चुनाव के जरिए बड़े-बड़े सूरमा ढेर इसीलिए हो रहा लोकतंत्र पर हमला ।

#pradepsinghप्रदीप सिंह।
सिर्फ 12 साल लगे और भारतीय जनता पार्टी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने देश का पूरा राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया। आप देखिए 2014 से पहले राजनीतिक दलों और नेताओं की क्या हैसियत थी? आपको जमीन आसमान का अंतर नजर आएगा, लेकिन जनता में कहीं कोई हलचल नहीं है। ऐसा लगता है कि जनता जैसे इसी बात का इंतजार कर रही थी कि कोई आए और यह करे।
2004 से लगातार 10 साल तक कांग्रेस का शासन था,लेकिन 2014 में चला गया। 2014 में और भी परिवर्तन हुए। 2014 में महाराष्ट्र में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बना। महाराष्ट्र में जो पार्टी चौथे नंबर की थी, वह पहले नंबर की बन गई। आज उद्धव ठाकरे की शिवसेना कहां है? पार्टी का नाम, सिंबल, झंडा सब चला गया। एक समय उद्धव ठाकरे की शिवसेना की राज्य में तूती बोलती थी। आज मुंबई शहर में कोई पूछने वाला नहीं है। पार्टी म्युनिसिपल कॉरपोरेशन तक का चुनाव हार चुकी है। यह परिवर्तन सिर्फ 12 साल में हुआ और उसका कारण है भाजपा से लड़ाई। जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो तमिलनाडु में जयललिता मुख्यमंत्री थीं। उनके निधन के बाद पहले पनीरसेल्वम और फिर ई पललिस्वामी मुख्यमंत्री बने। 2021 में चुनाव हुआ तो एमके स्टालिन मुख्यमंत्री बने। आज पलनिस्वामी का नाम सुनने को उनकी पार्टी के लोग तैयार नहीं हैं। स्टालिन की हार के साथ तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व खत्म हो गया। स्टालिन इस एक हार से इतने कमजोर हुए कि जिस नरेंद्र मोदी को अपना राजनीतिक दुश्मन मानते थे, उनसे हाथ मिला लिया। जिस कांग्रेस के साथ लंबे समय उनका गठबंधन था,वह टूट गया। एक नई पार्टी तमिलनाडु की सत्ता में आ गई। ऐसा नहीं है कि इस सबमें नरेंद्र मोदी और भाजपा का ही योगदान है, लेकिन परिस्थिति को बदलने में इन्होंने एक कैटलिस्ट का काम किया है। यानी परिवर्तन होगा। जो पुराना है,अगर वह बदलने को तैयार नहीं तो जाएगा। पुराना इसलिए भी जाएगा क्योंकि उसकी उपयोगिता और जनता में लोकप्रियता नहीं रह गई है। शरद पवार एक समय महाराष्ट्र की राजनीति के चाणक्य माने जाते थे, आज राज्यसभा में पहुंचने के लिए बाकी पार्टियों पर निर्भर हैं। भाजपा ने मदद न की होती तो राज्यसभा में भी नहीं पहुंच पाते। उनकी पार्टी देखते ही देखते टूट गई। हालांकि अभी भी वह सौदेबाजी में लगे हुए हैं। तय नहीं कर पा रहे हैं कि कहां रहें। उस चक्कर में जो है, वह भी जा रहा है। महाराष्ट्र की राजनीति से शरद पवार और उद्धव ठाकरे का सफाया हो जाने से वहां एक नई राजनीति उभरी है। एकनाथ शिंदे शिवसेना के नए नेता के रूप में सामने आए हैं।
इसी तरह से 2014 में केरल में ओमन चेंडी की कांग्रेसी सरकार थी। 2016 में उनकी सरकार चली गई और सीपीएम के पिनराई विजयन मुख्यमंत्री बने। 10 साल बाद उनका भी सफाया हो गया। उनकी हार के साथ ही देश से लेफ्ट का आखिरी किला भी ढह गया। उस समय तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव मुख्यमंत्री थे। आज उनकी पार्टी किस हालत में है, यह बताने की हालत में वह भी नहीं हैं। 2019 में आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी बहुत तेजी से उभरे। आज हाशिए के भी बाहर हैं। उत्तर प्रदेश में उस समय समाजवादी पार्टी का शासन था। अखिलेश यादव मुख्यमंत्री थे। उनकी सत्ता गए 10 साल हो गए। आगे भी समाजवादी पार्टी के यूपी की सत्ता में लौटने की दूर-दूर तक कोई संभावना नहीं है और अब तो अखिलेश यादव ने विधानसभा का चुनाव लड़ने से भी मना कर दिया है। एक तरह से उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को संदेश दे दिया है कि बहुत ज्यादा उम्मीद मत करो। 