब्लॉक फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों का केंद्र बना। उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 50 से ज्यादा भारतीयों – हिंदू और मुसलमान दोनों – की जान गई। पुलिस कांस्टेबल रतन लाल शहीद हुए, आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की बेरहमी से हत्या हुई। बाद में चार्जशीट में सामने आया कि यह कोई स्वतःस्फूर्त धरना नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी साजिश थी, ताकि अमेरिकी राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान दुनिया भर में भारत को बदनाम किया जा सके। शाहीन बाग सिर्फ जाम नहीं था, वह अराजकता की प्रयोगशाला थी।
20 जुलाई को सीजेपी ने दिल्ली में उसी मॉडल का ट्रेलर दिखाया। बसें रोकी गईं, बैरिकेड तोड़े गए, पुलिस के साथ धक्का-मुक्की हुई और राजधानी को ठप करने के नारे लगे। तस्वीरें साफ थीं – यह छात्र प्रदर्शन नहीं, छात्रों के नाम पर अपने एजेंडे को आगे बढ़ाना था।
साथ ही, हमने अराजकता का एक और उदाहरण देखा, वह भी प्रतिपक्ष के नेता के जिम्मेदार पद पर बैठे एक व्यक्ति द्वारा। वह था प्रधानमंत्री आवास के पास बिना इजाजत राहुल गांधी का धरना। संदेश क्या था? कि आप धारा 144 को नहीं मानते, आप इजाजत लेना जरूरी नहीं समझते, आपको लगता है कि राजनीतिक डायनेस्टी का वारिस होने से आपको कानून तोड़ने का हक मिल गया है। अगर हर नागरिक हाई सिक्योरिटी जोन में जहाँ चाहे बैठने लगे, तो क्या कोई सरकार काम कर पाएगी? यह विपक्ष की राजनीति नहीं, यह विशेषाधिकार और अराजकता की राजनीति है।
लाल किले से शाहीन बाग तक, 20 जुलाई से 7, लोक कल्याण मार्ग के गेट तक – पैटर्न एक ही है। सड़क जाम करो, पुलिस को उकसाओ, अराजकता की तस्वीर बनाओ, अपने इकोसिस्टम से उसे फैलाओ और फिर कहो कि लोकतंत्र खतरे में है। असल में लोकतंत्र को खतरे में आप डाल रहे हैं।
भारत 140 करोड़ लोगों का देश है। यह संविधान से चलता है, कुछ सौ लोगों की मर्जी से नहीं, जिन्होंने विरोध को ही अपना पेशा बना लिया है। आम आदमी आपका खेल समझ चुका है। वह जानता है कि जो लोग वोट से नहीं जीत पाते, वे अब देश का समय और शांति चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
यह देश अराजकता के आगे नहीं झुकेगा।