2014 में पहली बार हरियाणा में भाजपा का मुख्यमंत्री बना। 2014 में पंजाब में अकाली दल के प्रकाश सिंह बादल मुख्यमंत्री थे। 17 में उनकी सरकार चली गई तो तब से लौट कर नहीं आई। आज प्रकाश सिंह बादल के बेटे सुखबीर बादल की हालत यह है कि वह कटोरा लेकर बीजेपी के सामने खड़े हैं कि गठबंधन कर लो। तो पंजाब की राजनीति से बादल परिवार और कैप्टन अमरिंदर सिंह का सफाया हो गया। साथ—साथ नवजोत सिंह सिद्धू की राजनीति भी खत्म हो गई। आम आदमी पार्टी आ गई। 2027 के विधानसभा चुनाव में वह भी बाहर जाने के लिए दरवाजे पर खड़ी है। बस मतदाता को एक धक्का देना है। बिहार में 15 साल तक लगातार राष्ट्रीय जनता दल का राज रहा। आज उस पार्टी को बमुश्किल नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक विधानसभा सीटें मिली हैं। जो ऐशो आराम की जिंदगी से बाहर निकलने को तैयार नहीं होता तो उसको कुछ मिलता नहीं है। इसका उदाहरण तेजस्वी यादव हैं और इसका नया उदाहरण अखिलेश यादव बनने जा रहे हैं। नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने तो असम में 15 साल से तरुण गोगोई की कांग्रेस की सरकार थी। 2016 में चुनाव हुआ तो वह बाहर हो गए और भाजपा पहली बार आई सत्ता में आई। भाजपा लगातार तीन चुनाव 2016, 2021 और 2026 का जीती। वह भी उस असम में जहां मुस्लिम आबादी 40% है। पश्चिम बंगाल की चर्चा किए बिना बात कैसे पूरी होगी? वहां आजादी के बाद 30 साल तक कांग्रेस का राज रहा। 34 साल लेफ्ट फ्रंट का राज रहा और 15 साल से ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की शेरनी थीं। पूरे देश में माना जाता था कि ममता बनर्जी को हराना तो दूर कोई चुनौती भी नहीं दे सकता। पहली बार भाजपा ने 2021 में चुनौती दी और 2026 में सत्ता से बाहर कर दिया। आज ममता बनर्जी सिर्फ चुनाव नहीं हारी हैं, उनकी पार्टी भी खत्म हो गई है। अब वह दिल्ली के रामलीला मैदान में जॉनी-जॉनी यस पापा सुनाती हैं। उड़ीसा की चर्चा बिना पूरब की बात कैसे पूरी होगी? वहां भी पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बना है।
इस दौरान देश में एक इतिहास यह बना है कि लगातार तीसरी बार कांग्रेस पार्टी केंद्र में सत्ता में नहीं आ पाई है। कांग्रेस सत्ता से पहले भी बाहर जाती रही है। पहली बार 1977 में गई थी लेकिन 80 में लौट आई। दूसरी बार 89 में बाहर गई थी तो 91 में लौट आई। फिर 2004 में आई और 2014 में बाहर गई तो तब से लौट नहीं पाई है और लौटने की कोई उम्मीद भी नहीं दिख रही है। तो भारतीय राजनीति में सिर्फ 12 साल में इतना बड़ा परिवर्तन इससे पहले कभी नहीं आया है। अब कांग्रेस पार्टी और उसके नेता राहुल गांधी सोशल मीडिया के कंटेंट क्रिएटर बन गए हैं। वह राजनीतिक दल के नेता नहीं रह गए। इस दौरान कई पार्टियां खत्म हो गईं, राजनीति का चाणक्य समझे जाने वाले नेता धराशायी हो गए, पूरा लेफ्ट फ्रंट खत्म हो गया। क्षेत्रीय दल, जो 1989 के चुनाव से लगातार मजबूत हो रहे थे, भी हाशिये पर चले गए। सबसे बड़ी बात यह सारा परिवर्तन डेमोक्रेटिक तरीके से हुआ है। चुनाव के जरिए मतदाता ने फैसला सुनाया है इसीलिए आज डेमोक्रेसी पर हमला हो रहा है। इन दलों और इनके नेताओं को लग रहा है कि जो डेमोक्रेसी हमको सत्ता में नहीं ला सकती उस डेमोक्रेसी का क्या फायदा? तो उनको उम्मीद की एक ही किरण दिखती है कि अराजकता पैदा करो। लेकिन देश में जिस तरह का परिवर्तन हुआ है यह स्थाई परिवर्तन है। अब आगे इस तरह का कोई बड़ा परिवर्तन होने में कई दशक लगेंगे और होगा कि नहीं,यह पता नहीं है।
(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं ‘आपका अखबार’ के संपादक हैं)